एक घर के अजीब रीति रिवाज 3

तो सामने एक खूबसूरत सी लड़की थी… मुझे सिर्फ शक्ल आधी-आधी से याद आ रही थी… वो आकर मेरे सामने बैठ गई और बोली—

पिछला पार्ट नहीं पढ़ा तो यहाँ पढ़ें ==> एक घर के अजीब रीति रिवाज 2

दीदी: तो भूख लगी है मेरे भाई को?

मैं (भाई मतलब ये अपनी एक दीदी हैं… लेकिन कौन?): हाँ दीदी… भूख तो लगी… लेकिन ये खिचड़ी क्यों लाई?

दीदी: ये हल्का होता है खाने में… इसको खाकर जल्दी हज़म होगा… और तुझे बहुत सारी एनर्जी भी मिलेगी।

मैं: फिर भी खिचड़ी दीदी…

दीदी: तेरा बचपन से बहाना नहीं गया ना… चल आज फिर तुझे मैं बचपन की तरह अपने हाथों से खिलाती हूँ…

मैं बचपन की तरह… बचपन में तो मुझे माँ ही खिलाती थी… ये दीदी कौन थी? तब मुझे याद आया… अरे ये तो सौम्या दीदी हैं… जो मेरे तबियत ठीक न होने पर मुझे खाना खिलाती थीं… स्पेशल खिचड़ी… क्योंकि वो मुझे पसंद नहीं थी।

मैं: सौम्या दीदी…

सौम्या दीदी: हाँ हाँ मैं… ज़्यादा दिमाग में ज़ोर मत डाल… इतने दिन पहचाना बहुत मुश्किल है… चल अब मेरा छोटा बच्चू की तरह खाने लग… (एक निवाला बनाकर मेरे तरफ बढ़ाते हुए)

वैसे तो खिचड़ी में घी और कुछ मेडिसिन टाइप चीज़ डाली हुई थी… लेकिन दीदी के प्यार से खिलाने से वो बेकार स्वाद वाली खिचड़ी भी मुझे बहुत टेस्टी लग रही थी…

मैंने आहिस्ता-आहिस्ता चबाया और निगला…

दीदी ने फिर बढ़ाया… और ऐसे ही वो मुझे धीरे-धीरे खिलाने लगीं… और सारा खिचड़ी जो मुझे पसंद भी नहीं था… कब खत्म हो गया… पता भी नहीं चला…

जब मैंने पूरा खा लिया तो देखा… दीदी के गुलाबी से गालों में पतली-पतली मोटी आँसू की लुढ़क रही थीं… मैंने उनको झट से गले लगा लिया…

मैं: दीदी… आप तो मेरी स्ट्रॉन्ग दीदी हो… स्ट्रिक्ट वाली… और आप कब से इतनी कमज़ोर हो गईं… मैं हूँ ना यहाँ दीदी…

दीदी: मेरे गले लगते ही दीदी खुद रोक नहीं पाईं… और अपने भावनाओं में बहती आँसुओं का समंदर बहा दिया… और कितनी ही देर तक रोती रहीं… मैं उनको पुचकारता… संभालता… और समझाता…

आखिरकार उन्होंने आँसू पोछे… हल्की सी मुस्कान रखी…

दीदी: हाँ… मेरा भाई तो है यहाँ… अब मुझे कोई चिंता नहीं… किसको ले जाने नहीं दूँगी…

मैं: हाँ दीदी… कौन ले जाएगा भी आपसे…

दीदी: हल्की सी आगे बढ़ीं… मेरे माथे को चूमा… और गिर चली गईं…

ये केयर और प्यार से भरा किस था… इससे सुकून मिला… और खाने से भी… अब मैंने पानी पिया और सो गया…

चोट की वजह से एनर्जी बहुत कम हो गई थी… इसलिए मुझे बहुत नींद आ रही थी…

लेकिन इस बार जब उठा तो मुझे प्यास लगी थी… तेज़ शाम का वक्त हो गया था… मैं उठके जा सकता था… लेकिन आराम से बैठके… हालत ठीक होना ही मुझे भाया… और आवाज़ लगाई पानी के लिए…

कुछ देर बाद माँ आईं पानी लेकर… उन्होंने दिया… मेरा हाल-चाल पूछा… मेरे बालों को संवारा… फिर आराम कर बोलकर चली गईं… लेकिन अब मेरी नींद थोड़ी कम और एनर्जी आने लगी थी… मैंने थोड़ी देर आस-पास देखा तो ये रूम माँ-पापा का ही था… मुझे याद आया… बचपन में जैसा था… वैसे ही था… मैं उठकर आस-पास रूम के चक्कर लगाने लगा… सारी चीज़ें देखता… समझता…

याद को जोड़ता… संजोता… अपने दिल में खुश-दुख होता… और खुद को आने वाले दिनों के लिए तैयार करता…

सबका सहारा बनना है मुझे… ये खुद को याद दिलाता…

रीति भी यहीं कहती थी… रिवाज भी यहीं कहता था… कि अब इस घर का मर्द मैं था… और मुझे इन घर की औरतों का सहारा बनना था…

(मुझे घर का मर्द बनना था… लेकिन अभी तो ये शुरुआत मात्र बस थी… अभी तो मेरी ज़िंदगी धीरे-धीरे यूँ बदलनी थी… जैसा कि मैं कभी सोच भी नहीं सकता था…)

यूँ ही मैं रूम में घूमता रहा… तभी मुझे याद आया कि मैंने कपड़े नहीं बदले कब से… और मैंने फिर आवाज़ लगाई बाहर गेट के पास से… तो इस बार अमृता दीदी आईं—

अमृता दीदी: क्या हुआ बेटू…?

मैं: दर्द हो रहा कि कुछ… तो मैंने ना में सिर हिलाते हुए कहा… दीदी… मेरे को कपड़े बदलने हैं… ये कपड़े कितने गंदे हो गए हैं…

दीदी: अच्छा… मैं तो घबरा गई थी… रुक… काकी से पूछती हूँ… तू आराम कर…

मैं वापस आकर रूम में बैठकर इंतज़ार करने लगा…

थोड़ी देर बाद दीदी आईं… लेकिन उनके हाथ में तो…

मैं: दीदी ये क्या?

दीदी: हाँ ये… चल अब चेंज कर ले… फिर तेरी ड्रेसिंग भी कर देंगे…

मैंने उनसे बैग लिया… देखा तो मेरे सारे कपड़े उसमें अभी भी थे… मेरे लैपटॉप और मोबाइल खाली नहीं थे… बाकी सब थे… मैंने दो जोड़ी कपड़े निकाले और बाथरूम गया… हलके गरम पानी से टॉवल भिगोकर… साबुन से भिगोकर… पोंछने लगा बदन को… ये काम करने में आधा घंटा लग गए…

आधे घंटे बाद मैंने चेहरा धोया तो मेरी सर की पट्टी भी गीली हो गई…

मैंने कपड़े बदले… न्यू अंडरवियर और वगैरह कपड़े पहने… फिर जिन कपड़ों को मैंने पहना था… उनको वहीं रखकर आवाज़ दी—

मैं: गंदे कपड़ों का क्या करना है…?

बाहर से चाची की आवाज़ आई—

चाची: बेटा… वहीं छोड़ दे तू… और आ जा…

बाहर निकला तो चाची और एक लड़की मेडिकल बॉक्स लेकर खड़ी थीं।

चाची ने एक सॉफ्ट टॉवल ले रखा था… उससे मुझे पोंछते हुए रूम की ओर ले गईं… और अच्छे से सब पोंछ दिया… मैं कहता रहा—

मैं: चाची… ये मैं कर लूँगा…

लेकिन चाची कहाँ मानी थीं… उन्होंने मुझे अच्छे से सुखाया… और फिर बोलीं—

चाची: ये तेरी ड्रेसिंग कर देगी… आराम से बैठ…

वो लड़की भी बड़ी जानी-पहचानी सी लगी…

लड़की: भाई… चलो मैं आपकी ड्रेसिंग कर दूँ… उधर बैठो आप…

बचपन की तरह…

बचपन में मेरी पट्टी तो रिद्धि दीदी करती थीं… अब मुझे याद आया… ये तो रिद्धि दीदी हैं…

उन्होंने आराम-आराम से मेरी मरहम-पट्टी कर दी…

मैं: थैंक यू रिद्धि दीदी… लेकिन ये अब सब मुझे बचपन की सीक्वेंस में क्यों मिल रहे हैं… जो बचपन में था… वो एक काम जैसे…

दीदी: ताकि तू हमें दिल से याद रख ले… और सारी यादें ताज़ा हो जाएँ तेरी-हमारी… और तुझको हमको याद करने को ज़्यादा ज़ोर भी नहीं लगाना पड़े…

मैं: ऐसा बात है क्या?

दीदी: हाँ… ऐसा ही बात है… जो खिलाती थी… जो सुलाती थी… जो दवा लगाती थी… जो बेटू बुलाती थी… उसी तरह तो तुझे याद दिला रहे हैं…

मैं: ऐसा है… तो ये सब जो मैं खा रहा हूँ… ये सब कौन बना रहा होगा??

दीदी: याद कर तू…

मैं: अरे दीदी… अच्छे से याद है… एक्सप मेरे ऊपर करती थीं रोही दीदी… अलग-अलग डिश बनाके… और उतना ही बेस्वाद खाना मुझे हँस-हँसके खाना पड़ता था…

दीदी: मुस्कान के साथ… याद तो ठीक आई… लेकिन दीदी एक्सप नहीं करती थीं तुझ पर… वो तेरे लिए सब सीखती थीं… क्योंकि हल्की सी सांवली थीं… तो उनको लगता था कि तू तो उनसे प्यार ही नहीं करेगा… बाकियों की तरह… इसलिए वो कुछ और करके ही परफेक्ट हैं…

मैं: पहली बात… मैं आप सबसे बहुत प्यार करता हूँ… बराबर करता हूँ…

और दूसरी… रोही दीदी सांवली कब से हो गईं…

दीदी: अरे… वो दीदी का बहम है… हल्का सा धूप से टैन था… और कुछ नहीं…

मैं: तो अभी दीदी एक्सप कर रही क्या?

दीदी: बदमाश कहीं का… याद है जिस दिन तू यहाँ से जा रहा था होस्टल… और तेरे लिए दीदी ने मठरी (एक स्वीट्स) बनाई थी… तूने खाकर उसको मुस्कुराके… दुनिया की बेस्ट मिठाई है… बोलकर चला गया…

लेकिन तेरे जाने के बाद जब दीदी ने खुद पहली बार अपनी बनाई हुई डिश चखी… तो इतना बेस्वाद… कड़वा और घटिया मिठाई… जिसकी कोई स्मेल भी न करे… तू इतने प्यार से खाकर चला गया…

तब उनको पता चला कि उनका खाना कितना बेकार होता था… और तू उस खाने को मुस्कुराके तारीफ़ करके खाता था…

वो तो सोचती थीं तू उनको प्यार नहीं करता… लेकिन अब उनको तेरा असीम प्यार रियलाइज़ हुआ… कि तू उससे इतना प्यार करता था… कि उसका उतना बुरा खाना भी हँसके खाता… तारीफ़ करता था… दीदी दो दिन तक रोती रहीं थीं…

मैं: पागल दीदी… कहे रो रही थीं… वो तो कुछ भी खिलाएँ… इतने प्यार से बनाती थीं… कि सब मुझे अच्छा लगने लगता था… चाहे वो कैसा भी क्यों न हो…

दीदी: उहम्म… और दीदी की आँखों में आँसू थे… उनको भी चुप कराया वही… फिर वो भी आराम करने को जाने लगीं तो…

मैं: दीदी… रोही दीदी को भेज दो…

दीदी: वो आ ही गईं… इंतज़ार कर… अभी आराम कर तू… ये बोलकर रिद्धि दीदी भी चली गईं…

और मैं अब बहुत साफ़ और हल्का महसूस करते हुए… फिर से नींद के आगोश में खो गया…

रात में मेरी नींद किसी के मेरे सर पे हाथ फेरने से खुली… तो देखा छोटी बुआ थीं…

बुआ: बेटा… उठ जा… खाना खा ले…

मैंने देखा… वहाँ एक प्यारी सी पतली दी… लेकिन तीखे नयन-नक्श… जो कि उसको किसी अप्सरा की तरह लग रही थीं… एक प्लेट लेकर खड़ी थीं…

मैं समझ गया… उनका रंग हल्का सा सांवला था… वो थीं हमारी रोही दीदी…

मैं उठकर बैठा… हाथ-मुँह धोकर आया… तब तक बुआ चली गई थीं… सिर्फ रोही दीदी थीं…

रोही दीदी को मैंने हल्की सी मुस्कान पास की… और वो फूट पड़ीं…

प्लेट एक तरफ रखकर मैंने उनको गले लगा लिया… और पुचकारने लगा… चुप कराने लगा… उनके पीठ पे हाथ फेरते हुए धीरे-धीरे…

वो चुप नहीं हो रही थीं… तो मैं बोला—

मैं: क्यों दीदी… रो मत… जैसा भी… मैं खा लूँगा… रोके खिलाने की ज़रूरत नहीं…

तो रोही दीदी ने हल्का सा मुक्का मेरे पीठ पे मारा…

मैं (एक्टिंग): आउच…

दीदी: हट… क्या ज़ोर से लग गई क्या… ठीक तो है ना… रिद्धि को बुलाऊँ क्या?

मैं: मुस्कुरा दिया उनकी फ़िकर देखकर… और बोला… ये पाव-किलो के हाथ से मेरे को नहीं लगता…

ये सुनके दीदी ने और एक घूँसा मारा मुझे… और फिर से मेरे गले लगके रोने लगीं…

दीदी: एक बात बता… मेरा इतना बुरा खाना तू खा कैसे लेता था…

मैं: अरे… कौनसा बुरा खाना… मुझे तो बहुत अच्छा लगता था…

दीदी: तो वो तेरे को अच्छा लगता था… तो अब से तेरे डेली में ही खिलाऊँगी खाना बनाके…

मैं (साला प्यार के चक्कर में खुद के लौड़े तो नहीं लग गए ना?): हाँ… थोड़ा उलझा हुआ…

दीदी: अब हँसती हुई… क्यों बच्चू… बोलती बंद हो गई…

मैं: बोलती क्यों बंद… मैं तो सोच रहा था… मेरी प्यारी दीदी इतनी मेहनत क्यों करे…

दीदी: हम्म… सब समझती हूँ… तेरा मक्खन सब… चल अब खा ले आ…

उसके बाद दीदी ने मुझे बिठाया… बहुत सारे चीज़ थे… सब लेकिन हल्का खाना था…

लाइक रोटी… दाल… सब्ज़ी आदि…

लेकिन जब मैंने पहला निवाला लिया… तो ऐसा लगा जैसे इसे किसी पक-कला में एक्सपर्ट प्रो ने बनाया हो…

इतनी सादी सब्ज़ी… इतनी स्वादिष्ट भी हो सकती… मैंने तो सोचा नहीं था…

मैं स्वाद में सब कुछ भूल गया… और भूख में प्लेट की दावत उड़ाने लगा… जब तक सब चाट न कर गया…

और जब सब चाट करके देखा… तो दीदी के दूध का ग्लास लेकर खड़ी हैं… उनके चेहरे पे सुकून वाली मुस्कान थी… लेकिन आँसू की कुछ मोटी लुढ़क रही थीं उनके गुलाबी से गालों पर…

मैं: वाह दीदी… इतना स्वादिष्ट खाना कभी नहीं खाया…

दीदी: आँसू पोछते हुए दूध का ग्लास बढ़ाया… चल… बहुत मक्खन मत लगा… तेरा मक्खन मैं सब जानती हूँ…

मैं: नहीं दीदी… सच में बहुत स्वादिष्ट था…

दीदी: हाँ हाँ… चल अब दूध फिनिश कर… अच्छे बच्चे की तरह…

मैं: ओके बॉस… दूध पीने लगा… दूध में बहुत सारे ड्राई फ्रूट्स थे… जिससे वो भी बहुत मस्त लग रहा था पीने को…

उसके बाद दीदी बर्तन लेकर जाने लगीं… और बोलीं—

दीदी: कल से खाना चाची और काकी ही बनाएँगी… तो एक दिन का स्पेशल ऑफर था…

और हँसके चली गईं…

मैं भी अब भरे पेट में… मुझे नींद आने लगी… शायद दूध में दवा या मेडिसिन थी… जोकि मिलाके मुझे पिला दी थी दीदी… क्योंकि मेडिसिन मुझे पसंद नहीं थी… लेकिन होस्टल में रहने के बाद अब मैं गोलियाँ सब खा लेता था… ये इनको नहीं पता था…

अब मैं काजल दीदी से मिलना बाकी रह गया… सोचते हुए ही मुझे नींद आ गई… आधी रात में मुझे कोई नरम सा लगा… मैं उसको पकड़के सो गया…

सुबह उठा तो देखता हूँ कि वो नरम कोई चीज़ या तकिया नहीं… बल्कि एक इंसान है…

और वो इंसान और कोई नहीं… बल्कि हैं…

कौन है वो इंसान… पता लगेगा अगले पार्ट में…

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