मेरी दीदी बनी देसी रंडी 9

हम कार से अकरम की दी हुई लोकेशन की तरफ जा रहे थे। दीदी पीछे वाली सीट पर बैठी थीं और जीजा ड्राइव कर रहे थे। अकरम ने फोन करके पूछा था कि कहाँ तक पहुँची हो। जीजा को शक हो रहा था कि ये जगह कैसी है जहाँ न सड़क है न लाइट। हम गाँव के पास पहुँच रहे थे।

Pichla part yaha padhen ==> मेरी दीदी बनी देसी रंडी 8

तो दोस्तों आपने पढ़ा कि कैसे हम सब कार से अकरम ने जो लोकेशन दी थी उधर जा रहे थे।

अब आगे…

तो हम 7 बजे घर से निकल गए थे। हम थोड़ी देर में अकरम की दी हुई लोकेशन पर पहुँचने वाले थे।

तभी दीदी के फोन पर अकरम का कॉल आता है। दीदी मेरे साथ पीछे वाली सीट पर बैठी थीं और जीजा कार ड्राइव कर रहे थे।

दीदी कॉल पिक अप करती हैं।

अकरम: कहाँ तक पहुँची तुम?

दीदी: बस थोड़ी देर में पहुँचने वाले हैं।

दीदी: आपने क्या प्लान किया है?

अकरम: तू आ तो जा फिर तुझे बताता हूँ मेरी जान। चल जब पहुँचे तो कॉल कर देना।

इधर कार में जीजा ने दीदी की बात सुन ली थी।

जीजा: क्या प्लान की बात कर रही थी तुम?

दीदी: कुछ नहीं बस पूछ रही थी शादी का सब रेडी है कि नहीं।

जीजा: अच्छा वैसे बस 15 मिनट में पहुँचने वाले हैं। हम भी देखें तुम्हारे अकरम जी को कैसी लड़की मिली है।

दीदी यह बात सुनकर शरमाने लगीं।

जीजा जी को क्या पता था कि अकरम की शादी किससे हो रही है। वो तो खुद अपनी ही पत्नी को किसी दूसरे से शादी करने के लिए लेकर जा रहे हैं।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अकरम करना क्या चाहता है। वो जीजा जी के सामने कैसे शादी करेगा और दीदी भी कैसे रेडी हो गईं अपने ही पति के सामने किसी दूसरे मर्द से शादी करने के लिए। अगर दीदी की शादी भी हो गई तो अकरम भी मेरा जीजा बन जाएगा। वैसे भी साले ने दीदी की चुदाई करके तो मेरा जीजा बन तो गया है। अब बस शादी रह रही है… अगर जीजा को पता चल गया दीदी जीजा के साथ चीट कर रही हैं तो दीदी का क्या होगा। दीदी तो बदनाम होंगी साथ में पूरी फैमिली को लेकर बदनाम करेंगी। पता नहीं साले बूढ़े ने ऐसा क्या दीदी के साथ कर दिया या क्या खिला दिया कि दीदी उसकी हर बात मानने लगीं। मैंने क्या मिस कर दिया…

मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि तभी एक गाँव आता है। उसका नाम था हैदरबाद…

जीजा उस गाँव के कच्चे रोड से कार लेकर जाने लगते हैं। जीजा बोलते हैं—

जीजा: कौन सी जगह पर यह शादी हो रही है? ना तो ठीक से कोई सड़क है ना कोई लाइट है। इधर बस खाली खेत दिख रहे हैं।

दीदी: गुस्सा मत होइए आप…

जीजा: गुस्सा नहीं हो रहा बस बता रहा हूँ।

दीदी: अच्छा।

ऐसे ही हम गाँव के थोड़े के करीब आते हैं तो एक छोटी सी दुकान होती है पान की सड़क पर। क्योंकि जीजा को समझ नहीं आ रहा था कि अकरम ने जो जगह दी थी वो कहाँ है।

तो जीजा उस पान की दुकान के पास गाड़ी लेकर जाते हैं।

और रोकते हैं और उधर 3 आदमी थे। उधर कार रोकते हैं और पूछते हैं—

जीजा: हेलो भाई साहब आप मुझे यह एड्रेस बता सकते हैं? यह किधर पड़ेगा?

उनमें से एक आदमी बोलता है—

आदमी: दिखाओ साहब हम बताता हूँ आपको।

जीजा: यह रहा।

आदमी: अरे साहब यह तो पास में ही है। थोड़ा आगे जाओगे तो उधर से दाएँ घूम जाना… वैसे साहब उधर क्या करने जा रहे हैं आप?

जीजा: उधर किसी की शादी है।

आदमी: साहब मैं पूछ सकता हूँ कि किसकी शादी है?

जीजा: डार्लिंग क्या नाम था तुम्हारे अंकल का?

दीदी: जी अकरम।

जीजा: अकरम नाम है उनकी शादी है आज। उधर जा रहे हैं।

आदमी: अकरम… साहब पूरा नाम बताएँगे?

जीजा: डार्लिंग पूरा नाम क्या है?

जब जीजा दीदी से अकरम का पूरा नाम पूछते हैं तो उस टाइम वो आदमी कार के अंदर दीदी साड़ी के झोड़े में बैठी दिखाई देती है। जिसको देखकर वो दीदी की खूबसूरती देखकर मन मोहित हो जाता है।

दीदी: अकरम कादिर है जी।

जीजा: अकरम कादिर है।

वो दीदी की तरफ ही देखा जा रहा था कि दीदी को खा ही जाएगा। तभी जीजा जी बोलते हैं—

जीजा: भाई साहब।

आदमी: हाँ साहब।

जीजा: अकरम कादिर है।

आदमी: अकरम कादिर नाम सुनके शॉक हो जाता है।

जीजा: क्या हो गया आपको?

आदमी: कुछ नहीं साहब… साहब अकरम कादिर ही नाम है ना?

जीजा: हाँ क्या हुआ? कुछ दिक्कत है क्या?

आदमी: कुछ नहीं साहब। आपको मैंने जो बताया है आप उधर से ही चले जाओ। आपको मिल जाएगा।

जीजा: थैंक यू भाई साहब।

आदमी कुछ नहीं बोलता और बस खड़ा रहता है जैसे कुछ सोच रहा हो।

जीजा फिर कार आगे बढ़ाते हैं। तब पान की दुकान के पास खड़े दो आदमी में से बोलता है—

दूसरा आदमी: क्या हुआ सलीम भाई जान? क्या पूछ रहे थे?

सलीम: भाई यह शहर से तो कोई साहब आया है। उधर तालाब के खेतों के पास जो मस्जिद है उधर का रास्ता पूछ रहे थे।

दूसरा आदमी: क्यों सलीम भाई?

सलीम: भाई मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है। चलो उधर चलते हैं।

दूसरा आदमी: भाई जान मैं नहीं जा पाऊँगा। मुझे बेगम ने जल्दी ही बुलाया है।

तीसरा आदमी: भाई जान हम भी नहीं आ पाएँगे। हमें दुकान देखनी है।

सलीम: ठीक है मैं खुद ही देखकर आता हूँ उधर क्या चल रहा है।

इधर हम भी बताई हुई लोकेशन पर पहुँचने वाले थे।

हमें सामने एक खेत में झोपड़े के पास एक टेंट लगा हुआ दिखता है जो कि छोटा सा था।

हम उसकी तरफ जाने लगते हैं।

और उधर एक खाली खेत में हमने गाड़ी खड़ी कर दी और बाहर निकले।

जीजा: यह कैसी जगह है जहाँ कोई लोग ही नहीं दिख रहे… इधर शादी ही है ना?

दीदी: चलिए उधर जाकर ही देखते हैं…

जीजा ठीक, चलो। उसके बाद हम उधर टेंट के पास जाते हैं तो हम देखते हैं कि उधर अब्दुल और सुल्तान किसी एक औरत के साथ छेड़खानी कर रहे थे।

तभी उनकी नजर हमारे तरफ पड़ती है।

अब्दुल: अरे भाभी जान आप आ गईं। आपका ही इंतजार कर रहे थे कि आप आएँ और निकाह पूरा हो।

तभी जीजा बोले—

जीजा: पहले तो आप हैं कौन और मेरी वाइफ का इंतजार क्यों कर रहे थे?

यह सुनकर अब्दुल की गाँड फट गई। साला मैंने यह क्या बोल दिया।

अब्दुल: आप कौन हैं?

तभी दीदी बोलती हैं—

दीदी: यह मेरे हसबैंड हैं हरीश।

मतलब अकरम ने अपने प्लान के बारे में इनको भी नहीं बताया था। साला करना क्या चाहता है वो।

अब्दुल: अस्सलाम अलैकुम हरीश भाई जान।

जीजा: नमस्ते लेकिन आप कौन हैं?

तभी पीछे से हट्टा-कट्टा सुल्तान आता है।

सुल्तान: नमस्ते भाभी जान और हरीश भाई साहब। मैं हूँ सुल्तान और यह मेरा दोस्त अब्दुल। हम अकरम के दोस्त हैं।

जीजा: अच्छा।

तभी सुल्तान बोलता है—

सुल्तान: और रही भाई-भाभी का इंतजार करने की… क्योंकि भाभी जान हैं ही इतनी खास तो इंतजार तो करना पड़ेगा।

सुल्तान ने यह बात बोलते टाइम दीदी को पूरे से नीचे स्कैन कर रहा था और अपने होठों पर जीभ फेर रहा था।

जीजा: मतलब?

तभी पीछे से सुनीता आती है जो कि…

इतनी गदराई हुई माल लग रही थी क्या बताऊँ। उसके ब्लाउज में 34 के बूब्स कैद भी नहीं हो रहे थे और उसकी शरीर पर थोड़ी सी चमड़ी चार चाँद लगा रही थी। उसे देखकर तो मेरा मन कर रहा था एक बार मिल जाए क्या ही मजा आएगा।

मैंने जीजा की तरफ देखा तो वो भी सुनीता को ऐसे देख रहे थे जैसे खा जाएँगे। उनको ध्यान ही नहीं रहा कि उनकी पत्नी बगल में खड़ी है।

सुनीता: नमस्ते हरीश जी, नमस्ते नीतू जी…

सुनीता दीदी को देखकर एक अलग सा ही चेहरा बना रही थी जो मुझे भी समझ नहीं आ रहा था।

दीदी: नमस्ते। आपका नाम?

सुनीता: मैं सुनीता।

दीदी: आप क्या लगती हो?

सुनीता: आपको बाद में पता चल जाएगा कि मैं आपकी क्या लगती हूँ।

यह लाइन सुनीता ने एकदम जोर लगाके बोली।

इधर जीजा अभी भी सुनीता की बड़े-बड़े चुचियाँ देख रहे थे। जीजा के मुँह में तो पानी आ गया था सुनीता को देखकर।

सुनीता जीजा की तरफ देखकर—

सुनीता: क्या हुआ आपको हरीश जी?

हरीश: कुछ नहीं सुनीता जी।

सुनीता: (रंडीपने वाली आवाज में) तो आप मुझे ऐसे क्या देख रहे थे?

और जीजा की छाती पर एक बार हाथ फेर दिया।

जिसे दीदी देखकर शॉक हो गईं।

दीदी: क्या कर रही हैं आप?

सुनीता: वही जो तुम कर रही हो।

दीदी: मतलब?

सुनीता: बाद में पता चल जाएगा तुमको नीतू भाभी।

ऐसे ही बात चल रही थी तो अकरम एक झोपड़ी से निकलकर आता है।

उसने पठानी शेरवानी पहन रखी थी। साला अजीब सा ही लग रहा था।

वो आते ही बोला—

अकरम: ठीक से पहुँच गईं ना बेगम?

जीजा: क्या बोले आप?

अकरम: वो हमारे में भाभी को बेगम बोलते हैं। जैसे बहू-बेगम।

जीजा: अच्छा।

दीदी यह बात सुनकर मुस्कुराने लगीं।

दीदी भी सोच रही थीं कैसे अकरम मेरे ही पति के सामने मुझे बेगम बुला रहे हैं।

दीदी: हाँ ठीक से पहुँच गई अकरम जी।

और शरमाने लगीं।

जीजा को समझ नहीं आ रहा था कि इधर चल क्या रहा है।

तभी अकरम बोलते हैं—

अकरम: आपसे मिलकर अच्छा लगा भाई जान।

जीजा: आपसे भी मिलकर।

अकरम: तो आप थोड़ा बैठिए इधर। हम थोड़ा प्लान कर लें।

जीजा: ठीक है।

सुनीता: नीतू जी थोड़ा इधर आना। आपसे कुछ बात करनी है।

दीदी: आप इधर बैठिए। मैं आती हूँ।

जीजा: ठीक है।

अकरम सुल्तान के कान में बोलता है—

अकरम: इसको इधर ही बैठा कर रखो। उधर आने मत देना।

सुल्तान: ठीक है।

उधर सुनीता और दीदी टेंट के पास झोपड़ी में चली जाती हैं।

और उसके पीछे अकरम भी जाने लगता है।

मैं जीजा से बोलता हूँ—

मैं: जीजा मैं अभी टॉयलेट करके आया।

जीजा: ठीक है जाओ…

और मैं भी उनके पीछे चला जाता हूँ।

उधर झोपड़ी में सुनीता दीदी को बताती है—

सुनीता: पता है ना मैं अकरम जी की दूसरी बेगम हूँ।

दीदी: अकरम जी ने बताया था। और यह भी कि आपके बाद एक और है तीसरी बेगम भी। लेकिन आज तक आपसे मिलना नहीं हुआ था।

मैं यह बात सुनकर बौखला गया। क्या अकरम की यह दूसरी बेगम है और इसके बाद एक और है। साला बूढ़े ने ऐसे माल को फँसा कैसे लिया।

तभी दीदी—

दीदी: लेकिन आपके और तीसरी बेगम की तो तलाक हो गया था ना?

सुनीता: नहीं नीतू। हमारा तलाक नहीं हुआ। हम अभी भी अकरम जी की बेगम हैं।

दीदी: क्या? आप क्या बोल रही हैं? अकरम जी ने तो मुझे बोला था कि तलाक हो रखा है।

दीदी थोड़ा दुखी होने लगीं। तभी अकरम आता है।

मैं चुपचाप यह सब सुन और देख रहा था।

दीदी: आपने मुझसे झूठ बोला अकरम जी।

अकरम: क्या?

दीदी: आपने तो दोनों को तलाक दे दिया था।

अकरम: बेगम मुझे माफ कर दो। मैंने तुमसे झूठ बोला। मुझे डर था कि तुम मुझे छोड़ दोगी। इसलिए झूठ बोला।

दीदी: मत बोलिए आप मुझसे। और मुझे नहीं करनी निकाह। आप रहिए अपनी दोनों बेगमों के साथ।

अकरम: बेगम माफ कर दो मुझे। मुझे पता था ऐसा होगा। तभी मैंने आज इसको बुलाया था कि तुम्हें सब पता चल सके।

अकरम के चेहरे पर बिल्कुल भी पछतावा नहीं था। साला हरामी के चेहरे पर ही झूठ लिखा हुआ था। साला दीदी के सामने अच्छे बनने की एक्टिंग कर रहा था।

दीदी बहुत दुखी होती हैं। तभी पीछे से एक और औरत आती है और वो भी क्या कयामत लग रही थी।

सुनीता: आप आ गईं नीतू बेगम।

दीदी पीछे घूमती हैं और देखती हैं कि यह निर्मला है।

दीदी: (दुखी होकर) आप निर्मला हैं?

निर्मला: हाँ।

दीदी: आपको भी अकरम ने तलाक नहीं दिया?

तभी निर्मला एक्टिंग करने लगती है—

निर्मला: नीतू यह सच है कि हमारा तलाक नहीं हुआ। लेकिन वजह यह है कि अकरम जी हमें तलाक दे रहे थे लेकिन हम उनके बिना नहीं रह सकते थे। इसलिए हमने उनसे बोला अकरम जी हमें मत छोड़िए। हमारी हालत को देखकर अकरम जी को दया आ गई और उन्होंने हमें तलाक नहीं दिया। जिस तरह से आप अकरम जी के बिना नहीं रह सकतीं वैसे हम भी इनके बिना नहीं रह सकतीं।

ऐसे होते हुए निर्मला ने सुनीता और अकरम को आँख मारी और रोने की एक्टिंग करने लगी।

सुनीता: (रोते हुए) प्लीज नीतू बेगम हमारे रिश्ते को आप कबूल कर लो। इस तरह हम दोनों रह रही हैं वैसे ही आप भी जुड़ जाओ।

निर्मला: नीतू बेगम हम अकरम के बिना नहीं रह सकतीं।

दीदी को उनको रोता देख बहुत बुरा लगता है। दीदी सोचती हैं— मैं भी तो अपने पति को धोखा देकर अकरम से प्यार कर रही हूँ और यह भी करती हैं। अब मेरे कारण इनका प्यार अलग हो जाएगा। ऐसा मैं नहीं कर सकती। नीतू तू ऐसा नहीं कर सकती। इनके प्यार को जुदा मत कर। नीतू अपना ले अपनी दोनों सौतनों को और अकरम जी अपना ले।

तभी दीदी बोलती हैं—

दीदी: आप दोनों रोइए मत। चुप हो जाइए। मैं आप दोनों के रिश्ते को अकरम से तोड़ना नहीं चाहती। और मैं अकरम जी को इसी तरह अपनाने के लिए रेडी हूँ।

यह सुनकर सुनीता, निर्मला और अकरम खुश हो जाते हैं। और अकरम तो ऐसे खुश हो रहा था जैसे उसने कोई वार जीत ली हो।

निर्मला: आप कितनी अच्छी हैं छोटी बेगम।

दीदी यह सुनकर मुस्कुराने लगती हैं।

तभी सुनीता बोलती है—

सुनीता: आप तैयार हो जाओ नीतू हम दोनों की सौतन बनने के लिए।

दीदी: मैं तैयार हूँ आप दोनों की सौतन बनने के लिए।

ऐसा सुनकर अकरम खुश होकर दीदी के गले लग जाता है। पूरे जोश से दीदी को अपनी बाँहों में ले लेता है और दीदी की पीठ पर हाथ फेरने लगता है।

सुनीता: सारा प्यार हमारी नई सौतन को ही दोगे या हमको भी दोगे?

अकरम: अरे तीनों को एक साथ ही दूँगा अपना प्यार मेरी बेगमों।

और चारों गले लग जाते हैं और चारों बहुत ही खुश नजर आ रहे थे। तभी झोपड़ी में कोई आता है।

जब मेरी नजर उस पर पड़ी तो मैंने देखा— यह तो पान की दुकान वाला है। यह इधर क्या कर रहा है।

जैसे ही वो अंदर घुसता है—

सुनीता की नजर उस पर पड़ती है और वो बोलती है—

सुनीता: सलीम बेटा तुम इधर?

यह सुनकर अकरम पीछे देखता है कि पीछे कोई खड़ा है और वो जैसे ही घूमता है सलीम बोलता है—

सलीम: अब्बू आप इधर? दोनों अम्मियाँ आप भी इधर?

सलीम एक 34 साल का आदमी है जो कि अकरम की पहली बेगम से है।

अकरम की पहली बेगम से 4 बच्चे थे। एक सलीम, दूसरा उसका बड़ा भाई अनवर जो 42 साल का है और वो सलीम के साथ ही हैदरबाद में रहता है। इसकी दो बहनें भी हैं जिनकी शादी हो गई है। उनका कोई रोल नहीं है।

सलीम की बेगम का नाम नाजिया है जो 30 साल की है और दिखने में भी अच्छी है।

सलीम का एक बेटा है जो 5वीं क्लास में पढ़ता है। उसका नाम है साहिल।

अनवर की बेगम का नाम रुखसार है जो 39 साल की है। समय के साथ रुखसार का शरीर भी थोड़ा भर गया है जिसके कारण यही भरा हुआ शरीर दिखने में बड़ा कामुक लगता है।

अनवर का एक बेटा आमिर है जो 21 साल का है।

और उसकी एक बेटी हुमा है जो 19 साल की है।

यह सब हैदरबाद में रहते हैं एक घर में जो कि अकरम का ही घर है।

अब स्टोरी शुरू करते हैं।

सलीम: अब्बू आप इधर क्या कर रहे हैं? और बाहर यह सब क्या है? आप तो शहर में थे तो आप इधर कब आए? और यह तो मुझे थोड़ी देर पहले दुकान पर रास्ता पूछते हुए एक आदमी मिला था। उसकी औरत है यह। इधर क्या कर रही है और अब सब?

अकरम: बेटा थोड़ा साँस ले ले। आराम-आराम से बोल।

सलीम: पहले बताओ यह क्या चल रहा है इधर।

सुनीता: बेटा तुम्हारे अब्बू चौथी निकाह कर रहे हैं।

सलीम: क्या… आप क्या बोल रही हैं अम्मी?

अकरम: बेटा तुम्हारी अम्मी ठीक बोल रही हैं। मैं निकाह कर रहा हूँ। यह मिलो तुम्हारी नई अम्मी से।

जब अकरम यह बोला तो दीदी का चेहरा पूरा लाल हो गया था शर्म से।

अकरम: नीतू बेगम यह मेरा लड़का है सलीम।

सलीम: लेकिन अब्बू बाहर जो इसका मर्द बैठा है उसको यह सब पता है?

अकरम: नहीं बेटा।

सलीम: फिर यह सब कैसे?

तभी सुनीता—

सुनीता: तो मेरे पति को कौन सा पता था जब उन्होंने मुझसे निकाह किया था। मैं रह रही हूँ ना इनके साथ भी और उनके साथ भी। यह भी ऐसी ही रहेगी। क्यों मेरी छोटी सौतन?

दीदी: (शरमा गई और बोली) हाँ दीदी मैं भी वैसे ही रह लूँगी जैसे आप रह रही हैं।

दीदी के मुँह से यह सुनकर मेरा दिमाग खराब हो गया। दीदी यह क्या कर रही हैं। अकरम से निकाह तो ठीक था लेकिन अब अम्मी बनना, उसकी दो रंडियों को सौतन बनना— यह क्या चल रहा है। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था।

सलीम: तो अब्बू आप सच में नीतू अम्मी से निकाह करना चाहते हैं…

अकरम: हाँ बेटा।

सलीम: फिर ठीक है अब्बू। आपको निकाह के बाद घर चलना पड़ेगा नई अम्मी को लेकर सब से मिलने। निकाह होते ही।

अकरम: ठीक है बेटा। चल लूँगा।

सलीम: तो अब्बू तो निकाह कैसे करने हैं? उसके सामने या कैसे…

निर्मला: उसके सामने ही होगी पर चालाकी से।

जैसे ही यह बात चल रही थी कि कोई झोपड़ी के पास आ गया जिससे मैं खिड़की से दूर चला गया और वो साला उधर से जा ही नहीं रहा था कि मैं देखूँ। मुझे उधर खड़े-खड़े 15 मिनट हो गए। तभी सुनीता की आवाज आती है—

सुनीता: सब मस्जिद में चलो। निकाह होने वाला है।

जीजा: नीतू कहाँ है सुनीता जी?

सुनीता: वो दुल्हन के साथ है और वो भी जा रही है।

जीजा: मैं उससे मिल सकता हूँ?

सुनीता: अभी तो थोड़ा काम है। आप निकाह के बाद मिल लेना।

जीजा: ठीक है।

मुझे अब समझ नहीं आ रहा था कि जीजा के सामने निकाह होगा तो होगा कैसे।

उसके बाद सब मस्जिद में जाने लगे। अकरम, जीजा, अब्दुल, सुल्तान और सलीम जाने लगे।

तभी जीजा की नजर सलीम पर गई—

जीजा: अरे तुम रास्ता बताने वाले हो ना?

सलीम: हाँ मैं सलीम हूँ और यह शादी मेरे अब्बू की हो रही है।

जीजा: क्या? तुम्हारे अब्बू हैं अकरम?

सलीम: हाँ।

जीजा: एक बात बोलूँ बुरा मत मानना। तुम्हारे अब्बू को तो इस टाइम पोते खिलाने चाहिए और वो निकाह कर रहे हैं।

और हँसने लगे।

सलीम भी जीजा को बोलता है—

सलीम: पोता तो खिलाएँगे लेकिन उससे पहले अपनी नई बेगम से अपना बच्चा खिलाएँगे।

और इस पर हँसने लगा।

और जीजा भी हँसने लगे।

जीजा को क्या पता था कि अकरम का निकाह उनकी पत्नी से ही हो रहा है और सलीम उनसे होने वाले बच्चे की बात कर रहा है जिस पर जीजा हँस रहे हैं।

मुझे तो अब अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था कि मैंने दीदी का क्यों साथ दे दिया। दीदी को उसी टाइम अकरम से नाता तोड़ने को बोलना चाहिए था… ना ही यह रिश्ता इतना आगे तक पहुँचता। मुझे तो अब डर लग रहा था कि दीदी के कारण हमारा घर बदनाम न हो जाए। चलो तब का तब देखा जाएगा।

तो सारे मर्द मस्जिद में चले जाते हैं।

और मैं भी उनके साथ जाता हूँ। तभी मुझे दीदी-निर्मला दिखते हैं और उसके साथ एक औरत थी जिसने शादी का झोड़ा पहन रखा था।

मैं मन में— यह अब कौन है शादी में झोड़े में? कहीं यह सुनीता तो नहीं। अब तो जाकर ही पता चलेगा।

उसके बाद सब मस्जिद में पहुँच जाते हैं।

एक रूम था जिसमें बीच में मौलवी बैठा था और बीच में एक पर्दा था। जिस एक तरफ सारे मर्द थे और दूसरी तरफ सारी औरतें थीं। तो मैं भी मर्द की तरफ चला गया।

तो मौलवी बोलता है—

मौलवी: लड़का और लड़की आ गए हो तो निकाह शुरू करें।

सुल्तान: शुरू करो मौलवी साहब।

आगे क्या हुआ पढ़ें अगले पार्ट में।

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