माया – एक कामुक पत्नी – 2

A housewife ki kamuk sex story:- पिछले पार्ट में विवेक और माया गाँव के पुराने बंगले में शिफ्ट हुए। जगिया नाम का नौकर उनकी देखभाल कर रहा था। विवेक ने उसे परिवार जैसा दर्जा दिया। जगिया माया की खूबसूरती पर लट्टू हो चुका था।

Part 1 ==> माया – एक कामुक पत्नी – 1

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दुबे विवेक और माया दोनों को पूरा घर दिखा देता है। जितना खूबसूरत बाहर से था उतना ही खूबसूरत अंदर से।

नीचे एक बड़ा सा हॉल और किचन था। सीढ़ियाँ चढ़के ऊपर 4 कमरे थे, इनके सिवाय एक बड़ी बालकनी और टेरिस।

जगिया नीचे हॉल में उनका सामान ठीक से रख देता है। और वहीं उनकी राह देखता है।

विवेक और माया दुबे के साथ अब नीचे हॉल में आए। दुबे ने पूछा—

A housewife ki kamuk sex story

दुबे: तो कैसा लगा ये घर आपको?

विवेक: बहुत ही जबरदस्त। जब तक यहाँ रहेंगे तब तक बेहद मजा आ जाएगा।

दुबे: अच्छा तो अब मैं निकलता हूँ। ये लीजिए घर की चाबी। कल सुबह मैं आपको लेने आ जाऊँगा फिर ये कार भी आपको सौंप दूँगा।

विवेक: अरे कल सुबह नहीं मुझे आज ही वहाँ रिपोर्टिंग करना है और साइट देखनी है। तुम एक काम करना दोपहर को 1 बजे मुझे लेने आ जाना ठीक है।

दुबे: जी सर। जैसा आप कहें।

दुबे चला गया। जगिया ने सारा सामान ऊपर कमरे में रख दिया। विवेक और माया अपना सामान निकालके उसे कमरे में रखने लगे।

करीब 11 बजे वो नीचे आए। तब तक जगिया ने नीचे साफ-सफाई कर दी थी।

विवेक: अरे क्या नाम बताया था काका आपका?

जगिया: जी जगिया हुजूर।

विवेक: हाँ। जगिया। एक बात बताएँ जगिया जी। आप यहाँ कितने समय से काम करते हैं?

जगिया: जी मैं यहाँ 5 सालों से हूँ।

विवेक: हम्म… हम्म। बहुत अच्छे। अच्छा एक बात बताइए ये इस पुराने गाँव में इतना आलीशान बंगला है किसका? और इसकी देखभाल के लिए आपको सैलरी कौन देता है?

जगिया: वो क्या है मालिक। बरसों पहले ये बंगला किसी चौधरी खानदान का था। बहुत जमीन-जायदाद थी उनके पास। फिर उनके गुजरने के बाद उनके बेटों ने ये बंगला और जमीन सरकार को बेचके विदेश चले गए। और फिर सरकार ने सरकारी कामों के लिए इसे अपने पास रख लिया। कभी किसी सरकारी अफसर का तबादला होता तो वो यहीं रुकते। मगर अभी 2 सालों में कोई नहीं आया। मुझे यहाँ की देखभाल के लिए सरकारी दफ्तर की ओर से रखा है। हर महीने मुझे इसकी तनख्वाह मिलती है।

विवेक: तो हमें यहाँ रहने को कैसे मिला? मैं तो प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूँ।

जगिया: ये तो नहीं पता मालिक। पर हो सकता है आपकी कंपनी ने ये बंगला सरकार से भाड़े पे लिया हो और आपको रहने के लिए दिया हो।

विवेक: हाँ ये हो सकता है। खैर जो भी हो ये बताओ आप यहाँ रोज कितने बजे आते हो?

जगिया: मैं सुबह 10 बजे आता हूँ। फिर दोपहर को 1 बजे चला जाता हूँ। फिर वापस शाम को 5 बजे आता हूँ और रात को सब काम निपटाके चला जाता हूँ।

विवेक: और क्या-क्या काम कर लेते हो?

जगिया: जी घर की साफ-सफाई करना, कपड़े, बर्तन धोना, और जो भी बाहर का छोटा-मोटा काम सब कर लेता हूँ।

विवेक: क्या बात है। इस उम्र में भी आप इतना सब कुछ कर लेते हो?

जगिया: जी मालिक। कर लेता हूँ।

विवेक: और खाना वगैरह?

जगिया: जी वो नहीं आता मालिक।

विवेक: हम्म। खैर उसका हम बाद में देख लेंगे। अभी एक काम कीजिए यहाँ गाँव से कुछ सब्जी, अनाज वगैरह ले आइए। दोपहर के खाने के लिए।

जगिया: वो सब पहले से मँगवाके रख दिया है। सब किचन में ही है।

विवेक: वाह। क्या बात है। ठीक है तो अभी तो और कुछ काम नहीं है। जरूरत होगी तो बुलवा लेंगे।

जगिया: जी मालिक। मैं बाहर गार्डन में ही हूँ।

जगिया चला गया। और जाते-जाते माया पे एक हल्की सी नजर घुमाता गया। विवेक ने माया की बाँहें पकड़ते हुए कहा—

विवेक: कैसा लगा स्वीटहार्ट ये घर?

माया: घर तो बहुत अच्छा है। मुझे तो पहले यकीन ही नहीं हुआ इतने छोटे से गाँव में इतने बड़े बंगले में रहने को मिलेगा।

विवेक: हम ऐसे-वैसे थोड़ी ना हैं। ए वन क्लास इंजीनियर हैं।

माया: हम्म। इसलिए तो आज के आज ही काम पे जा रहे हो। एक दिन लेट से जाते तो क्या जाता तुम्हारा?

विवेक: अरे जाना पड़ता है बेबी। काम ही ऐसा है। अब जल्दी से खाना लगाओ। मुझे बहुत भूख लगी है।

माया: ठीक है आप थोड़ी देर बैठो। मैं अभी लगाती हूँ।

माया किचन में चली गई। 12 बजे वो लोग खाना खाने बैठ गए। तभी विवेक ने माया से कहा—

विवेक: अरे माया सुनो। क्यों ना आज हम उस बेचारे जगिया को भी यहीं खाने पे बुला लें। आज पहली बार मिले हैं तो थोड़ा अच्छा लगेगा। क्या कहती हो?

माया: ये तो बहुत अच्छी बात है। मैं अभी बुलाती हूँ।

माया बाहर आई और जगिया को ढूँढ़ने लगी। मगर जगिया वहाँ कहीं नहीं दिखाई दिया। फिर वो आसपास चलकर उसे ढूँढ़ते हुए बंगले के पीछे के हिस्से में आई। जगिया वहाँ बगीचे में काम कर रहा था। माया उसके पास गई और बोली—

माया: सुनिए…

जगिया ने देखा तो माया उसे बुला रही थी। उसकी आँखों में चमक आ गई। वो फटाक से दौड़ता हुआ उसके पास गया।

जगिया: जी। जी। कहिए मालकिन।

माया: वो आपके साहब चाहते हैं कि आज दोपहर का लंच आप हमारे साथ करें।

जगिया: क्क्… क्या मालकिन? मैं कुछ समझा नहीं।

जगिया हैरान हो गया।

माया: दरअसल उनका कहना है आज हम यहाँ पहली बार आए हैं और हमारी नई जान-पहचान हुई है तो आज आप हमारे साथ ही खाना खाएँ।

जगिया: मगर मालकिन? मैं और आप लोगों के साथ। कैसे?

माया: क्यों कोई आपत्ति है?

जगिया: अरे नहीं नहीं मालकिन। ऐसी कोई बात नहीं है। पर…

जगिया ने अपने शब्द अधूरे छोड़ दिए।

माया: पर…?

माया ने बड़ी मासूमियत से पूछा।

जगिया: जी वो क्या है… आप ठहरे मालिक और हम नौकर। तो अच्छा नहीं लगेगा ना।

माया: इसमें मालिक और नौकर की बात कहाँ से आई। आप भी हमारी तरह इंसान हैं। और हम इन चीजों में नहीं मानते।

जगिया: पर मालकिन…

माया: देखिए आपके साहब कब से अंदर वेट कर रहे हैं। उन्होंने ही मुझे भेजा है आपको बुलाने। अब चलिए।

जगिया के चेहरे पे हल्की सी स्माइल छा गई। वो माया के पीछे-पीछे चलने लगा।

अंदर आते ही विवेक ने पूछा—

विवेक: अरे माया कहाँ थी तुम? इतनी देर क्यों लग गई?

माया: वो मैं इनको ढूँढ़ने पीछे गार्डन में गई थी। ये तो आ भी नहीं रहे थे।

विवेक: क्यों?

विवेक ने आश्चर्य से पूछा।

माया: क्योंकि वो बेहद शर्मा रहे थे, कह रहे थे कि वो तो इस घर के नौकर हैं, हमारे साथ खाना कैसे खा सकते हैं?

विवेक हल्का सा मुस्कुराया और जगिया को अपने पास बुलाया।

विवेक: क्या जगिया जी। आप भी। देखिए हम ऐसी ऊँच-नीच वाली बातों में विश्वास नहीं करते। आप इस घर के रखवाले हैं। और उम्र में भी हम दोनों से बड़े, मेरे पिता समान। तो आज से आप सिर्फ इस घर के नौकर ही नहीं बल्कि सदस्य भी हैं। ठीक है।

जगिया: मालिक आप भी… मैं क्या बोलूँ।

जगिया विवेक के सामने गदगद हो गया।

विवेक: कुछ कहने की जरूरत नहीं है। चलिए अभी खाना खा लीजिए। मुझे फिर काम पे निकलना है तो बाकी बातें बाद में करेंगे।

जगिया वहीं जमीन पे बैठ गया। उसे देख माया ने कहा—

माया: अरे आप वहाँ क्यों बैठ गए? यहाँ डाइनिंग टेबल पे आइए।

जगिया: नहीं नहीं मालकिन। हम यहीं ठीक हैं।

उसे देख विवेक भी बोला—

विवेक: अरे पान वहाँ थोड़ी ना बैठते हैं। यहाँ मेरे पास आ जाइए।

जगिया: पर मालिक…

विवेक: पर बार कुछ नहीं। चलिए उठिए और यहाँ बैठिए।

जगिया खड़ा हुआ और धीरे-धीरे चलके डाइनिंग टेबल पे विवेक की बगल में बैठ गया। वो थोड़ा शर्मा रहा था मगर इस शर्माहट के पीछे एक बहुत बड़ा शैतान छुपा था।

माया किचन से 2 प्लेट लाई और टेबल पे परोस दी। एक विवेक को और एक जगिया को। दोनों खाना खाने लगे।

विवेक: माया तुम भी ले लो ना साथ में।

माया: नहीं मैं बाद में खा लूँगी। पहले आप खा लीजिए।

विवेक: कैसा लगा खाना जगिया जी?

विवेक ने खाते-खाते जगिया से पूछा।

जगिया: बहुत ही स्वादिष्ट है मालिक। मालकिन बहुत अच्छा खाना बनाती हैं।

विवेक: हाँ तुम्हारी मालकिन है ही इतनी अच्छी।

विवेक ने माया को आँख मारी। माया ने जगिया की ओर देखते हुए विवेक को आँखों से घूरा। विवेक मंद-मंद हँसने लगा।

माया: और दूँ जगिया जी?

जगिया: जी नहीं नहीं मालकिन। अब बस।

माया: लेकिन आपने तो कुछ खाया ही नहीं।

माया ने हल्की सी स्माइल देते हुए कहा।

विवेक: लगता है जगिया जी शर्मा रहे हैं। देखिए जगिया जी शर्माएँ मत… इसे अपना ही घर समझिए। माया थोड़ा और दो।

माया: जी।

माया जगिया को स्माइल देती हुई परोसने लगी। जगिया माया का मासूम चेहरा देख अंदर ही अंदर विवेक से जलने लगा।

(शर्माऊँ और मैं?? हम्म… शर्माए मेरी जूती विवेक के बच्चे। शर्माएगी तो तेरी ये कातिल हसीना जिस दिन उसके गोरे बदन से मैं एक-एक करके सारे कपड़े उतारूँगा।)

जगिया मन ही मन खुश होने लगा।

जगिया: बस बस मालकिन अब और नहीं। पेट भर गया।

जगिया ने माया को अपने लाल-पीले दाँत दिखाते हुए कहा।

विवेक: मजा आया जगिया जी?

विवेक ने हाथ पकड़ते हुए कहा।

जगिया: जी मालिक। बहुत। आप दोनों सच में बहुत अच्छे हैं। मुझे आज तक ऐसे मालिक नहीं मिले।

विवेक: जगिया जी आप ये बार-बार मुझे मालिक कहके मत पुकारिए। कुछ ज्यादा लगता है। आप मेरे चाचा समान हैं। मुझे सिर्फ विवेक कहिए।

जगिया: अरे मालिक ये आपने क्या कह दिया!? मैं आपको सीधा नाम से? ये ये अच्छा नहीं लगेगा।

विवेक: इसमें बुरा लगने की क्या बात! आप हमसे उम्र में काफी बड़े हैं। जितनी रिस्पेक्ट आप हमारी करते हैं उतनी ही हमें आपकी करनी चाहिए। तो आज से आप इस घर के सदस्य भी हैं और मेरे चाचा भी। ठीक है।

जगिया: पर मालिक?

विवेक: फिर मालिक? मुझे सिर्फ विवेक ही कहिए।

जगिया हड़बड़ाते हँसते हुए बोला—

जगिया: देखिए। मैं आपको सिर्फ उस नाम से तो नहीं बुला सकता। इसके बदले में मैं आपको विवेक बाबू कहूँ तो चलेगा?

विवेक: बिल्कुल। जैसा आपको पसंद।

विवेक ने हँसते हुए कहा।

तभी बाहर कार के हॉर्न की आवाज आई। विवेक समझ गया कि गुप्ता उसको लेने आ गया है। वो टेबल से खड़ा होकर फटाफट तैयार हुआ और जाने लगा। माया उसको दरवाजे तक छोड़ने गई।

माया: सुनो… शाम को जल्दी आना।

माया ने प्यारी से स्माइल देते हुए कहा।

विवेक: आ जाऊँगा जान। और कुछ?

विवेक भी हँसते हुए कार में बैठ गया और चला गया।

अब घर में सिर्फ माया और जगिया ही थे। जगिया अब भी टेबल पे बैठा आखिरी रोटी खा रहा था। माया उसके पास गई और पूछा—

माया: और कुछ दूँ आपको?

जगिया: जी नहीं मालकिन। अब और कुछ नहीं चाहिए (सिवाय तेरे जिस्म के)।

जगिया अंदर ही अंदर बोला।

माया: आप भी मुझे मालकिन कहके मत पुकारिए।

जगिया ने एक पल माया को गौर से देखा और बोला—

जगिया: मा… मगर मैं आपका नाम तो जानता ही नहीं… तो आपको किस नाम से…?

जगिया ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

माया: माया। मेरा नाम माया है।

कहते हुए माया ने एक प्यारी सी स्माइल दी।

जगिया: बड़ा प्यारा नाम है। आपकी ही तरह।

जगिया का चेहरा लाल हो गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

माया थोड़ी शर्मा गई और विवेक की प्लेट लेकर किचन में चली गई। जगिया पीछे से उसकी मटकती गाँड को देख रहा था।

उफ्फ! क्या गाँड है साली की। जगिया ने अपनी टाँगों को आपस में दबोचा। माया किचन में काम कर रही थी और जगिया उसकी बैकलेस ब्लाउज में से नुमाया हो रही चिकनी पीठ के दीदार कर रहा था। उसकी नाजुक पतली कमर को घूर अपने आखिरी निवाले को चबा रहा था।

आज विवेक ने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भयंकर भूल की थी। जगिया जैसे वहशी दरिंदे को अपने घर में पनाह देके। वो बेचारा नहीं जानता था जिसे वो बुजुर्ग समझके चाचा का दर्जा दे रहा है उसके लोडे की धार कितनी तेज है जो उसके ही घर-संसार को खुरेदने वाली है।

जगिया ने खाना खाके अपनी प्लेट उठा ली और किचन की ओर चल पड़ा। माया की पीठ अब और साफ दिख रही थी। जगिया की आँखों में हवस भरने लगी थी। माया बेचारी अपने काम में मशगूल थी। तभी जगिया उसके पीछे जा खड़ा हुआ और धीरे से बोला—

जगिया: मालकिन!

माया अचानक आवाज से पीछे घूमी तो वहाँ जगिया खड़ा था। वो एक पल डर सी गई।

माया: अरे चाचा आप…? मैं तो डर ही गई थी। आप यहाँ क्या कर रहे हैं?

जगिया: जी मैं वो खाली प्लेट रखने आया था।

माया: ओह। लाइए दीजिए मुझे। मैं साफ कर दूँगी।

जगिया: अरे नहीं नहीं मालकिन हमारे होते हुए आप क्यों साफ करेंगी भला? मैं सब कर दूँगा।

माया: इट्स ओके। मैं कर लूँगी। मुझे अच्छा लगता है।

जगिया: पर मालकिन?

माया: आपने मुझे फिर मालकिन कहा?

माया ने शिकायत से कहा।

जगिया: ओह। माफ करना। भूल गया था। माया जी। लाइए मुझे दीजिए मैं कर लूँगा।

जगिया हँसते हुए बोला।

माया: आज आप रहने दीजिए। कल से कर लेना। आज पहले दिन आपको छुट्टी। ठीक है।

माया ने हल्की सी मुस्कुराते हुए कहा।

जगिया: ठीक है। जैसा आप कहें। तो अब मैं चलूँ। घर पे कुछ काम है।

माया: जी।

जगिया वहाँ से जाने लगा। पर उसका मन नहीं कर रहा था जाने को। मगर जाना तो पड़ेगा ही। बाहर सामने कोने में उसकी टूटी-सड़ी हुई बाइक थी। उसने वो चालू की और जाने लगा।

अभी वो कुछ आगे तक ही गया था कि उसको कुछ अचानक से याद आया और उसने बाइक वापस घुमाई। अंदर आया तो देखा बंगले का काँच का दरवाजा बंद था। शायद माया ने किया होगा। वो वहाँ गया और दरवाजे की बेल बजाई।

अंदर से माया आई और डोर ओपन किया। बाहर जगिया को खड़ा देख उसे थोड़ी हैरानी हुई।

माया: अरे चाचा आप…? मुझे तो लगा आप शायद निकल गए होंगे।

जगिया: मैं निकल ही गया था कि मुझे अचानक से कुछ याद आया। और वापस आया।

माया: क्या कुछ भूल गए थे?

जगिया: नहीं। वो बातों-बातों में आपसे कहना ही भूल गया कि आपने तो अभी तक खाना खाया ही नहीं। और मैं खुदगर्ज की तरह अकेला खाके सीधा निकल गया।

जगिया की बात सुनके माया हँस पड़ी और बोली—

माया: फिकर मत कीजिए चाचा। मैं खा लूँगी।

जगिया: अगर कुछ चाहिए होगा तो मैं रुकता हूँ थोड़ी देर।

माया: नहीं नहीं चाचा। अभी हाल कुछ नहीं चाहिए। आप आराम से जाइए।

जगिया: ठीक है। तो फिर मैं चलता हूँ। बस यही कहने में वापस आया था।

जगिया ने बाइक स्टार्ट की और माया की ओर देखा। माया वहीं खड़ी थी। उसके चेहरे पर प्यारी सी स्माइल थी। जगिया आज अपना दाव यहीं तक रखना चाहता था इसलिए वो फटाक से घर की ओर निकल पड़ा। माया को जगिया का ये केयरफुल नेचर बहुत अच्छा लगा। वैसे भी शहर के लोगों की तुलना में गाँव के लोग बहुत ही भले होते हैं। माया ने दरवाजा बंद किया और अंदर चली गई।

जगिया के जाने के बाद माया ने खाना खाया और फिर सो गई। जगिया घर आकर सीधा बिस्तर पर लेट गया। आज का दिन उसके लिए बेहद खास था। माया की तस्वीर बार-बार उसकी नजर के सामने आ रही थी। उसकी खूबसूरती, उसकी प्यारी सी स्माइल, उसका कातिलाना जिस्म। लाइफ में इतनी खूबसूरत हसीन औरत उसने आज तक नहीं देखी थी।

शाम के 5 बजे जगिया वापस काम पे आ गया। माया तब तक जाग चुकी थी और हॉल में सब चीजें सही जगह रख रही थी। माया को देख उसके जिस्म में कुछ-कुछ होने लगा था। वो उसके पास गया।

जगिया: नमस्ते मालकिन। ओह! माफ करना। गलती से मुँह से निकल गया।

माया ने जगिया को देख एक प्यारी सी स्माइल दी।

माया: कोई बात नहीं। आप आ गए। चलो अच्छा हुआ… अकेले बोर हो रही थी ये सब करके। आप ये कुछ चीजें रखने में थोड़ी मेरी मदद करेंगे?

जगिया: हाँ हाँ क्यों नहीं।

माया को अच्छा लगा। दोनों ने पूरे हॉल को ठीक से सजा दिया। काम निपटाके माया फिर सोफे पे बैठी। जगिया किचन से उसके वास्ते पानी भर लाया। माया को जगिया का नेचर बहुत ही अच्छा लगा। जगिया वहीं उसके पास जमीन पे बैठ गया।

माया: अरे आप नीचे क्यों बैठ गए जगिया जी। यहाँ ऊपर बैठिए।

जगिया: नहीं नहीं हम यहीं ठीक हैं।

माया हल्का मुस्कुराई।

माया: अच्छा जगिया जी कुछ अपने बारे में बताओ। आप क्या यहाँ के ही रहने वाले हैं?

जगिया: हाँ। हमारा तो जन्म ही इसी गाँव में हुआ। बरसों से हम यहीं रहते हैं।

माया: और आपकी फैमिली में कौन-कौन है?

जगिया: जी कोई नहीं।

जगिया थोड़ा दुखी अंदाज में बोला।

माया: मतलब? आप बिल्कुल अकेले रहते हैं?

माया ने हैरानी से पूछा।

जगिया ने हाँ में सिर हिलाया। फिर दुखी आवाज में बोला—

जगिया: माँ तो बचपन में ही चल बसी थीं और बाप जब मैं 17 साल का था तब।

माया: ओह! आई एम सॉरी! और आपके बीवी-बच्चे? मेरा मतलब आपकी शादी तो हुई होगी?

जगिया: हुई तो थी… पर सिर्फ नाम की।

माया: मतलब? क्या वो आपके साथ नहीं रहती?

जगिया ने मायूसी से ना कहा। हालाँकि वो ये सब नाटक कर रहा था।

माया: पर क्यों?

जगिया: वो… वो… जाने दीजिए ना मेमसाब। मुझ गरीब के बारे में जानके आप क्या करेंगी?

माया: देखिए जगिया जी, आप खुद को अकेला मत समझिए, विवेक ने जैसे सुबह कहा आप सिर्फ इस घर के नौकर ही नहीं बल्कि उनके चाचा समान हैं, तो इस नाते में आपकी बहू समान हूँ। आप अपनी बहू को तो बता ही सकते हैं।

जगिया थोड़ा इमोशनल हो गया और अपना गमछा आँखों के पास रखकर सुबकने लगा। माया को उस बेचारे पे दया आ गई।

माया: जगिया जी आप रोइए मत प्लीज, मुझे माफ कर दीजिए अगर मैंने आपका दिल दुखाया हो तो।

जगिया: नहीं नहीं बहुरानी। आपने मेरा कोई दिल नहीं दुखाया। आप और साहब तो कितने अच्छे हैं। भगवान का रूप हैं मेरे लिए जो पहले दिन ही मुझे इतना सारा अपनापन दिलाया। आप दोनों सच में महान हैं।

माया को उसकी बात से बहुत अच्छा लगा।

माया: ऐसी बात नहीं है। वो तो हमारा नेचर ही ऐसा है। हम किसी के साथ ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं रखते।

जगिया: इसलिए तो आप दोनों महान हैं। और आप तो दिल की कितनी अच्छी हैं।

माया थोड़ी शर्मा गई। जगिया ने उसकी ओर देख अपनी भौंहें चढ़ाईं। जब माया ने उसकी ओर दोबारा देखा तो उसने वापस अपना मुँह उतरा हुआ सा बना लिया।

माया: अब तो आप मुझे बता सकते हैं।

जगिया: क्या बताऊँ बहुरानी। माँ-बाप के गुजरने के बाद मेरी शादी तो हुई मगर 6 महीनों में ही वो मुझे… (दोबारा रोने की एक्टिंग) मुझे छोड़के चली गई।

माया: ओह गॉड! मगर क्यों?

जगिया: शायद मैं उसे पसंद नहीं था। एक गरीब, गँवार, काले-कातूले इंसान के साथ कौन रहना पसंद करेगा! भाग गई मुझे छोड़के।

जगिया अब जाले बुन रहा था। माया को फँसाने। खुद को भला-बुरा कहने लगा ताकि माया को उसके साथ हमदर्दी हो।

माया: पर ये तो गलत बात है। किसी के रंग-रूप देखकर उसके साथ ऐसा बिहेव करना ये तो बहुत बुरी बात है।

जगिया: जाने दीजिए ना बहुरानी। सिर्फ एक वही वजह थोड़ी ना थी। और भी बहुत कुछ था।

माया समझी नहीं। उसकी क्यूरॉसिटी बढ़ रही थी।

माया: और…? और कौन सी वजह थी?

जगिया: छोड़िए ना बहुरानी। वो वजह मैं आपको नहीं बता सकता।

माया: पर क्यों?

जगिया: आप समझने की कोशिश कीजिए… मैं… मैं नहीं बता सकता।

माया को लगा अब शायद ज्यादा हो जाएगा। इसलिए उसने भी ज्यादा पूछना मुनासिब ना समझा।

माया: ओके। ओके। अगर अभी आप नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं। इट्स ओके।

जगिया चुप बैठा रहा और गमछे से अपना नाक पोछने लगा। माया को उसकी हालत पे तरस आ रहा था। वो उसके लिए पानी लाने किचन में गई और वापस आकर उसे दिया।

माया: ये लीजिए जगिया जी। पानी पी लीजिए।

जगिया: अरे आपने क्यों तकलीफ की। मैं खुद जाके ले आता।

माया: कोई बात नहीं। अभी तो मैं लेके आई हूँ। लीजिए।

जगिया पानी पीने लगा और साथ में माया को देखने लगा। माया सोफे पे बैठ गई।

जगिया: शुक्रिया बहुरानी। आप कितनी अच्छी हैं।

माया मुस्कुरा दी। अब बारी जगिया की थी।

जगिया: एक बात पूछूँ बहुरानी?

माया: पूछो?

जगिया: आपने मेरे बारे में तो सब कुछ जान लिया। अब अपने बारे में तो कुछ बताएँ।

माया: सब कुछ कहाँ बताया आपने। बीच में ही तो रोक लिया।

जगिया: उसे भूल जाएँ ना अभी। फिर कभी बता दूँगा। आप अपने बारे में तो कुछ बताएँ। आप कहाँ की रहने वाली हैं। आपके फैमिली में कौन-कौन है।

माया एक पल हँसी और फिर अपने बारे में बताने लगी।

माया: जी एक्चुअली मैं पुणे की रहने वाली हूँ। मेरे फैमिली में मेरे मम्मी-पापा हैं और मैं उनकी एक लौटी बेटी। मेरी शादी विवेक से अभी कुछ महीनों पहले ही हुई। और मेरी तरह विवेक भी मेरे सास-ससुर के एक लौटे बेटे हैं।

जगिया: अच्छा… अच्छा। वैसे वो लोग कहाँ रहते हैं।

माया: मेरे सास-ससुर तो मुंबई में ही रहते हैं। मगर विवेक एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थे और उनकी जॉब कानपुर में थी तो शादी के बाद हम दोनों वहीं शिफ्ट हो गए।

जगिया: तो फिर आप दोनों यहाँ पे? कैसे?

माया: वो हुआ यूँ कि विवेक की कंपनी को एक बड़ा सा प्लांट लगाना था। तो उसके लिए उसे बहुत बड़ी जमीन चाहिए थी। तो उन्होंने यहीं आसपास के गाँव की बड़ी सी जमीन खरीद ली और प्लांट डाल दिया। अब काम करने के लिए इंजीनियर की तो जरूरत होगी ही। और आपके साब तो ठहरे बड़े इंजीनियर। तो कंपनी वालों ने उसे एक बड़ी सी ऑफर दी और यहाँ पे भेज दिया।

जगिया: बहुत… बहुत अच्छा किया। साब तो कितने अच्छे आदमी हैं।

माया: हाँ। इसलिए मुझे भी उनके साथ आना पड़ा। अब वो तो चले जाएँगे रोज काम पे और मैं यहाँ अकेली बोर हूँगी।

जगिया की आँखों में चमक आ गई।

जगिया: अरे आप फिकर मत कीजिए बहुरानी। हम हैं ना। हम आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं होने देंगे।

माया उसकी ओर देख प्यारी सी स्माइल दी। जगिया की तो जैसे अब लॉटरी लगने वाली थी। उसका दिमाग माया को फँसाने का जाल बुनने लगा।

माया: आप कितने अच्छे हैं।

माया ने कहा।

जगिया: आप भी तो बहुत अच्छी हैं। वैसे आप शहर में भी अकेली ही रहती थीं?

माया: अरे नहीं नहीं। वहाँ पे तो मैं भी विवेक की तरह जॉब करती थी। शहर के एक बड़े हॉस्पिटल में। और खुद का क्लिनिक भी शुरू करने वाली थी। मगर स्टार्ट करती इससे पहले ही विवेक का यहाँ ट्रांसफर हो गया।

जगिया: हॉस्पिटल में!? यानी कि आप एक…!

माया: सही पहचाना। मैं एक डॉक्टर हूँ।

माया ने हँसते हुए कहा।

जगिया: यकीन नहीं होता। क्या सच में?

माया: हाँ। मगर ऐसे क्यों पूछ रहे हो?

जगिया: नहीं वो पहले मुझे आपको देखके लगा नहीं कि आप एक डॉक्टर भी हो सकती हैं। आप उस टाइप की तो लगती ही नहीं।

माया: तो किस टाइप की लगती हूँ मैं?

माया ने थोड़ी हैरानी से पूछा।

जगिया: मुझे तो लगा कि आप किसी फिल्म की हीरोइन होंगी। डॉक्टर तो बिल्कुल नहीं लगती आप।

जगिया की बात से माया एकदम खिलखिलाती हुई हँस पड़ी। उसे जगिया का ये नेचर बहुत अच्छा लगा। कितनी भोले अंदाज के साथ उसने माया को ये बात कह दी। सच में गाँव के लोग कितने भोले होते हैं।

माया: क्या जगिया जी। आप भी। अच्छा मजाक करते हैं आप! मैं और हीरोइन? कभी नहीं।

जगिया: सच कह रहा हूँ बहुरानी। हमें तो पहले ऐसा ही लगा।

माया फिर से हँसने लगी।

माया: अच्छा! मगर ऐसा क्यों लगा आपको?

जगिया: वो आप इतनी खूबसूरत जो हैं। तो हमें लगा कि शायद आप…

माया की हँसी तो अब रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। मगर जगिया उसकी तारीफ पे तारीफ के पुल बाँधे जा रहा था और साथ ही साथ अपनी किस्मत का भी।

माया: बस बस जगिया जी। अब बस कीजिए। मैं तो हँस-हँसके थक गई।

जगिया के चेहरे पे काली मुस्कान छा गई। माया के रूप का वो दीवाना हो चुका था। उसे कैसे भी करके इस बाला को काबू में करना था।

रात को 8 बजे विवेक आया। तब तक जगिया जा चुका था। माया ने खाना तैयार रखा था। मगर उसका मूड बिगड़ा हुआ था।

माया: बहुत जल्दी आए आप!

विवेक: सॉरी डार्लिंग! वो आज पहले दिन प्लांट के बारे में सब जानना-समझना था इसलिए देर हो गई।

माया: कोई बात नहीं चलो फ्रेश हो जाओ। मैं खाना लगा देती हूँ।

विवेक फ्रेश होकर आया और दोनों ने साथ में खाना खाया।

विवेक: अरे वो चाचा दिख नहीं रहे।

माया: वो तो चले गए। उनका काम 7 बजे तक खत्म हो चुका था।

विवेक: ओह। चलो ठीक है। पर वो खाना खाके गए या ऐसे ही चले गए?

माया: नहीं उन्होंने कहा वो घर पे खाएँगे। बेचारे बहुत दुखी हैं।

विवेक: क्यों? ऐसा क्यों कह रही हो?

माया ने उसे सारी बात बताई। विवेक ने भी अफसोस जाहिर किया।

विवेक: बेचारा। सच में बहुत दुखी लगता है। इतने सालों से यूँ अकेला रहना, बड़ा कठिन काम है।

माया: अच्छा विवेक तुमने कहा था यहाँ एक छोटा सा अस्पताल (क्लिनिक) है। और तुम मेरे लिए बात करोगे।

विवेक: हाँ हाँ याद है मुझे। अभी आज ही तो आए हैं। कल मैं बात करता हूँ किसी से। पर इस गाँव में अभी हमें कोई जानता भी तो नहीं है।

माया: क्यों ना हम जगिया जी से ही पूछ लें। वो तो इस गाँव में बरसों से रहते हैं। उन्हें पता होगा।

विवेक: हाँ ये ठीक है। मैं कल बात करता हूँ।

दोनों फिर खाना खाकर सोने चले गए। माया का आज मूड विवेक के साथ रोमांस करने का हो रहा था। उसने खूबसूरत नाइटी पहनी और विवेक के सामने आई।

विवेक उसे देखता ही रह गया। माया उसके करीब आई और उसे बिस्तर पे बिठा दिया।

माया: कैसी लग रही हूँ मैं?

उसकी हालत पे माया मन ही मन मुस्कुरा दी।

विवेक: बेहद खूबसूरत।

विवेक उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए।

माया: सिर्फ देखते ही रहोगे?

विवेक उसका इशारा समझ गया। पर आज वो बहुत थक चुका था।

विवेक: माया ये सब हम संडे को करें। आज पहला दिन था और बहुत थक चुका हूँ। कल भी जल्दी जाना है।

माया: सिर्फ कुछ देर विवेक। आज मेरा बहुत मन कर रहा है।

माया ने उसके गले में हाथ डालते हुए कहा।

विवेक: माया देखो आज तो मुझमें दम ही नहीं बचा। सच में नहीं कर पाऊँगा। प्लीज संडे को।

माया: हम्म। हर वक्त बस देखो तो काम-काम-काम। मेरे लिए वक्त ही नहीं तुम्हारे पास। लास्ट बार कब किया था वो भी तुम्हें याद नहीं होगा।

विवेक: संडे को प्रॉमिस डार्लिंग। तुम जो चाहोगी वैसा करूँगा।

माया: ठीक है। सो जाओ। गुड नाइट।

विवेक: गुड नाइट स्वीटहार्ट।

आगे क्या हुआ पढ़ें नेक्स्ट पार्ट में।

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