लॉकडाउन और तबस्सुम – 1

Naukar se damdar chudai ki kahani:- ये कहानी है तबस्सुम खान की जिसे तब्बी भी प्यार में बोलते थे. तबस्सुम खान की शादी एक बड़े बिजनेसमैन अल्ताफ के साथ हुई करीब 1.5 साल पहले. ऐसा नहीं था कि तबस्सुम मीडियम घराने की थी. वो भी अच्छे घराने से ताल्लुक रखती थी। उसकी शादी मुरादाबाद में हुई और इनका मायका अंबाला में था

तबस्सुम खान 23 साल की पढ़ी-लिखी, पर्दे की पाबंद और दुनियादारी से बेखबर थी

हाँ ये तो नेचुरल होता ही है कि शादी के बाद क्या होता है, वो तबस्सुम को भी मालूम था।

अब ज़्यादा टाइम ना लेते हुए मुद्दे पर आता हूँ

तबस्सुम की शादी हो गई, उसका एक बच्चा भी था

और उसके मियाँ अल्ताफ और तबस्सुम को देखकर नहीं लगता था कि ये दोनों एक-दूसरे से सैटिस्फाय नहीं हैं

पर तबस्सुम के दिल में क्या चलता था वो एक राज़ था, जो अभी पोशीदा नहीं हुआ था एक आम कपल की तरह उनकी लाइफ चल रही थी

Naukar se damdar chudai ki kahani

वैसे तबस्सुम का घर बड़ा था पर घर में कोई नौकर नहीं था. बस एक खाला टाइप नौकरानी थी जिसके उम्र 40 साल की थी। वो करीब 10 बजे से 5 बजे तबस्सुम के यहाँ काम करती थी और बच्चे को भी बड़े अच्छे से संभालती थी

मर्द के नाम पर एक शंकर नाम का 45 साल का हट्टा-कट्टा नौकर था जो काले और साँवले के बीच का जो कलर होता है वैसे ही था

शंकर इस घर में बरसों से काम करता था पर हाँ एक बात, शंकर अल्ताफ का उसकी परछाई से भी भरोसे का आदमी था

लेकिन वो यहाँ इस घर में नहीं रहता था बल्कि वो थोड़ा सब्जी-सामान लाने का और कुछ बाहर की ज़रूरतमंद सामान लाता था

और वो बाकी टाइम उसकी फैक्ट्री का काम संभालता था और रात को वहीं सोता था. क्योंकि अल्ताफ को खास तौर से किसी मर्द नौकर पर भरोसा और इसलिए भी नहीं रखा कि उसकी वाइफ की खूबसूरती ऐसी थी कि कोई भी मर्द देख ले तो शायद उसका ईमान डोल जाए

अभी खूबसूरती की बात चली है तो बताता हूँ. बच्चे को अपना दूध पिलाने से इस टाइम उसकी चुचियाँ 34D, कमर 30, हिप्स 39 के थे जो बहुत ही खूबसूरती की अलामत उसके जिस्म के कटाव को देते थे

उसकी आँखें बड़ी दिलकश थीं, नाक थोड़ी आगे से गोल थी जिससे उसके चेहरे की खूबसूरती देखने-दिखाने लायक रहती। कमाल के फिगर के साथ हाइट 5.7 इंच थी. जिससे उसका जिस्म बड़ा आकर्षक लगता है

वो जब भी बाहर जाती नकाब लगाकर जाती

और वो घर में हमेशा सलवार-सूट में रहती और कभी जब किसी के आने का अंदेशा नहीं होता तो रात को वो लेग्गी पहनकर सोती. जिससे उसकी जाँघें लेग्गी में बड़ी खूबसूरत भरी हुई कसी हुई लगतीं

शंकर रोज़ ही उसके यहाँ आता था और तबस्सुम को देखकर क्या सोचता था पता नहीं

पर वो घर में ज़्यादातर हमेशा तबस्सुम को वेल में देखता

लेकिन ये शंकर को ही पता था कि वो जब भी तबस्सुम को देखता तो क्या सोचता

अल्ताफ का दोस्त था असलम जो उसी कॉलोनी में पीछे वाले ब्लॉक में रहता था दोनों एक ही ब्रास का बिजनेस करते थे तो दोनों का आना-जाना रहता था

पर असलम के साथ उसकी वाइफ नादिया भी आती थी इसलिए एक तरह से अच्छी फैमिली फ्रेंड थे। नादिया भी एक अच्छे किरदार की औरत थी

पर उसका बच्चा शादी के 2 साल बाद भी नहीं हुआ था. अब ये पता नहीं कि फैमिली प्लानिंग थी या कुछ और बात थी. वो तो आगे पता चलेगा

नादिया की उम्र 25 साल यानी तबस्सुम की हमउम्र थी. और वो टाइम पास करने के लिए एक लाइब्रेरी में इंचार्ज थी

वो भी हमेशा बुर्का-नकाब लगाती थी. और लाइब्रेरी में वो वेल पहनती थी

पहले आते हैं अभी फिलहाल तबस्सुम खान के ऊपर।

असलम और अल्ताफ साथ ही बिजनेस टूर पर जाते थे और साथ ही वापस आते थे

उसके पीछे कभी तबस्सुम नादिया के यहाँ जाती, कभी नादिया आ जाती. पर रात को ही

दिन में तो खाला तबस्सुम का काम संभालती थी

तबस्सुम इकलौती लड़की थी और 2 भाई भी थे पर कुछ गैप या मन्नतें माँगने के बाद हुए थे. एक बड़ा भाई ** साल का और दूसरा ** साल का था तबस्सुम के अब्बू दिल के मरीज थे और माँ को भी शुगर की शिकायत रहती इसलिए वो ट्रैवल करने में बहुत दिक्कत आती

अब आते हैं मेन कहानी की तरफ। 12 मार्च का दिन था इंडिया में सब कुछ नॉर्मल चल रहा था

13 मार्च को केरला की फ्लाइट थी असलम और अल्ताफ की तब तबस्सुम ने कहा कि मेरे वालिदैन की तबियत सही नहीं है. तो आप कल दिल्ली जा रहे हैं फ्लाइट पकड़ने, तो आपकी रात की फ्लाइट है. आप एक काम करें मुझे अंबाला ड्रॉप कर दें।

ये बात तबस्सुम ने कुछ डरते हुए कही. तबस्सुम का मासूम सा चेहरा देखकर अल्ताफ मान भी गया

और उसे अपने साथ ले जाने को तैयार हो गया

इसलिए असलम से उसने अकेले एयरपोर्ट पर जाने को कहा और सुबह उसके एक टैक्सी बुक करा ली. और वो खुद की कार से नहीं गया

दोनों शाम को 5 बजे घर पहुँचे थे और अल्ताफ को वापस एयरपोर्ट आना था तो वो बस फ्रेश होकर कुछ नाश्ता-वाश्ता करके उसी टैक्सी से वापस आ गया

सब परिवार के लोग तबस्सुम को देखकर बड़े खुश थे। उसके बेटे को दोनों भाई खिलौना समझकर खेल रहे थे

ये फैमिली करीब 19 मार्च तक बहुत खुश रही.

19 मार्च के दिन तबस्सुम के बेटे की तबियत खराब हो जाती है उसको बाहर की किसी डॉक्टर की दवाई कभी मुफीद नहीं आती।

मुरादाबाद में डॉ. भल्ला थे जो अच्छे स्पेशलिस्ट बच्चों के डॉक्टर थे

तब तबस्सुम अपने बेटे के बारे में अल्ताफ से बात करती है. तो अल्ताफ कहता है,

अल्ताफ: घराने की कोई ज़रूरत नहीं मैं डॉ. साहब से बात कर लूँगा और अभी सुबह मैं शंकर को भेजता हूँ और उधर से 2 टिकट लक्जरी बस में बुक करा देता हूँ। मैसेज तुम्हें भेज दूँगा तो तुम आ जाना।

नॉर्मली ही तबस्सुम ने हाँ कर दी क्योंकि शंकर बहुत वफादार था

पर एक राज़ ये था कि शंकर चुपके से रोज़ रात को देसी पीता था. और कमाल की बात ये थी कि इस बात की भनक आज तक अल्ताफ को नहीं हुई

अल्ताफ ने शंकर से बात करके सुबह अंबाला जाने को कहा और वहाँ से 9 बजे बस थी उसी से वापस आने को कहा जो सुबह तक मुरादाबाद आ जाती थी. और सिर्फ 1 जगह का खाने-पीने का स्टॉप लेती थी

शंकर वहाँ से चल तो दिया पर शाम तक उसने कोई दारू नहीं ली. पर उसे शराब की सिर्फ रात को ज़्यादा लत लगती थी

जब वो शाम को पहुँचा तो उसे कोई देसी दारू की दुकान नहीं दिखी. बस इंग्लिश की दिखी

वो इंग्लिश बिल्कुल पसंद नहीं करता था. और रात भी उसे दुकान ढूँढने में लग गई. वैसे शंकर बहुत बार अंबाला आया था

पर कभी वो रात को रुका नहीं। अगर कभी रुकना भी था तो वो अपना इंतजाम कर लेता था

खैर जब उसने टाइम देखा और लगातार उसके मोबाइल पर अल्ताफ के कॉल आ रहे थे तो वो बस पहुँच गया। बस पहुँच गया कह रहा था

फिर फाइनली तबस्सुम का भी कॉल आया तो वो कहती है,

तबस्सुम: 10 बजे की बस है और अब 9 बज रहे हैं। अगर बस निकल गई तो प्रॉब्लम होगी अब्बू भी इंतजार कर रहे हैं और स्टैंड पहुँचने के लिए कार भी रेडी है

तब शंकर ने माफी माँगते हुए कहा,

शंकर: आप बस स्टैंड ही आ जाओ। मुझे आपके यहाँ आने में 30 मिनट लग ही जाएँगे। जाम बहुत मिला इसी वजह से लेट हो गया

ये सुनकर तबस्सुम रेडी होकर घर से अपने अब्बू के साथ निकल जाती है

और शराब ना मिलने से शंकर का मूड खराब हो रहा था। इंग्लिश उसे पानी की तरह लगती थी

इसलिए बस बीड़ी ही सुट-सुट कर अपनी तलब बुझा रहा था। वैसे वो 11 बजे रात को पीता था लेकिन उसे क्या पता ये लत उससे क्या कराएगी

10 बजे 2 सीटर पर जो काफी कंफर्टेबल थी और आगे पैर रखने का भी बहुत अच्छी जगह भी थी, सीट भी काफी चौड़ी थी वहीं सीट पर 2 कंबल भी रखे थे विंडो के अलावा ऊपर सोने की जगह भी थी स्लीपर कोच की तरह और बैठने के लिए कुछ ही सीट थी स्लीपर का किसी बस जो लक्जरी होती थी उसमें सीट नहीं थी

और मैक्स मुरादाबाद के लिए सीटर बस ही चलती थी

जो सीट उनको मिली वो मिडिल की थी और पीछे कोई और सीट नहीं थी हाँ आगे सीट थी. पीछे स्लीपर लगा था और ऊपर तो थी ही स्लीपर।

विंडो पर भी पर्दे थे और बस की गैलरी में भी पर्दे थे अगर कोई उन्हें खींचता तो एक तरह से छोटी केबिन का रूप ले लेते।

टिकट कन्फर्म होने के बाद बस के पैसेंजर्स ने अपनी-अपनी जगह ले ली

और बस अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चुकी थी

तबस्सुम ने अपना नकाब उतार लिया और अपने बच्चे को मिल्क फीडर से पिलाकर अपने गोद में आराम से सुला दिया

और थोड़ा कंबल से बच्चे को ढककर ईजी चेयर के तौर पर सीट पीछे करके आँखें बंद कर ली बस तबस्सुम ने फॉर्मली बात करी थी

12 बजे आराम से दोनों माँ-बेटा सो रहे थे इसी वक्त शंकर को शराब की तलब लगी और वो बस सोती हुई प्यारी सी तबस्सुम के चेहरे को देखा. तो आज कुछ ज़्यादा ही उसने तबस्सुम को निहारते हुए देखने लगा। लाइट बंद थी लेकिन फिर भी तबस्सुम का चेहरा चमक रहा था

कुछ देर के लिए शंकर की शराब की हुड़क भी ऐसे मासूम गुलाबी चेहरे को देखकर कम हो गई

1 बजे बस किसी ढाबे पर रुकी फ्रेश होने के लिए तब चुपचाप शंकर उतरकर अपनी जुगाड़ का सामान ढूँढने लगा। तब एक वहाँ के काम करने वाले लड़के से पूछा तो उसने बताया कि सामने वाले रोड की साइड दारू मिल जाएगी

ये सुनकर शंकर मानो बहुत खुश हो गया और उस दुकान पर रोड क्रॉस करके बादशाह नाम की अड्डी ली और बिना चखे के वो बोतल गटक गया

वो बस के ढाबे की तरफ आया और शराब ने भी सुरूर पैदा करना शुरू कर दिया था

तब उसने वहीं एक शॉप से सुपारी ली और कुछ लगातार 5 पुड़िया सुपारी के खा गया

पर देसी बदबू कहाँ जाती है उसने तब अपने मुँह पर अंगोछा लपेटकर बस में फ्रेश होकर आ गया

बस फिर से कुछ देर बाद चल दी तब कुछ 15 मिनट बाद तबस्सुम को लू लगने लगी, उसे टॉयलेट की हajat होने लगी पर ज़्यादा नहीं

और उसका बच्चा भी उठ बैठा। उसको अब फीडर का टाइम था

तो अपने बगल से तबस्सुम ने एक फीडर निकाली और वो गरम पानी भी वहीं पास में रखे बैग से निकाला

पर नसीब खराब, तबस्सुम ने फीडर में तो मिल्क रख लिया था पर वो जार घर पर ही भूल आई

वैसे तबस्सुम बहुत कम फीडर देती थी, ज़्यादातर अपना दूध ही पिलाती थी।

और इस वक्त तो तबस्सुम की दोनों मिल्क की 2 बड़ी टंकी फुल थीं और उसमें जब अपने टाइम पर वो फीड नहीं करा पाती तो अपने आप थोड़ा दूध चुची छोड़ देती इस वक्त उसे ऐसा लग रहा था

और ज़्यादा दूध होने की वजह से कुछ दर्द भी बढ़ने लगा जो अकसर जिन औरतों के दूध ज़रूरत से ज़्यादा आते हैं और वो अपने बच्चे को फीड नहीं करा पातीं तो दर्द लाज़िमी होने लगता है. और कहीं-कहीं ये दर्द बरदाश्त के बाहर भी हो जाता है

तबस्सुम की बगल में खर्राटे भरते हुए शंकर को देखा जो अपने मुँह पर अंगोछा बाँधकर बेखबर सो रहा था

बच्चा भी रोने लगा तो तबस्सुम ने अपने बुर्के के बटन तो खोल दिए पर अपने चुची को भी तो कुर्ती में से निकालना था

बच्चा ज़्यादा ज़ोर से रोता तो सबकी नींद खराब होती. तब तबस्सुम ने थोड़ा शर्म के लहजे से एक बार और सोते हुए शंकर की तरफ देखा और थोड़ा ऊपर उठकर अपने तशरीफ के नीचे से बुर्का निकाला और कंबल साइड से रखकर बच्चे के नीचे से वो शंकर की तरफ के साइड से बूब्स निकालने के लिए अपने ब्रा को भी उठाया

पर सच में अगर वो पानी का जार भी लाती तो ये दूध अपने सीने का ज़रूर पिलाती। उसके राइट साइड वाले दूध में ज़्यादा दर्द हो रहा था और दूध भी ज़्यादा निकल रहा था जिससे उसकी ब्रा भी गीली हो गई थी

वो राइट साइड वाला पोर्शन शंकर की तरफ था

उसने जल्दी से अपना एक बूब्स निकाला और अपने बेटे के मुँह में दे दिया पर जब कंबल उसने अपने बच्चे के ऊपर दूध छुपाने के लिए जिससे कोई भी अंग ना देखे तो कंबल डाला पर उसका बेटा कुँकुँने लगा तो वो कंबल उसके चेहरे से हटा दिया और अपना चेहरा पर सुकून लेते हुए विंडो का हल्के से पर्दा हटाकर रात के अँधेरे में खोने लगी

अब मेरे प्यारे दोस्तों, लेडीज ना जेंटलमैन, यहाँ तक आपको स्टोरी कैसी लगी बताइए

और इसका मैं ज़्यादा लंबे अपडेट नहीं दूँगा और ना ही ये भी कि आगे क्या पता। भाषा की मर्यादा रखते हुए कहानी बढ़ाऊँगा पर अगर इसमें इंटरफैथ का टच ना मिले तो कहानी बनाने में मजा भी नहीं आएगा पर भाषा का ख्याल रखूँगा

देखते हैं आज क्या रिस्पॉन्स मिलता है।

तबस्सुम कुछ देर में राहत महसूस करने लगी। बूब्स का मिल्क अब बच्चा पीने से तबस्सुम को अच्छा लगने लगा। उसका दर्द भी कम होने लगा

पर उसे थोड़ा शर्म भी आ रही थी कि उसके बगल में शंकर सो रहा था. पर वो क्या करती, मजबूरी भी थी

तभी 10 मिनट बाद तबस्सुम को नींद की झपकी लगी और बच्चा दूध पीने में लगा हुआ था

तभी तबस्सुम को लगा कि उसके साइड चुची पर कुछ उँगलियाँ चल रही हैं

पर वो समझी कि उसका बेटा ही लगा रहा होगा

पर जब उन उँगलियों का दबाव महसूस हुआ तो उसकी आँख खुल गई

पर उसकी हिम्मत ऐसी नहीं हो रही थी कि वो अपना सिर घुमाकर देखे

उसके अंदर एक खौफ तारी होने लगा। उसे लगा ये हरकत शंकर की है

क्योंकि उँगलियों के दबाव से ऐसा लगने लगा कि ये मेरे बच्चे की नहीं है

शंकर हमेशा तबस्सुम से बड़ी इज्जत से बात करता था. उसके मिजाज से ज़ाहिर नहीं होता था कि वो उसके लिए बुरी नीयत रखता हो

यहाँ तबस्सुम को एक परेशानी ये भी थी अगर वो मुजाहिमत करती तो बस के पैसेंजर्स को पता चल जाता. और सब जान जाते कि वो उसका नौकर है

मारते-पीटते तो अलग. पर फिर वो ना शंकर को बचा पाती ना अपनी इज्जत

और ये सोचकर अपना हाथ शंकर के हाथ पर रखकर हटाया. तो शंकर ने भी अपना हाथ हटा लिया

तबस्सुम ने सोचा शायद नींद की वजह से ऐसी हरकत हो गई

तब तबस्सुम ने अपना चेहरा उसकी तरफ किया. तो शराब की बदबू से उसका दिल मचल गया. क्योंकि शंकर के मुँह से अंगोछा हट गया था और उसकी साँसें तबस्सुम के चेहरे से टकराईं और उसका मुँह भी तबस्सुम की तरफ ही था।

तबस्सुम (मन में): ओह खुदा ये शराब पीकर कब आ गया. जितना मैं जानती हूँ ये शराब नहीं पीता लेकिन कब ये शराब पीकर आया? रास्ते भर तो मेरे साथ ही रहा पर ये कब इसने ऐसा कर दिया

तभी उसके बेटे ने अपना मुँह निप्पल से हटाया

तो बच्चे को सही से गोद में लिटाकर अपना ब्रा नीचे करना चाहा

तभी कुछ ऐसा हुआ कि तबस्सुम के मुँह से चीख निकलते रह गई

तबस्सुम के 34D की चुची पूरे हाथ में पकड़कर शंकर ने दबा दी

तबस्सुम अपना हाथ से उसके मजबूत हाथ से अपनी चुची छुड़ाने की कोशिश करने लगी पर जितना वो छुड़ाती उतने ही शंकर उसकी चुची के मुलायमपन को अपने मुट्ठी में भींचता

तबस्सुम को दर्द के साथ उसके आँसू निकल आए। आज तक किसी ने उसके शौहर के अलावा किसी गैर मर्द ने बुर्के के ऊपर से भी टच नहीं किया

शंकर चुची दबाने से उसके हाथ में भी अच्छा-खासा दूध आ गया

तभी शंकर ने अपनी एक उँगली अंगूठे से तबस्सुम का निप्पल पकड़कर दबा दिया जिससे एक धार निकली

तबस्सुम बड़ी मुश्किल से अपनी फिर से चीख दबा पाई और कसमते बिलखते हुए शंकर से बोली,

तबस्सुम: आप अपने होश में नहीं हैं। आप क्या कर रहे हैं? प्लीज खुदा के वास्ते अपना हाथ हटाओ प्लीज। बहुत दर्द हो रहा है आपके हाथ जोड़ती हूँ कम से कम मेरे बच्चे का ख्याल रखो आप होश में नहीं हैं प्लीज

पर शंकर को उसकी बात का कोई असर नहीं हुआ वो उस चुची को दबाता रहा यहाँ तक कि उसकी चुची पूरी लाल हो गई। उसके हाथ के निशान बहुत ही गोरी चुची पर छाप गए

तबस्सुम अब तक यकीन नहीं कर पा रही थी कि वो आज किस मुसीबत में फँस गई

तब शंकर ने दिल भरकर मुलायम चुची को दबाता रहा और काफी दूध भी बाहर आ गया

शंकर ने अपना सिर आँखें बंद करके तबस्सुम के चुची की तरफ लाया

अब तबस्सुम में मारे खौफ के उसका पेशाब जैसे निकलने को होने लगा। एक हाथ से वो बच्चे का सिर पकड़े हुए थी और दूसरे हाथ से शंकर के सिर को अपने दूर से हटाने की नाकामयाब कोशिश करने लगी

बच्चा गोद में होने की वजह से वो ज़्यादा मुजाहिमत नहीं कर पा रही थी बस रोते हुए शंकर से दर्याफ्त कर रही थी

तब शंकर ने जैसे ही चुची से हाथ हटाया तो अब अपना निप्पल के ऊपर मुँह लगाकर बड़ी शिद्दत से चूसने लगा

जिससे रोते-रोते एक सिसकारी भी निकल गई तबस्सुम की

क्योंकि बस में थे और ज़्यादा अपनी जुबान को चला नहीं सकते थे वरना तबस्सुम की इज्जत का कबाड़ा हो जाता

बस वो अपने हाथ से उसका सिर हटाने की कोशिश करने लगी और खुदा से दुआ माँगने लगी कि वो इस मुसीबत से निकाल दे

शंकर का अब एक हाथ कंबल को हटाकर तबस्सुम की जाँघ पर चला गया

पर बच्चा गोद में होने से वो उसका हाथ नहीं हटा सकती थी बस अपने आप में सिकुड़ने की कोशिश होने लगी

शंकर अपने हाथ से जाँघ सहलाने लगा

पर बच्चे की वजह से तबस्सुम की चूत पर ले जाने में दिक्कत होने लगी

आगे क्या हुआ, पढ़िए अगले पार्ट में।

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