मेरी दीदी बनी देसी रंडी 11
Didi ki shadi aur chudai ki sex story:- तो आपने पढ़ा कि हम सब अकरम के घर में एंटर होते हैं। अब आगे…
दीदी और अकरम अंदर जाते हैं।
अंदर जाते ही वो देखते हैं कि अंदर सलीम ने अपने पूरी परिवार वालों को अकरम की निकाह वाली बात बता दी होती है। अंदर घुसते ही सलीम का बेटा साहिल तेज से चिल्लाता है—
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Didi ki shadi aur chudai ki sex story
साहिल: नई दादी आ गई! नई दादी आ गई! येह्ह्ह्ह…!
सब लोग बहुत खुश से दिखते हैं और अकरम व दीदी का अंदर स्वागत करते हैं।
सब अंदर आते हैं और सारे लोग आँगन में चारपाई पर बैठ जाते हैं। नॉर्मल बातें करते हैं।
तब—
अनवर: आबू, आपने फिर से निकाह कर ली? वो भी वापस से शादीशुदा औरत से?
अनवर की बेगम रुखसार बोलती है—
रुखसार: आपके अब्बू का मन कहाँ भरता है…
और इस पर सब हँसने लगते हैं, पता नहीं क्यों।
बस दीदी, सुल्तान और सलीम नहीं हँस रहे थे। शायद उनको कुछ समझ में नहीं आया।
सलीम: ये सब छोड़ो। ये बताओ अब्बू का कमरा रेडी किया कि नहीं?
सलीम की बेगम नाज़िया: इतने टाइम में जैसा हो सकता था वैसे कर दिया मैंने अब… अच्छा छोड़ो…
अनवर: बेटा सलीम, सबके रहने का बंदोबस्त कर दो।
सलीम: आबू, आप और नई अम्मी उधर उस रूम में रह लेना। और अब्दुल, सुल्तान, निर्मला अम्मी, सुनीता अम्मी वो उस एक रूम में सो जाएँगे। और आमिर, साहिल और नई अम्मी का भाई इधर आँगन में सो जाएँगे।
दीदी: (अकरम से धीरे से) राहुल इधर बाहर कैसे सोएगा? ये कभी ऐसे नहीं सोया।
अकरम: रुको 1 मिनट… राहुल, तुमको इधर सोने में कोई दिक्कत तो नहीं है?
मेरा मन नहीं था तब भी मैं हाँ बोल देता हूँ।
मैं: नहीं अंकल, कोई दिक्कत नहीं है।
इस पर सुनीता बोलती है—
सुनीता: अब अकरम जी को अंकल मत बोलो। ये अब तुम्हारे जीजा हैं। इनको जीजा ही बोलो।
दीदी ये सुनकर बहुत शर्माती है।
चलो फिर सब सोने चलते हैं और सब अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं।
सुनीता, निर्मला, अब्दुल, सुल्तान उधर उस कमरे में चले जाते हैं और बाकी सब अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं। अकरम भी अपने कमरे में चला जाता है।
दीदी मेरे पास आती है और बोलती है—
दीदी: बाबू, तुझे कोई दिक्कत तो नहीं है ना?
मैं: दीदी, कोई दिक्कत नहीं है।
दीदी: मुझे अच्छा नहीं लग रहा तुझे ऐसे देखकर।
मैं: दीदी, ये तो मुझे बोलना चाहिए आपको। आप क्या से क्या बन गई हैं…
दीदी: क्या? मैंने समझी नहीं…
तभी रुखसार अंदर आती है और दीदी को एक दूध का गिलास दे देती है और बोलती है—
रुखसार: अम्मी जी, आज आपकी पहली रात है अब्बू के साथ। मजे करना!
और हँसने लगती है। उधर कमरे में अब्दुल अकरम से बोलता है—
अब्दुल: भाई जान, आज तो पूरी कसर निकाल देना। पूरा निचोड़ देना नितु भाभी को!
और हँसता है। उसके बाद दीदी मुझे देखते हुए अंदर कमरे में जाने लगती है। अब्दुल कमरे से निकलकर अपने रूम में चला जाता है।
दीदी अंदर जाती है… और उसके 1 मिनट बाद दीदी रूम के गेट के पास आती है और मेरी आँखों में देखते हुए गेट बंद करती है।
जिसे देखकर मुझे बहुत अजीब लगता है कि दीदी पहले कैसी थीं और आज दीदी किसी और के साथ, मेरे होते हुए, उसके साथ वो सब करने के लिए गेट बंद कर रही हैं। और दीदी के चेहरे पर कोई भी गिला-शुक्वा नहीं था…
दीदी गेट बंद कर देती है।
और इधर मुझे आमिर मुझे देखकर हँसता है—
आमिर: भाई जान, आज तो आपकी दीदी की खैर नहीं!
और हँसता रहता है। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने दीदी को अकरम से चुदते हुए देख चुका था… अब्दुल का लंड चूसते हुए देख चुका था। मुझे अब इसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
रात के 12 से ज्यादा हो रहे थे। इधर मैं और साहिल, आमिर सो रहे थे। और उधर दीदी अंदर… शायद सब सो चुके थे। और दीदी को अंदर गए भी 30 मिनट से ज्यादा हो चुका था।
मेरा एक मन कर रहा था कि देखा जाए अंदर क्या हो रहा है और एक मन कर रहा था कि नहीं, रहने देता हूँ। किसी ने देख लिया तो क्या सोचेगा…
ऐसे सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई।
सुहागरात (एपिसोड 1)
दीदी का नज़ारिया…
मैं और बाकी सब जब अकरम जी के घर में जा रही थी तो उनके घर के बाहर कुछ लोग थे जो मुझे देख रहे थे और पता नहीं क्या-क्या सोच रहे होंगे। उनको यही लग रहा होगा कि ये बुड्ढा इस उम्र में फिर से एक और वाइफ लेकर आ गया…
अकरम जी के घर के बाहर कुछ औरतें थीं और कुछ आदमी थे… जो शायद हमारे शोर-शराबे से जाग गए होंगे और देखने आए होंगे कि क्या शोर हो रहा है। और जब उन लोगों ने देखा होगा कि शोर किस चीज़ का है तब पता नहीं उनके मन में क्या चल रहा होगा… जो कि उन्हीं को पता है। शायद इन सबको पता होगा कि अकरम जी ने मेरे पहले 3 और निकाह कर रखा है और आज उन्होंने एक और कर ली… सारे लोग अजीब नज़रों से देख रहे थे। जैसे उन लोगों के मन में ये सवाल होगा कि इतनी सुंदर और अच्छी और सेक्सी लड़की ऐसे बुड्ढे को कैसे मिल गई… और मैं हूँ ही इतनी सेक्सी, क्या बताऊँ…???
उधर खड़े आदमी मुझे इतनी गंदी नज़रों से देख रहे थे कि अगर मैं इन सबको अकेले मिल जाऊँ तो मेरी खैर नहीं। कुछ ने तो मुझे देखकर अपना हथियार पैंट और धोती के ऊपर से मसल दिया… शायद सोच रहे होंगे कि आज ये हुस्न की परी, जन्नत की हूर इस बुड्ढे आदमी के साथ सोने वाली है और ये बुड्ढा आदमी इसको पूरा निचोड़ देगा…
और उधर सुनीता और निर्मला मेरे हुस्न का दीदार कर रही थीं… शायद सोच रही होंगी कि आज ये बेचारी हलाल हो जाएगी… पता नहीं क्या हाल होगा इसका आज की रात… शायद कुछ एक को मुझे पर तरस आ रहा होगा और कुछ एक को मज़ा कि अकरम आज सारी रात इसको पेलने वाला है।
मैंने मर्द लोगों की आँखों में हवस देखी… शायद सोच रहे होंगे कि काश उनकी किस्मत भी रामू जी जैसी होती… कुछ सोच रहे होंगे कि आज इसका वध कौन-कौन से पोज़ में होने वाला है… कुछ अपनी किस्मत को कोस रहे होंगे तो कुछ अकरम जी की किस्मत से जल रहे होंगे।
खैर, सलीम की वाइफ ने दरवाज़ा खोला और जैसे ही मैंने अंदर पाँव रखा तो मैं दंग रह गई।
क्योंकि कमरा इस कदर सजा रहा था जो देखने में बहुत कामुक था। और ये वही जगह है जहाँ मेरे शरीर के हर अंग का हलाल होने वाला है… अब मुझे समझ आया कि सलीम ने हमें घर के बाहर वेट करने को क्यों बोला। सारे कमरे से फूलों की हल्की-हल्की खुशबू आ रही थी… बेड पर भी फूलों की पत्तियाँ थीं और बेड के चारों तरफ छत से बेड तक फूलों की मालाएँ और कुछ गुब्बारे लटक रहे थे।
इन दोनों ने टेबल को सरका के बेड के साथ हेडरेस्ट की तरह लगा दिया था… उसके ऊपर एक थाल में फूलों की पत्तियों में सजा के दिया जल रहा था और साथ में एक दूध का गिलास, कुछ सामान, फल, रुई, कुछ नए छोटे टॉवल और चॉकलेट्स थीं।
मुझे बहुत ज़ोर से पेशाब आ रहा था तो मैंने सुनीता जी को कहा—
मैं: मुझे पेशाब करने जाना है।
सुनीता जी: (मुस्कुराते हुए मुझे चिढ़ाते हुए) अभी से पानी निकल गया… अभी तो पूरी रात बाकी है!
मैं कुछ न बोली और बाथरूम में घुस गई। मैंने पहली बार हमारा ये वाला बाथरूम देखा था। छोटा सा बाथरूम… इंडियन स्टाइल सीट… दरवाज़े के ठीक सामने वाली दीवार पर एक छोटा वॉश बेसिन, उसके ऊपर एक शीशा और शीशे व बेसिन के बीच एक लकड़ी का फट्टा… जिस पर साबुन, ब्रश जैसा सामान था। शीशे के एक साइड पर कुछ कीलें लगी हुई थीं, जहाँ एक नया टॉवल और कुछ इनके कपड़े टंगे हुए थे।
अब मुझे अपने पैरों पर बैठके पेशाब करना था। मैंने अपने हाथों से लहंगा उठाया और बैठ गई। पेशाब करने के बाद मैंने अपने हाथ धोए और टॉवल लेने के लिए उस तरफ झुकी। वहाँ इनके कुछ यूज़ किए कपड़े, बनियान और अंडरवियर टंगे हुए थे… उन सब कपड़ों में से मुझे एक स्मेल सी आई… शायद पसीने की स्मेल… पर मुझे वो स्मेल मोहित कर गई।
पता नहीं क्यों पर मैंने उस कपड़े को छुआ और अपने गाल उन पर रगड़ने लगी… तभी देखा कि उनको रगड़ते वक्त मेरा नाक ठीक इनके एक अंडरवियर के ऊपर था… आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह क्या प्यारा एहसास था… मैंने उसे चूमा और शर्मा गई।
अब मैं बाहर आई तो देखा इन लोगों ने रूम की लाइट बंद कर दी थी और एक बहुत जगमग करके रंग बदलने वाली LED की लड़ी ऑन कर दी थी और उस पुराने स्टीरियो पर गाना चल रहा था—
“सैय्याँ ने देखा ऐसे… मैं पानी-पानी हो गई…”
मैंने उन दोनों की तरफ देखा और शर्माते हुए हँस दी।
अब दोनों ने मुझे बेड के बीचों-बीच बिठा दिया और मेरा लहंगा अच्छी तरह से गोल आकर में बिछा दिया। फिर सुनीता जी ने मेरा थोड़ा फेस का टच-अप किया और मेरी चुनरी से मेरा घूँघट निकालते हुए चुन्नी को पिन अप किया। फिर दोनों ने थोड़ा पीछे हो कर मेरा मुआयना किया और फिर हँस दी।
मुझे नहीं पता था कि अकरम जी या सुनीता और निर्मला जी ने पहले ही ये सब सामान ले रखा है। उनको पता था सुहागरात तो होगी पर कहाँ होगी ये चेंज हो गया था…
तभी सुनीता बोली—
सुनीता: नितु, वो सामने जहाँ ये टेबल पड़ा हुआ करता था… वहाँ हमने तेरा लाया हुआ सब सामान रख दिया है। रात को भूख लगे तो फल और चॉकलेट्स हैं। हमने रुई का पैकेट और ये तौलिए भी रख दिए हैं… अगर खून निकला तो इनसे साफ कर लेना… और उस छोटे डिब्बे में क्रीम और कंडोम्स हैं…
इतने में निर्मला झट से बोली—
निर्मला: और एक शीशी में मैंने सरसों का तेल भी रख दिया है!
मैंने मुस्कुराते हुए सर हिला दिया।
सुनीता जी: रुही दीदी मेरी बातों का ध्यान रखना… ये मर्द लोगों को कोई परवाह नहीं होती… इन्हें तो बस औरत की चूत से मतलब होता है… बस जहाँ भी अकरम डाले आप उस अंग को सिकुड़ना ना… ढीले छोड़ के रखना… औरत का तो जिस्म ही मर्द के भोगने के लिए बना है… बस आप अपने हथियार उसके सामने डाल देना… वो जो चाहे उसको करने देना।
सुनीता बोलती रही—
सुनीता: लंड का सुख सब दुनियादारी भुला देता है… आपको जितना चीखना है चिख लेना… चीखने से दर्द का आभास कम होता है… शर्माना नहीं कि बाहर लोग सुन रहे होंगे… सबको पता है कि आज रात इस घर से मधुर चीखें निकलनी ही हैं।
अब निर्मला हँसते हुए कहने लगी—
निर्मला: नितु, बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी… बस तू पूरा समर्पण करके अपनी कटोरी अकरम जी से अच्छी तरह से मँजवा लेना।
सुनीता जी: हाँ पर ये कटोरी सर्फ से नहीं… सरसों के तेल से मँजवाना!
और हम सब हँस दीं।
इतने में इनका कॉल आया सुनीता के फोन पर तो सुनीता ने स्पीकर ऑन करके कहा—
सुनीता: हाँ रे अकरम जी, क्या हुआ?
अकरम जी: (धीमी आवाज़ में) और कितनी देर लगेगी?
ऐसा लग रहा था कि ये बाहर आकर साइड से फोन कर रहे हैं।
सुनीता: आपको बड़ी जल्दी है… आप वहाँ अपने दोस्तों से बातें करो।
अकरम जी: (थोड़ा गुस्से से) भेनचोद ये रात क्या दोस्तों से बातें करने की है?
सुनीता: तो और क्या करने की है?
अकरम जी: (बड़े प्यार से) अपनी बेगम को देखने की रात है… उससे प्यार भरी बातें करने की रात है… उसे अपनी बाहों में भरने की रात है।
ये सब सुनते मैं भी भावुक हो गई।
सुनीता: बस यही सब करना है… और कुछ नहीं?
अकरम जी: (अब थोड़ा मर्दानगी से) अब ये भी सुनाना चाहती है कि उसको सारी रात बजाना है… उसकी धज्जियाँ उड़ानी हैं… उसके जिस्म को तार-तार करना है अपने नीचे… साला अब वेट नहीं होता।
मैं उनकी बातें सुनकर शर्म से पानी-पानी हो रही थी और ये दोनों उनका मज़ा ले रही थीं।
सुनीता: बस थोड़ा सा और सह लो… मैं और निर्मला बस जाने ही वाले हैं… जब हम निकल जाएँ रूम से तो आपको बता देंगे तब आप आ जाना।
अकरम जी: तो निकल जल्दी मेरे रूम से!
मैं उनकी बेचैनी देख हँस दी।
निर्मला: हाँ हाँ जा रही हूँ… पर नितु के साथ आराम से पेश आना… भूखे शेर की तरह झपटना नहीं… बहुत नाज़ुक है… जो भी करना है आराम से करना।
अकरम जी: वो मैं देख लूँगा… तू बस चलती बन वहाँ से।
और कॉल काट दी।
सुनीता अब निर्मला की तरफ देखती बोली—
सुनीता: नितु को तो आज ऊपर वाला ही बचा सकता है… बहुत तड़प रहे हैं… चलो निर्मला चलते हैं… नितु को इनके हाल पर छोड़ देते हैं।
निर्मला: (थोड़ा सा चटखारे लेती) सुनीता तू कहे तो हॉस्पिटल में इमरजेंसी में एक बेड अभी से बुक कर दूँ क्या?
और दोनों हँस पड़ीं।
अब सुनीता और निर्मला मेरे पास आईं और थोड़ा सा इमोशनल और रुआँसी आवाज़ में सुनीता बोली—
सुनीता: हम चलते हैं…
और दोनों दरवाज़ा बंद करके चले गए।
अब मैंने कमरे में एक बार दोबारा नज़र डुलाई और बेड की तरफ देखा। इस सुहाग सेज पर बैठे एक अलग ही भाव थे मेरे अंदर। चाहे ये मेरी ज़िंदगी की दूसरी सुहागरात थी पर ये मुझे बहुत शुद्ध और आदरणीय लग रही थी। हरिश के साथ तो बस खेल-खेल में सब हुआ था। मुझे इस तरह सजा कर बेड पर आने वाले पलों के लिए तैयार करके बिठाया भी नहीं गया था… हरिश के टाइम पर हम सब अपने दोस्त लोगों के साथ बैठे थे और बाद में दोनों सीधा अपनी सुहागरात वाली जगह पर आ गए थे।
कोई फीलिंग, एक्साइटमेंट या शुद्धता नहीं थी… पर आज मैं किसी सुहागरात वाली जगह पर नहीं हूँ… आज मैं अपने सुहाग कक्ष में हूँ… आज मैं किसी के साथ अंदर नहीं आई… बल्कि अपने मर्द का सुहाग सेज पर बैठी इंतज़ार कर रही हूँ… आज कोई हँसी-मज़ाक वाली भावना नहीं है… आज एक समर्पित हो जाने वाली भावना है… आज मैं कोई फन नहीं करने वाली… आज मैं किसी जोशीले मर्द के नीचे लेटने वाली हूँ… आज मैं कोई लड़की से औरत नहीं बनाने जा रही… आज मैं औरत से संपूर्ण औरत बनाने जा रही हूँ… आज मुझ जैसे खिले फूल को एक मर्द मसल कर मेरी पत्तियाँ-पत्तियाँ करने वाला है।
झट से शरारती मन बोला—
“तो कुमारी कामत साहिबा आ ही गई इस बिस्तर पर… आज तेरा भँवरा तेरे हुस्न के रस की बूँद-बूँद पीने वाला है… पता नहीं कैसे और कहाँ-कहाँ तुझे भोगेगा… आज वो शेर तेरी बिल्ली मार कर ही रहेगा… आज पता नहीं तू कितना उछलेगी इस बिस्तर पर।
और सुन… सुबह उठ कर ये चादर और इस पर लगे खून के धब्बों को सँभाल कर रख लेना… ये तेरे और अकरम जी के पहली सुहागरात मिलन की गवाह रहेगी… क्या पता तू अपने पहले बच्चे को भी इसी कमरे में और इसी बिस्तर पर जन्म दे… और अब पैरों पर बैठ कर पेशाब करने की आदत डाल ले… हेहेहेहेहे।”
इसी बेड पर अपने पहले बच्चे को जन्म देने के खयाल से ही मैं झुनझुना गई। मुझे लगा जैसे एकदम से मेरी चुचियाँ दूध से भर गई हों। अब मैं भी दिल में कहने लगी—
“कहाँ रह गए जी… अब आ भी जाओ ना…”
मैं भी अब थोड़ा व्याकुल हो गई।
इतने में मैंने दरवाज़ा खुलने की आहट सुनी और बुरी तरह से मेरा दिल धड़क उठा। मैं अपने लहंगा-चोली में और सिमट गई… मैं बिस्तर पर और भी सिकुड़ गई… बुरी तरह से शर्मा गई। कि अब वो पल आ गया जब मैं हमेशा के लिए इनकी होने जा रही हूँ। हम एक तरह से रोज़ ही मिलते थे, साथ में घूमने भी जाते थे… पर इस वक्त मैं किसी और ही भावनाओं के चलते शर्म से दुहरी हो रही थी।
ये दरवाज़े को अंदर से बंद करते सीधे मेरे पास आए और बोले—
अकरम: तो मेरी बेगम, नींद तो नहीं आ रही?
मैं कुछ न बोली और घूँघट में मुँह छुपाए बैठी रही। सच मानो तो मुझे आज पहली बार घूँघट के रिवाज़ का महत्व पता चला। ये ऐसी समय का वो ज़ीना सा पर्दा होता है पति-पत्नी में, जो थोड़ा सा सुकून और टाइम देता है एक औरत को इस समय का सामना करने के लिए।
फिर इन्होंने पूछा—
अकरम: अब ऐसे ही बैठे रहें या मैं घूँघट उठा दूँ?
मैंने शर्माते हुए हाँ में सर हिलाया। इनके हाथ आगे बढ़े… मेरा दिल फिर ज़ोरों से धड़का…
इन्होंने मेरा घूँघट दोनों हाथों से पकड़ा… मेरी नज़रें और नीचे को गड़ गईं…
इन्होंने घूँघट उठाया… मैं और शर्माई…
इन्होंने घूँघट मेरे सर के ऊपर किया… मैंने झट से अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया।
ये न माने और मेरा हाथ हटाने लगे… मैंने अपने हाथ और कस लिए।
इन्होंने ज़ोर से मेरे हाथ अलग किए… मैंने झट से अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया।
इन्होंने मेरी ठुड्डी को पकड़ कर मुझे घुमाने की कोशिश की… मैं और ज्यादा मुँह मोड़ लिया।
फिर इन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे मुँह को पकड़ के अपनी तरफ घुमाया… मैंने झट से इनकी छाती में मुँह छुपा लिया।
इन्होंने मुझे अपनी शक्तिशाली बाहों में भींचा… मैं इनकी छाती के अंदर और घुस गई।
इन्होंने मेरी जुल्फों को मेरे कान के पीछे किया… मैंने इनके कंधे पर सर रख दिया।
फिर ये एकदम से खड़े हुए… मैं नीचे देखती बैठी रही।
ये मुझे देखते बोले—
अकरम: भेनचोद एक चीज़ तो भूल ही गया मैं।
अब की बार मैंने सवालिया नज़रों से इनकी तरफ देखा।
फिर कुछ अपनी जेब से निकालते बोले—
अकरम: अपना हाथ दे इधर।
मैंने शर्माते हुए हाथ इनकी तरफ बढ़ाया। तो फिर अकरम जी ने उस डिब्बिया को खोला और एक बहुत ही प्यारी सी नोज़ रिंग मेरी नोज़ में लगाने लगे जिससे मैं पागल सी हो रही थी। पहली बार कोई मर्द मुझे नोज़ रिंग पहना रहा था…
मैंने देखा वो गोल्ड की नोज़ रिंग थी… फिर उस पहनाने के बाद मेरे नोज़ के ऊपर एक किस कर दिया…
अकरम: (चूमते हुए) पसंद आई क्या?
मैं: जी बहुत सुंदर है।
मैंने इनको देखते कहा—
मैं: जी वो लाल वाला पैकेट ला देंगे मुझे?
और मैंने जहाँ सुनीता जी मेरा सामान रख कर गई थीं… उस तरफ इशारा किया।
ये जब लेकर आए तो मैंने पैकेट खोला। जो मैंने अकरम जी के लिए था…
उसमें अकरम जी के लिए एक धोती और कुर्ता था… और एक सोने की चेन थी।
अकरम: बेगम इसकी क्या ज़रूरत… रहने दे…
तो मैं थोड़ा नाराज़गी जताते बोली—
मैं: मुझे भी इस नोज़ रिंग की ज़रूरत नहीं है… मुझे भी आप ही चाहिए बस।
अकरम जी हँस दिए और बोले—
अकरम: हाहाहाहा चलो ये नाराज़गी बंद करो और आगे का कार्यक्रम चालू करते हैं।
मैं इनके कहने का मतलब समझ के शर्मा गई। इन्होंने सारा सामान टेबल पर रखा और अपने जूते उतार कर मेरी साइड पर औंधे लेट गए अपनी कमर बेड के हेडबोर्ड पर लगा के। फिर मुझे कंधे से पकड़ कर अपनी तरफ लिटाने लगे। इनका हाथ लगते ही मैं बुरी तरह से काँप उठी। मुझे पता था कि अब क्या होने जा रहा है।
मैं इनके कंधे पर सर रखकर लेट गई। ये बोले—
अकरम: देख नितु… दिल तो मेरा कर रहा है कि बहुत सारी बातें करें… पर ये मादरचोद लंड है कि मानता नहीं।
मैंने शर्मा के अपने मुँह इनकी छाती में छुपा लिया। ये थोड़ा नीचे सरके और मेरे मुँह के बराबर आ गए। मेरी आँखों में देखते बोले—
अकरम: अब तो रोज़ रात को इस हुस्न की मदिरा पीनी है।
मैंने भी इस बार न नज़रें झुकाईं और न ही झपकी पर बोली कुछ नहीं। अब इनकी बाहें मेरी तरफ बढ़ीं और मुझे आलिंगन में ले लिया। धीरे-धीरे इनके होंठ मेरे होंठों की तरफ बढ़े और पल झपकते ही इनके होंठों ने मेरे होंठों पर अपना कब्ज़ा कर लिया। ये इनका पहला हमला था और शांत के अनुसार मैंने भी अपने हथियार डाल के इनका साथ देने लगी।
अब हमारी ज़ुबानें एक-दूसरे के मुँह में जाने लगीं… आज ज़ुबानों में लड़ाई नहीं पर मधुर मिलन हो रहा था… आज हमारे थूक एक-दूसरे के अंदर नहीं जा रहे थे… बल्कि हम एक-दूसरे के थूक को पी रहे थे। लाप्प्प्प्प् लाप्प्प्प्प्प्… पुच्च्छ्छ्छ पुच्च्छ्छ्छ की आवाज़ें आ रही थीं।
अब इनके हाथ मेरे जूड़े पर गए और इन्होंने मेरी चुनरी निकाल दी और मेरे बाल खोल दिए। बाल खुलते ही ऊपर वाली साइड से मेरे बाल हम दोनों के ऊपर आ गए और हमें ढक लिया। जैसे मेरी जुल्फें कह रही हों—
“तुम लोग लगे रहो… मैं तुम्हें इस दुनिया से छुपा के रखूँगी।”
अब ये कभी मेरे नीचे होंठ को चूसते तो कभी दाँतों में फँसा के खींच लेते। कभी ऊपर के होंठ पर जीभ फेरते तो कभी मेरे फेस पर चुंबन की बारिश कर देते। मैंने भी पीछे न रहते हुए एक आज्ञाकारी पत्नी की तरह इनके पीछे-पीछे इनकी राह पर चलती गई।
ये चुमा-चाटी 15-20 मिनट चली रही और मैं इनके चुंबनों का और इनके थूक का सेवन करती रही। फिर ये उठे और मेरी चोली निकालने लगे। मैं बुरी तरह से डर गई। इनके हाथों को रोकना चाहा… थोड़ा तरसी नज़रों से इनको देखा भी पर पता ही तब चला जब इन्होंने पीछे से हुक खोल दिए।
फिर मुझे बिठाया और चोली निकाल दी। अब मेरे ऊपरी हिस्से में बस मेरी सेक्सी सी ब्राइडल ब्रा रह गई।
चोली निकाल कर इन्होंने बेड के नीचे फेंक दी। मैंने झट से अपने दोनों हाथों से अपनी चुचियाँ छुपा लीं। मेरी ब्रा में कैद मेरे कबूतर फड़फड़ा उठे और जैसे मुझे कह रहे हों—
“खबरदार नितु अगर तू हमारे और हमारे आशिक के बीच आई तो।”
अब आलम ये था कि मैं तो शर्मा रही थी… काँप रही थी पर इनकी आँखों में हवस का जुनून था। अब इन पर मेरी किसी भी प्रतिक्रिया का कोई असर नहीं हो रहा था… ये तो अपनी मंज़िल की तरफ निकल चुके थे… इनको रोकना अब मेरे बस में नहीं था… शायद इसी को असली मर्द कहते हैं… शायद मेरे जीवन में ऐसे ही मर्द की कमी थी… पर एक नारी होने की वजह से शर्म के भावों को मैं रोक नहीं पा रही थी।
इन्होंने मेरी चुचियों को दबाना शुरू कर दिया और साथ ही साथ मेरे सपाट पेट को चूमने लगे। मेरी नाभि में अपनी जीभ गोल-गोल घुमाने लगे। मैं बुरी तरह से थरथरा ने लगी। फिर इनका मुँह ऊपर आया और सीधा मेरी ब्रा के ऊपर से ही मेरी एक बच्ची को निगल गए और दूसरी वाली का अपने हाथ से गला दबाने लगे। कुछ देर करने के बाद शायद इनको समझ लगी कि बेचारियाँ मर ही न जाएँ तो अपनी प्रक्रिया उल्टी करते हुए दूसरी को निगला और पहली का गला दबा दिया। ये सब यूँ ही चलता रहा।
फिर इन्होंने मेरी बाजू को ऊपर किया और मेरी बाईं बगल को चाटने लगे और चाटते हुए पूरी बाजू को चाट कर मेरी उंगलियों को चाट लेते। फिर वही प्रक्रिया दूसरी बाजू के साथ की। मेरे सारे के सारे गहने अभी भी मेरे शरीर पर थे। फिर इन्होंने मेरी ब्रा के हुक खोले… मैंने रोका पर अब ये पूरे जानवर बन गए थे। अब प्यार से ज्यादा हवस का नशा था इन पर। जब इन्होंने ब्रा निकालनी चाही तो मैंने अपनी ब्रा और ज़ोर से पकड़ ली।
ये गुस्से से मुझे बोले—
अकरम: भेनचोद… उतरने दे मुझे… बहुत तरसा हूँ मैं इस घड़ी के लिए।
इनका ये रूप देखते मैं डर गई… मेरी पकड़ ढीली हुई और एक पल में मेरी ब्रा भी मेरी चोली के ऊपर जा गिरी।
अकरम जी ने बड़े प्यार से मेरी दोनों बच्चियों को निहारा और फिर उन पर टूट पड़े…
अकरम जी ने दोनों चुचियों को दोनों हाथों से ज़ोर से दबाया…
मैं: जी धीरे… दाआआर्द होता है!
इन्होंने एक चुची को ज़ोर से चूसा—
मैं: जीईई… आआआह्ह्ह्ह्ह्ह उउउफ्फ्फ्फ!
इन्होंने दूसरी चुची को मुँह में लेकर काटा…
मैं: मम्मीyyyyyyyy!
अब इन्होंने मेरे निप्पल को ज़ोर से अपने दाँतों में फँसा के खींचा…
मैं: माआर्र्र्र्र गआआआयी!
मेरी बाईं वाली चुची के आस-पास हाथ लेकर मेरी आगे वाली आधी चुची जो इनके हाथ से बाहर आ गई थी उस पर ज़ोर से चुप्पा मारने लगे… और गुलाप-गुलाप की आवाज़ आने लगी। मेरी दोनों चुचियाँ अब पूरी तरह से लाल हो चुकी थीं। बेचारी दोनों अपने हाल पर रो तो रही थीं पर उनको वो सुख भी मिल रहा था जिसका उन्हें आज तक ज्ञान भी न था।
ये क्रिया काफी देर चलती रही। मैंने महसूस किया कि इनकी हर क्रिया शायद इन पर दारू के एक पेग की तरह असर कर रही थी और इनका जानवर और जोश से भर रहा था।
ये कठोर आवाज़ में बोले—
अकरम: बेड से उतर कर खड़ी हो जा।
मैं इनके हुक्म का पालन करती खड़ी हुई… ये उठे और एक-एक करके जल्दी-जल्दी मेरे सारे गहने उतारने लगे।
जब कान के झुमके उतारने लगे तो जल्दी में झुमकों को खींच लिया… मैं दर्द से थोड़ा चीखी पर ये तो अपनी ही धुन में थे… या तो इन्होंने सुनी नहीं या अब इन पर मेरी चीख का कोई असर नहीं हो रहा था।
देखते ही देखते मैं गहनों से मुक्त हो गई। अब ये बेड पर बैठ गए और मुझे खड़ी को ही अपनी तरफ घुमा लिया और स्लुर्र्र्र्प स्लुर्र्र्र्प करते मेरे पेट को चूमने लगे। मैं इनके सर पर अपने हाथ रख के सहलाने लगी।
अभी ये कुछ बोल नहीं रहे थे और अपने ही काम में मग्न थे। हरिश भी सेक्स के टाइम बोलता नहीं था तो मुझे दोनों में एक बात समान लगी। मुझे पता ही नहीं चला कि कब इन्होंने मेरे लहंगे का नाड़ा खोल दिया और वो मेरे पैरों में गिर गया।
अभी मैं कुछ समझ पाती ये झट से खड़े हुए और मुझे हल्का सा उठा के बेड पर गिरा दिया। इन्होंने मुझे ऐसे बेड पर फेंका जैसे कॉलेज से घर आते कोई बच्चा अपना कॉलेज बैग फेंकता है।
अभी मैं बेड पर सँभली ही नहीं थी कि ये ऊपर आए और मुझे दबोच लिया…
मैं: करिम्ममम जीईईई… आआआह्ह्ह्ह्ह!
अब ये मुझे ऊपर से नीचे तक चूसने लगे… मेरी टाँगों को हवा में उठाते और पूरी टाँग को जाँघों से लेकर पैर की उंगलियाँ तक चाट लेते। बीच-बीच में जब ये काट खाते तो मैं दुहरी हो इनको रोकने की नामुमकिन कोशिश करती तो ये ज़ोर से मुझे बेड पर धकेल देते।
अब इन्होंने मुझे पेट के बल कर दिया और फिर मेरी पीठ को चूमा और चाटा… कमर को चाटा… मेरे उभरे हुए कुल्हों को मेरी पैंटी के ऊपर से ही चुभन दिए… उन्हें हाथों से ज़ोर से दबाया… उन्हें काटा, जाँघों को कभी अलग करके चूमते चाटते तो कभी दोनों को एकदम से सटा के…
अभी ये सब करते इनको एक घंटे से भी ज्यादा हो गया था… इनके सारे कपड़े अभी भी उतरने बाकी थे और मेरी बस चड्डी ही बची थी… मैं एक ऐसे अनोखे सफर पर थी कि मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था… पर मैं वो सब पा रही थी जिसके मैं सपने लेती थी या यूँ कहूँ जिस चीज़ की मेरे जीवन में कमी थी।
अब इन्होंने मुझे सीधा किया और आप बेड से उतरे। इन्होंने एक-एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए और सिर्फ एक अंडरवियर रह गया… मैंने शर्म से अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया। ये झट से बेड पर आए और मुझे अपनी तरफ घुमा कर चूमने लगे। मैं भी इनका साथ देने लगी।
अब ये मुझसे लंबे हैं तो जब हम आपस में चूम रहे थे तो इनका लंड मेरी नंगी जाँघों पर घिस रहा था। ओममममग्ग्ग्ग्ग्ग मुझे एक बाँस-बाल के दंडे जैसा प्रतीत हुआ… इतना लंबा… इतना मोटा… और बहुत ही शक्तिशाली… किसी लोहे के सरिये जैसा… मैंने मन में सोचा मैं तो 9-10 इंच का सोच रही थी… ये तो उससे भी बड़ा लग रहा है।
अब ये चूमते-चूमते नीचे की तरफ गए और जा कर मेरी पैंटी के ऊपर होंठ रख दिए। मैं झट से उठ बैठी और इनका मुँह पकड़ के ना में सर हिलाने लगी।
ये फिर उसी जानवरी आवाज़ में बोले—
अकरम: साली तू क्या मुझे रोक लेगी? अगर मुझे गुस्सा आ गया ना तो तेरी इस चूत का भर्ता बना दूँगा अपने दाँतों से… हटा अपने हाथ!
पर मैं न मानी तो इन्होंने मुझे गर्दन से पकड़ कर वापस लिटा दिया… कोई दया, कोई तरस के भाव अब इनमें नज़र नहीं आ रहे थे… ये फिर नीचे गए तो मैंने अपनी दोनों टाँगों को आपस में भिड़ा के टाइट कर ली।
ये देखकर अकरम जी हँसे और बोले—
अकरम: लगता है मुझे अपना कसाई रूप दिखाना ही पड़ेगा।
और ज़ोर से मेरी टाँगें अलग करने की कोशिश की फिर से। मैंने ऐसे ही चिपकाई रखी अपनी टाँगों को। अब लगता था कि मेरे रोकने की वजह से इन्होंने अपना इरादा बदल लिया। अब ये मेरी पैंटी के ऊपर से नहीं मेरी पैंटी को उतार कर मेरी चूत चूमना चाहते थे। जैसे ही इन्होंने मेरी पैंटी में अपनी उंगलियाँ फँसाई वैसे ही मैं झट से बैठ गई और इनके हाथ पकड़ लिए।
मैं गिड़गिड़ाती इनकी तरफ देख के बोली—
मैं: जीईई प्लीज़्ज़्ज़ इसे मत उतारोooo!
इनको अब गुस्सा आ गया और बोले—
अकरम: मादरचोदनी इसको उतारूँगा नहीं तो तुझे चोदूँगा कैसे?
मैंने गिड़गिड़ाते हाथ जोड़े इनके सामने।
अकरम: भेनचोद अभी तो पता नहीं कितनी बार हाथ जोड़ेगी तू रात भर… मैं जब सेक्स करता हूँ तो मुझे बस अपनी भड़ास से मतलब होता है… तू गिड़गिड़ा या हाथ जोड़ या मेरे पैरों में गिर… मुझे उससे कोई लेना-देना नहीं है।
और इन्होंने दोबारा से मेरी कच्छी उतारनी चाही। मैं इस बार डर के मारे बिस्तर पर चुई-मुई सी खड़ी हो गई।
अकरम: नितु क्यों कर रही है ऐसा… इस घर में हम प्यार करने वाले मियाँ-बेगम हैं… पर इस बिस्तर पर तू मेरी जोरू और मैं तेरा मर्द हूँ… यहाँ सेक्स ऐसे होगा जैसे एक रंडी और उसके ग्राहक करते हैं… चल उतरने दे मुझे।
मैं फिर गिड़गिड़ाई—
मैं: प्लीज़्ज़्ज़्ज़ अकरम जी जीईईई!
मुझे पता नहीं आज शर्म आ रही थी। अकरम जी और मैंने पहले एक बार सेक्स कर लिया था पर पता नहीं कैसे आज मुझे कुछ अजीब लग रहा था…
अकरम जी बोले—
अकरम: तू ऐसे नहीं मानेगी।
और मेरे दोनों पैर पकड़ के बेड पर घसीट लिया… मैं दीवार से रगड़ती हुई बेड पर गिरी… वो तो बेड का हेडबोर्ड पतला था नहीं तो मेरे सर का पिछला हिस्सा हेडबोर्ड पर टकराता।
अभी मैं गिर के अपने आप को सँभाला ही नहीं था कि अकरम जी ने झट से मेरी कच्छी उतार के नीचे गिरा दी… मैंने अपनी टाँगें दोबारा से भिड़ा के टाइट कर लीं और अपने दोनों हाथ जाँघों के ऊपर चूत वाली V पर दबा के रख लिए।
अकरम जी किसी हवस में मचले हुए साँड की तरह सर हिलाते मेरे हाथों की तरफ गए जो मेरी V पर थे और हाथों को काट खाया… मैं ज़ोर से चिल्लाई और दर्द के मारे मेरे हाथ वहाँ से उठ गए। मौके का फायदा उठाते अकरम जी ने मेरी दोनों हाथ कलाईयों से पकड़ के मेरी चुचियों के पास दबा दिए। इससे क्या हुआ कि अब मेरे हाथ उनके एक हाथ की हथकड़ी में थे… और उन्होंने इस कदर उन्हें मेरी चुचियों के बीच दबा रखा था कि मैं अब बैठ भी नहीं सकती थी।
अब उन्होंने दूसरे हाथ से मेरी टाँगें खोलनी शुरू कर दीं… मैं एक फूल जैसे कोमल लड़की इतने जोशीले और ताकतवर मर्द का कहाँ तक सामना कर पाती।
अकरम जी ने मेरी चूत को देखते ही अपनी लार टपकाते कहा—
अकरम: आआआह्ह्ह्ह्ह्ह ये चीज़ आज मैं 4 साल बाद देख रहा हूँ… ये अनमोल हीरा आज से मेरा हो जाएगा।
अकरम जी ने फिर मेरी चूत का चुंबन लिया और उसे देखते हुए कहा—
अकरम: तू मेरी बेगम है आज से… आज मैं अपने लंड का ताज तेरे सर पहनाऊँगा… आज तेरी माँग अपने पानी से भरूँगा… तेरी कोख को सींच के उसमें एक नन्हा मुन्ना पौधा लगाऊँगा।
वो किस करते और फिर बोलते—
अकरम: मुझे माफ करना… मैं चुदते वक्त थोड़ा जानवर बन जाता हूँ… तेरे ये जो नन्हे दो पंखड़ियाँ यहाँ दरबान बन के खड़े हैं ये मुझे रोक नहीं पाएँगे… अब तुझे फटना है… उसके लिए तू तैयार हो जा… बस एक बार पूरा अंदर चला गया तो तुझे भी बहुत मज़ा आएगा।
अब उन्होंने मेरी चूत की फाँकों को खोला और वहाँ अंदर तक चूमा।
मैं मस्ती में चीख उठी—
मैं: अकरमम जी… जीईईईईईई आआआह्ह्ह्ह्ह!
अब उन्होंने जैसे ही अपनी जीभ छेद के अंदर डाली मैंने झट से अपने हाथ उनके सर पर ले गई और उनका सर ज़ोर से पकड़ लिया…
वो अब अपनी जीभ को थोड़ा अंदर-बाहर करने लगे… मैं तड़फने लगी।
उन्होंने जीभ और अंदर करी… मैं ज़ोर-ज़ोर से अपनी टाँगें बेड पर पीटने लगी।
जैसे ही उनके दाँतों ने मेरी पंखड़ियों को काटा… मैंने अकड़ के अपनी गाँड बेड के ऊपर उछाली और चिल्लाई—
मैं: आआआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मररररररर गय्य्य्य्य्य्य्य्यी!
आगे की स्टोरी अगले पार्ट मे

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Milogi story se jyada mast chut fad dunga
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