माया – एक कामुक पत्नी – 1

A housewife lust sex story:- नमस्कार दोस्तों। मैं रेनू आपके सामने एक नई कहानी लेकर आ रही हूँ। आशा करती हूँ आपको अच्छी लगेगी। स्टोरी के सारे कैरेक्टर्स काल्पनिक हैं। इसका किसी वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

तो पेश है कहानी।

माया: विवेक जरा मेरी ये साड़ियाँ बैग में रख दोगे प्लीज!

विवेक: ऑफ हो माया। और कितना सामान भरना है? हम वहाँ परमानेंट थोड़ी ना शिफ्ट हो रहे हैं।

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माया: जानती हूँ विवेक, पर मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारी कंपनी वालों ने सिर्फ तुम्हें ही क्यों इस काम के लिए चुना? आई मीन यहाँ अच्छा-खासा सेटल हुए थे हम और अब इस शहर को छोड़के हमें एक छोटे से गाँव में जाना पड़ रहा है।

विवेक: वो क्या है ना मेरी जान कि उन लोगों को मुझे और मेरी काबिलियत पे कुछ ज्यादा ही भरोसा है। इसलिए तो इस काम के लिए मुझे चुना। और तुम देख लेना इस काम के बाद मुझे कितना बड़ा प्रमोशन मिलने वाला है।

माया: वो सब तो ठीक है मगर मैं उस छोटे से गाँव में अकेली सारा दिन करूँगी क्या? अभी कुछ ही महीनों पहले तो यहाँ हॉस्पिटल में मुझे जॉब ऑफर हुई थी। और मुझे खुद का क्लिनिक भी शुरू करना था।

विवेक: अरे तुम अपना काम वहाँ पे शुरू कर लेना। डॉक्टर की जरूरत तो सब जगह होती है। मैंने पता लगाया है वहाँ पे भी एक छोटा सा हॉस्पिटल है। तुम वहाँ अपना क्लिनिक स्टार्ट कर सकती हो। और वैसे भी कुछ ही महीनों की ही तो बात है। फिर तो हम वापस आ जाएँगे।

माया: तुम और तुम्हारा काम। मेरे लिए तो वक्त ही नहीं तुम्हारे पास। शादी से पहले तो कैसे-कैसे वादे किए थे। मैं तुम्हारे लिए ये करूँगा वो करूँगा। मगर सब भूल गए।

विवेक: अरे नाराज क्यों होती हो मेरी जान। बस कुछ महीनों की ही तो बात है। एक बार प्रमोशन मिल जाने दो फिर देखना। तुम्हें पूरी दुनिया घुमाऊँगा।

विवेक ने पीछे से माया को अपनी बाँहों में भरते हुए कहा।

माया: सच्ची?

विवेक: मुच्ची!

दोनों हँस पड़े और अपना सामान पैक करने लगे।

ये है माया उम्र – 26 साल फिगर – 36-24-38 पेशे से एक डॉक्टर। बेहद ही खूबसूरत और मदमस्त जवानी से भरपूर। काले लंबे घने बाल, हिरनी जैसी आँखें, गुलाब के पंख जैसे होठ, और दूध जैसा गोरा बदन। इनके बावजूद नेचर से बिल्कुल इनोसेंट।

ये है विवेक शर्मा। उम्र – 28 साल एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर।

बैकग्राउंड

माया और विवेक ने अभी 6 महीने पहले ही अपना संसार बसाया था। दोनों की लव मैरिज थी। विवेक मुंबई से बिलॉng करता था और माया पुणे से।

दोनों की मुलाकात उनके एक दोस्त और सहेली की शादी में हुई थी और वहाँ से दोनों एक-दूसरे के करीब आए थे।

वक्त के साथ दोनों ने अपने परिवार वालों से बात की और उन्हें शादी के लिए राजी किया। चूँकि दोनों ही अपने माँ-बाप के इकलौते संतान थे और वेल एजुकेटेड थे इसलिए दोनों ही के परिवार वालों को इस रिश्ते से कोई ऑब्जेक्शन नहीं था। सिवाय एक के।

वो थी माया की माँ पुष्पादेवी। वैसे तो उसे इस रिश्ते से तो कोई आपत्ति नहीं थी पर एक चिंता उसके दिल को बरसों से अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। और उस चिंता का कारण और कोई नहीं बल्कि उसकी खुद की ही बेटी थी।

कहते हैं औरत का दिल एक अगाध समुंदर है जिसके अंदर कई सारे राज़ दफन हुए होते हैं जिसे आज तक कोई नहीं जान पाया। वैसे तो माया बेहद ही अच्छी लड़की थी। बचपन से माँ-बाप के संस्कारों में पली-बढ़ी। पर इसके बावजूद ऐसा कुछ था जो माया के अंदर कहीं छुपा बैठा था। शायद उसके दिल के एक ऐसे कोने में जिसके बारे में खुद माया को भी पता नहीं था।

पर बदकिस्मती से उसकी माँ को ये बात शायद पता चल चुकी थी और यही कारण था जब माया की बिदाई हो रही थी उस वक्त पुष्पादेवी ने उसे ये शब्द कहे।

पुष्पादेवी: माया बेटी। आज तुम अपना एक नया संसार बसाने जा रही हो। इसलिए जाने से पहले मैं तुमसे कुछ जरूरी बात बताना चाहती हूँ।

शादी जीवन का एक अटूट बंधन है। प्यार का नाजुक अनमोल धागा है। यदि सच्चे मन से निभाए तो 7 जन्मों तक साथ देता है। वरना पल भर में किसी शीशे की तरह टूटके बिखर सकता है।

इसलिए बेटी इस बात को सदा याद रखना कि जीवन में चाहे कितने ही धूप-छाँव क्यों ना आए, कितनी ही कठिनाइयाँ मुश्किलें क्यों ना आ जाएँ मगर तुम्हें अपने कुल मर्यादा और संस्कार की देहलीज कभी भी पार नहीं करनी चाहिए।

माया ने अपनी माँ की बात सुन तो ली पर उसकी ये बात उसके दिल के उस कोने तक ना पहुँच पाई जहाँ कोई पहले से ही छुपा बैठा था। अगर पहुँच जाती तो उसके जीवन में वो तूफान कभी नहीं आता जो अब धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा था।

और उस तूफान का नाम था ‘आदमपुर’ गाँव। जहाँ विवेक का ट्रांसफर हुआ था।

विवेक जिस मल्टीनेशनल कंपनी में था वो कानपुर में थी। इसलिए शादी के बाद वो दोनों तुरंत वहीं शिफ्ट हो गए थे। माया एक डॉक्टर थी इसलिए उसे भी शहर में एक बड़े हॉस्पिटल में जॉब मिल गई थी और अब वो अपना खुद का क्लिनिक भी शुरू करना चाहती थी।

मगर इससे पहले ही विवेक की कंपनी ने उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट ऑफर किया। उसकी कंपनी एक बहुत बड़ा प्लांट लगाना चाहती थी मगर शहर में इतनी बड़ी जमीन मिलना मुमकिन नहीं था। इसलिए सरकार की ओर से उसे एक गाँव के आसपास की जमीन मिली थी जहाँ पे वो अपना प्लांट शुरू कर सकते थे।

जब माया को ये बात पता चली तो उसका मूड ऑफ हो गया। क्योंकि वो शहर को छोड़के किसी छोटे से गाँव में जाना पसंद नहीं करती थी।

माया एक अच्छी लड़की होने के साथ-साथ एक अच्छी डॉक्टर भी थी। लोगों की सेवा करना उसे बेहद पसंद था। मगर ये सब काम वो इसी शहर में रहके करना चाहती थी। इसलिए उसने विवेक को समझाया कि इस ऑफर को ठुकरा दे। पर विवेक नहीं माना। उसको इस प्रोजेक्ट के बाद बहुत बड़ा प्रमोशन मिलने वाला था इसलिए आगे बढ़ने की धुन में उसने ये काम एक्सेप्ट कर लिया था। माया समझदार लड़की थी। वो विवेक को खुश देखना चाहती थी इसलिए उसकी खुशी के लिए वो भी मान गई। पर विवेक शादी के 6 महीनों में ही अपने काम में इतना उलझने लगा था कि माया को पूरा वक्त नहीं दे पा रहा था। ऐसा नहीं था कि वो माया को कम प्यार करता था। शादी के बाद दोनों गोवा अपना हनीमून मनाने भी गए थे। मगर माया के दिल का एक बहुत पुराना सपना था। पूरी दुनिया घूमने का (वर्ल्ड टूर)। शायद विवेक के प्रमोशन के बाद उसका ये सपना भी पूरा हो जाए।

इसी उम्मीद के साथ वो विवेक के साथ जाने के लिए राजी हो गई। दोनों ने अपना सारा सामान लेके नीचे हॉल में आ गए। रात के 9 बजे की ट्रेन थी। अभी 7 बजे थे। दोनों ने फटाफट डिनर कंप्लीट किया और घर को पूरा चेक कर लिया। करीब 8 बजे कंपनी की कार उन्हें लेने आ गई। दोनों ने अपना सारा सामान कार में रखा और घर को ठीक तरह से लॉक करके रेलवे स्टेशन की ओर निकल गए।

कंपनी की ओर से उनकी टिकट पहले से ही कन्फर्म थी इसलिए उन्हें जल्दी ही अपनी बर्थ मिल गई।

ठीक 9 बजे ट्रेन चल पड़ी। और माया का सफर यहाँ से शुरू हुआ।

विवेक ट्रेन में भी लैपटॉप में उलझा हुआ था। और माया खामोश बैठी खिड़की के बाहर का नजारा देख रही थी। जब विवेक कब से मुँह डाले काम कर रहा था तो उससे रहा नहीं गया।

माया: विवेक अब यहाँ पे तो काम को साइड में रखो। कब से देख रही हूँ लैपटॉप में घुसे पड़े हो।

विवेक: बस थोड़ा सा ही बाकी है जान। अभी कंप्लीट हो जाएगा।

माया कुछ बोली नहीं और चुपचाप मोबाइल पे गाना सुनने लगी।

11 बजे विवेक का काम खत्म हुआ और बोला।

विवेक: बस हो गया जान। अब बोलो।

माया: विवेक देख रही हूँ हमारी शादी को अभी 6 महीने ही हुए हैं और तुम अपने काम में इतना उलझ गए हो कि मुझे वक्त ही नहीं देते।

विवेक: अरे ऐसा नहीं है जान। वो क्या है कल वहाँ साइट पे जाना है इसलिए एडवांस प्रोजेक्ट कंप्लीट कर रहा था।

माया: कल से ही काम शुरू कर दोगे?

विवेक: यस बेबी। कंपनी को ये काम इस साल में कैसे भी करके पूरा करना है। इसलिए कल से ही वहाँ जाना पड़ेगा।

माया: तुम और तुम्हारी नौकरी।

माया ने अपना मुँह बनाया और बाहर देखने लगी।

विवेक: अरे नाराज ना हो मेरी जान। देखना एक बार मुझे प्रमोशन मिल जाए फिर तो ऐश ही ऐश है।

विवेक ने माया के हाथों को सहलाते हुए कहा।

दोनों ने कुछ देर ऐसे ही बात की फिर सो गए। रात के करीब 2 बजे माया को बाथरूम लगी। विवेक गहरी नींद में था तो उसे जगाना माया को मुनासिब ना लगा।

वो कम्पार्टमेंट से निकलकर अकेली बाथरूम की ओर चल दी।

बाथरूम के अंदर जैसे ही वो पेशाब करने बैठी कि बाहर से कोई दरवाजा जोर-जोर से खटखटाने लगा। माया को अजीब लगा। मगर उसे बहुत जोर की लगी थी इसलिए वो बैठी रही। तभी फिर से दरवाजा जोर-जोर से खटने लगा। माया को अब थोड़ा गुस्सा आया।

माया: एक मिनट रुको। आ रही हूँ।

फिर भी दरवाजा नॉक करने की आवाज चालू ही रही।

अब माया को बहुत गुस्सा आ रहा था। वो पेशाब करके खड़ी होकर अपनी साड़ी ठीक करने लगी और हाथ धोने लगी। मगर बाहर से अब भी कोई दरवाजा ठोके जा रहा था।

माया: बोला ना आ रही हूँ। 2 मिनट रुक नहीं सकते?

हाथ धोके माया ने गुस्से से दरवाजा खोला और देखा कि कौन है। सामने एक बुड्ढा आदमी खड़ा था। दिखने में एकदम जाहिल, गँवार और गंदा किस्म का। किसी भिखारी की तरह लग रहा था। आँखें एकदम लाल थीं उसकी और रंग भुंड की तरह काला। उसने अपने मुँह में एक सिगरेट ठूँस रखी थी।

माया ने गुस्से से उसकी ओर देखा।

माया: क्या वो तुम थे जो कब से दरवाजा खटखटा रहे थे?

उस आदमी ने माया को एक बार ऊपर से नीचे तक घूरके देखा। मगर कुछ बोला नहीं।

माया: देख क्या रहे हो? जवाब क्यों नहीं देते?

उस आदमी ने मुँह से सिगरेट निकाली और माया के मुँह पे धुआँ छोड़ा। माया ने अपना मुँह तुरंत दूसरी ओर कर लिया और धुएँ की बदबू उड़ाने लगी। उसे अब बहुत गुस्सा आ रहा था।

माया: ये क्या बदतमीजी है? शर्म नहीं आती?

माया की साँस जोर से चलने लगी क्योंकि रात के इस वक्त अकेले उसे डर भी लग रहा था।

उस आदमी ने एक बार माया की ओर अजीब नजरों से देखा। माया की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।

आदमी: मूत लगी थी जोरों से, सो ठोक रहा था।

माया को उसकी इस तरह की गंदी बात से घिन आई। और गुस्सा भी।

माया: तो कहीं दूसरी जगह नहीं जा सकते थे? क्या एक ही बाथरूम दिखा तुम्हें पूरी ट्रेन में?

वो आदमी माया को घूरने लगा। माया भी एक पल चुप रही।

आदमी: अगर बकबक पूरी हो गई हो तो वहाँ से हटेगी या यहीं मूत दूँ तेरे सामने।

उस आदमी ने अपनी पैंट की जिप खोल दी। ये देख माया का दिमाग हिल गया और वो वहाँ से जाने लगी। वो आदमी बाथरूम में घुस गया और दरवाजा ओपन रखकर ही मूतने लगा। उसने पीछे मुड़के माया की ओर देखा जो गुस्से से लाल-पीली होती हुई जा रही थी और जाते-जाते उसकी इस गंदी हरकत पे गाली देती गई।

माया: बास्टर्ड कहीं का।

वो आदमी कातिल मुस्कान हँसा और वहाँ से चला गया।

माया अपने कम्पार्टमेंट में आकर देखा विवेक आराम से सो रहा था। माया थोड़ी देर अपनी बर्थ पर बैठी। उसे अब भी उस आदमी पे गुस्सा आ रहा था। ना जाने कहाँ-कहाँ से ऐसे लोग आ जाते हैं। बदतमीज कहीं का।

कुछ देर बाद उसे भी नींद आ गई और वो सो गई।

सुबह 6 बजे उसकी नींद टूटी। विवेक उसे जगा रहा था।

विवेक: माया उठो। हम पहुँचने ही वाले हैं।

माया खड़ी हुई और बाहर की ओर देखा। कितना खूबसूरत नजारा था। छोटी-मोटी पहाड़ियाँ, जंगल, घाटियाँ। ऐसा लगता था मानो किसी हिल स्टेशन पे पहुँच गए हों।

वैसे जहाँ पे वो लोग जा रहे थे वो गाँव भी वैसा ही कुछ था। देहरादून से कुछ किमी. की दूरी पर बसा हुआ था ये गाँव।

विवेक और माया दोनों अपने सामान समेटने लगे। करीब आधे घंटे में वो लोग अपनी मंजिल पे पहुँच गए।

विवेक और माया दोनों ही ट्रेन से अपना सामान लेके प्लेटफॉर्म पे उतरे। माया ने देखा प्लेटफॉर्म बिल्कुल छोटा सा था। टूटा-फूटा और खाली। दूर एक साइन बोर्ड लगा था जिसपे लिखा था।

‘आदमपुर’

वो दोनों प्लेटफॉर्म से बाहर निकले। सामने एक कार खड़ी थी और एक आदमी भी। उसने विवेक की ओर देखा और बोला।

आदमी: मिस्टर विवेक शर्मा?

विवेक: यस।

आदमी: हेलो सर। मैं हमारी कंपनी की ओर से आपको पिक करने आया हूँ।

विवेक: ओह! थैंक्स।

आदमी: चलिए सर। कंपनी ने जहाँ आपके रहने का इंतजाम किया है वो आपको दिखा दूँ।

विवेक और माया दोनों अपना सामान कार में रखकर उसके साथ चले गए। कार कच्चे-पक्के रास्तों से गुजरती हुई जा रही थी। माया बाहर की ओर गाँव का नजारा देख रही थी। छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, खेत, जंगल, कच्चे-पक्के घर। दिखने से ही पता चल जाता कि बहुत ही गरीब गाँव है।

कुछ देर बाद कार एक दूसरे रास्ते पे मुड़ी जो थोड़ा चढ़ाई वाला रास्ता था। वो सड़क गाँव की सड़क से थोड़ी अच्छी थी। करीब 10 मिनट में वो लोग अपनी मंजिल पे पहुँच गए।

जब दोनों कार से उतरे तो देखा सामने एक मस्त बंगला था। माया तो देखती रह गई और सोचने लगी इतने छोटे से गाँव में इतना बड़ा-बड़ा बंगला। विवेक भी इंप्रेस्ड हो गया। उसकी कंपनी ने बहुत बढ़िया जगह दी थी।

तभी वो आदमी बोला।

दुबे: लीजिए सर। ये है आपका घर। कैसा लगा।

विवेक: अमेजिंग। क्या बंगला है। और वो भी इतनी खूबसूरत जगह में। सच में बहुत बढ़िया है। ऐसा लगता है मानो किसी हिल स्टेशन पे आ गए हो। क्यों माया? क्या कहती हो?

माया: यस विवेक। सच में बहुत बढ़िया है। कितनी शांति है यहाँ पर।

विवेक: वैसे आपका नाम क्या है? विवेक ने उस आदमी से पूछा।

दुबे: जी मेरा नाम आर के दुबे है। मैं यहाँ प्लांट में जूनियर प्रोजेक्टर हूँ।

विवेक: अच्छा-अच्छा। तो दुबे जी। अंदर चलें।

दुबे: जी सर। बिल्कुल। आइए।

तीनों अंदर जा रहे थे कि पीछे से किसी की आवाज से वो लोग रुक गए।

जगिया: राम-राम दुबे जी।

तीनों ने पलटकर देखा तो एक आदमी हाथ जोड़े धीरे-धीरे दौड़ता हुआ उनकी ओर आ रहा था। और आकर पीछे खड़ा हो गया। माया ने उसे पलटकर देखा।

दुबे ने उसे पहचान लिया और मुस्कुराते हुए बोला।

दुबे: अरे आओ जगिया आओ। आ गए तुम?

जगिया: जी मालिक।

दुबे: चलो अच्छा हुआ तुम आ गए। इनसे तुम्हारी पहचान करवा देता हूँ। ये हैं विवेक साहब और उनकी पत्नी। जो यहाँ पे रहने आए हैं। और विवेक सर ये है जगिया। यहाँ की साफ-सफाई, देखभाल सब कुछ करता है।

जगिया ने विवेक की ओर देखा और हाथ जोड़के झुकके प्रणाम किया।

जगिया: नमस्ते मालिक।

विवेक: नमस्ते।

विवेक ने उसकी ओर देख मुस्कुराया।

फिर जगिया माया की ओर पलटा और अपने गंदे पीले दाँत दिखाते हुए नमस्ते किया।

जगिया: नमस्ते मालकिन।

माया ने भी नमस्ते करते हुए हल्की सी स्माइल दी।

फिर दुबे बोला।

दुबे: चल जगिया ये सारा सामान अंदर रखवा दे तब तक मैं इनको घर दिखा दूँ।

विवेक दुबे के साथ अंदर जाने लगा। माया ने जैसे ही अपना बैग उठाया कि जगिया ने उसे तुरंत ही रोक दिया।

जगिया: अरे-अरे मालकिन। आप क्यों तकलीफ लेती हैं। मुझे दीजिए मैं ले लूँगा।

माया: अरे इसमें तकलीफ की क्या बात। मैं ले लूँगी।

जगिया: अरे मालकिन हमारे होते हुए आप काम करेंगी! हरगिज नहीं। लाइए दीजिए मुझे।

माया: पर..!!

जगिया: पर-बर कुछ नहीं। लाइए दीजिए मुझे।

माया के चेहरे पे मुस्कान आ गई। उसने बैग जगिया की ओर बढ़ाया। जगिया ने जैसे ही बैग लिया कि उसका हाथ माया के कोमल हाथों को छू गया। माया को एक अजीब सा झटका लगा। उसने अपना हाथ जल्दी से वापस ले लिया। वो जगिया को देखने लगी पर जगिया को तो जैसे कुछ पता ही नहीं वैसे बोला।

जगिया: क्या हुआ मालकिन?

माया: हूँ। जी कुछ नहीं।

जगिया: तो चलिए अंदर।

माया कुछ बोली नहीं और अंदर जाने लगी। आगे वो थी और पीछे जगिया, जो पीछे से माया की चिकनी नंगी पीठ और मटकती हुई चाल को देख मंद-मंद मुस्कुराता हुआ चल रहा था।

ये है जगिया (असली नाम जगनाथ) उम्र – 58 साल रंग कोयले की तरह काला और एक नंबर का हरामी, टोटली कैरेक्टरलेस। गाँव वालों के सामने खुद को भला-भोला दिखने वाला ये शख्स असल में बहुत बड़ा रंडीबाज और जुआरी है।

जगिया का इस वक्त परिवार में कोई नहीं है। बिल्कुल अकेला। जवानी में इसकी शादी पड़ोस के किसी गाँव की लड़की से हुई थी। मगर उसकी बुरी आदतों की वजह से उसके ससुर ने अपनी बेटी से इसका रिश्ता तुड़वाके उसे वापस ले गया था।

तब से ये अकेला है। खुद का गाँव में एक टूटा-फूटा घर है। बरसों से ये इस बंगले की देखभाल करता है। और जो भी सैलरी मिलती उसे दूसरे शहर में जाके वो सारा पैसा जुए और दारू में उड़ाता। कई बार ज्यादा पैसा मिलता तो रंडियों को भी चोद आता। मगर साले की प्यास नहीं बुझती।

ये है जगिया। जिसे गाँव के लोग उसके पीठ पीछे काली लोमड़ी के नाम से पुकारते थे।

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