लॉकडाउन और तबस्सुम 5

तबस्सुम किचन में थी और वो एक बड़ी प्लेट में खाना रखने लगी। कुछ 4 रोटी एक प्लेट में, सब्ज़ी जो पालक पनीर की थी…पर एक खौफ जो तारी हो रहा था जिससे उसका जिस्म पसीने में भीगने लगा। जिससे उसका बुर्खा और ज़्यादा जिस्म से चिपक गया। अब साफ गोल-गोल बूब्स नज़र आ रहे थे और जो निप्पल थे उनका खड़ा शेप ज़ालिमाना अंदाज़ में दिख रहा था…

अगर आपने इस कहानी के पिछले पार्ट नहीं पढे तो यहाँ पढ़ें ==> लॉकडाउन और तबस्सुम 4

अपनी ये हालत देख तबस्सुम के अंदर शर्म के मारे मरने को दिल करने लगा… वहीं एक बड़ा चाकू रखा था… सोचा इसे उठाकर ले जाऊँ और एक वार में उसकी गर्दन काट दूँ…

पर जो सोचा जाता है वैसा होता तो नहीं… पर एक चीज़ तबस्सुम को ये परेशान कर रही थी कि उसकी चुत का रिसाव क्यों कम नहीं हो रहा और अजीब तरह की खुजली हो रही थी जैसे कोई मोटी चीज़ अंदर जाए और उसकी चुत को ऐसा रगड़े कि खुजली खत्म हो जाए…

ये अंदर एक औरत की सोच थी पर तबस्सुम के दिल में शंकर के लिए नफ़रत थी… और अपनी बेबसी पर आँसू बहा रही थी…

तब एक बात और… शंकर की मानकर गरम पानी से वहीं बच्चे के लिए फीडर तैयार की… और उसने अपना दूध किसके लिए बचाकर रखा वो ये जानती ही थी…

पहले खाना लेकर बाहर आई बहुत ही धीरे-धीरे से जिससे उसके बूब्स उछले नहीं… पर बूब्स का पूरा नक्शा वो कैसे छुपाती…

शंकर ने आते हुए देखा तो अपने पीले दाँत दिखाकर जो बीड़ी पी रहा था वो फेंककर डाइनिंग टेबल पर ऐसे ही नंगा उठकर चला… यहाँ उसका लंड ढीला पड़ गया था… पर जब वो उठकर अपने लंड को मसलकर डाइनिंग की तरफ गया तो उसने कुछ सेकंड के लिए अपना लंड छोड़ दिया…

जिससे उसका लंड हिलता हुआ उसके साथ ही आगे बढ़ा… ये चीज़ तबस्सुम ने देखी तो उसके हिलते लंड को देखकर दिल धड़क सा गया…

तबस्सुम ने कुछ दूरी का फ़ासला बनाकर खाना सर्व कर दिया…

और उसने बिना कुछ कहे खाना खाना शुरू कर दिया।

तबस्सुम: छी… कम से कम अपने हाथ तो धो लेते।

ये बात उसके मुँह से ऐसे ही निकल गई… क्योंकि तबस्सुम साफ़-सफ़ाई का बहुत ख्याल रखती थी घर का भी और अपने जिस्म का भी।

वो न तो झाँटों को बढ़ने देती न अपने आर्मपिट के बालों को। हमेशा 2 या 3 दिन में हेयर रिमूवर से साफ़ करती रहती।

शंकर: हाहाहा… अरे मेरी बीवीजी ये भी तो अपने शरीर का हिस्सा है… अरे जब मैंने तेरी पैंटी चाटकर साफ़ की तो तुम्हें वहाँ कोई गंदगी न लगी…

अरे ज़रा थोड़े पीछे होना… वहाँ… वाह्ह्ह क्या कमाल की… ह्म्म… तुम्हारी चूची देख रही हूँ… ह्म्म… मर गया मैं तो… ये तेरे निप्पल कितने खड़े दिख रहे हैं… ह्म्म… तो क्या चीज़ है तुझे भी न मालूम… मुर्दे भी तुझे देखकर खड़े हो जाएँ… ह्म्म…

उसकी बात सुनकर शर्म से वो भागती हुई किचन की तरफ दौड़ी जिससे पीछे से उसके हिप्स… ओह्ह्ह कितने जानवराना तरीके से हिलते हुए नज़र आ रहे थे…

10 मिनट किचन में रही जब तक शंकर की आवाज़ न आती… और वो सोच-सोचकर बस खुदा को याद कर रही थी कि कैसे भी कोई फरिश्ता आ जाए और उसे यहाँ से महफ़ूज़ निकाल दे… पर उसे क्या पता कि उसका शौहर और उसका दोस्त अब अपने रूम में एक लो क्लास औरत को लाकर चोद रहे थे…

और यहाँ एक लो क्लास आदमी एक हाई सोसाइटी की पढ़ी-लिखी शरीफ़ाना ईमानदार औरत को अपने जाल में फँसा रहा था…

शंकर: अरे खाना खा लिया… ज़रा बोतल में पानी तो लेके आओ…

ये आवाज़ सुनकर तबस्सुम अपनी सोच से बाहर आई…

और एक ग्लास और पानी की बोतल लेकर फिर से नज़ाकत अंदाज़ में बाहर आई और वहीं पानी उसके पास रखकर फिर से किचन में जाने लगी…

शंकर: अरे रुको… पानी पीकर मैं अब तेरे दूध की चाय पीनी है… तुम वहाँ मेरे सामने सोफ़े पर बैठो…

ये सुनकर न जाने क्या हुआ… कि उसकी बात बड़े आराम से मानकर वो वहीं उसके सामने सोफ़े पर बैठ गई…

और अपने आप को जितना छुपाना था छुपाकर सहमकर बैठ गई… यहाँ इतना कुछ होने के बाद वो शंकर की बात मान रही थी पर थोड़े नखरे से जो एक पतिव्रता औरत के होते ही हैं…

शंकर एक ग्लास पानी पिया और खाने की बड़ी तारीफ़ करते हुए दूसरे ग्लास में पानी डाला और वो आधा पीकर ग्लास लेकर उठा…

और ऐसे ही अपना नंगा लंड हिलाता हुआ आगे बढ़कर उसके पास आया। अभी तक तबस्सुम नक़ाब लगाए हुए थी…

शंकर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो डरी-सहमी तबस्सुम ने अपना चेहरा उसके सामने से हटाने की कोशिश की…

शंकर: अरे मैं तुझे टच नहीं कर रहा… तेरा नक़ाब हटा रहा हूँ… ये कहते हुए शंकर ने उसका नक़ाब ठुड्डी से नीचे सरका दिया… पर पूरा उतारा नहीं…

नाज़ के होठ काँप रहे थे और उसकी आँखें नीचे झुकी हुई थीं। शंकर का लंड कुछ ही इंच दूर था… जिससे मनी प्रीक्यूम की महक जो सीधा तबस्सुम की ज़हन में जाकर उसके अंदर की एक अनसैटिस्फ़ाइड औरत को उत्तेजित कर रही थी…

लेकिन इस टाइम उसके आँखों से आँसू नहीं आ रहे थे… क्योंकि पूरे दिन जब से वो अंबाला से आई थी तब से मुस्तक़िल रो रही थी… और उसके आँसू भी सूख गए थे…

शंकर: लो पानी पियो…

तबस्सुम: नहीं मुझे नहीं पीना… है…

शंकर: तो मेरा लंड का पानी पीना है… पियो इसे…

ये अल्फ़ाज़ थोड़ा ज़ोर से बोला तो घबराकर उसने झूठा पानी का ग्लास हाथ में ले लिया…

शंकर: अरे जब मैं तेरे होठ चूस सकता हूँ, तेरे मुँह में ज़बान डाल सकता हूँ तो मेरे झूठे पानी पीने में इतने नखरे क्यों? पियो जल्दी…

तबस्सुम घबरा गई… और वो पानी एक झटके में पी गई…

ग्लास वहीं उसके हाथ में ही रखा था…

शंकर: अब चाय पीने का मन है… तो ज़रा अपने दूध की चाय बना दो…

तबस्सुम: आप मुझे इतना ज़लील क्यों कर रहे हैं? आप जैसा कह रहे हैं मैं कर रही हूँ पर अब नहीं सहन होता मुझसे… मुझे माफ़ कर दो… आपको खुदा का वास्ता अब मेरे साथ कोई बदतमीज़ी नहीं करो…

ये सुनकर शंकर गुस्से में आ गया और गुस्से में उसके मुँह से गाली कुछ निकल गई पर उसने तबस्सुम को छुआ नहीं।

शंकर: देख मैं तुझसे क्या चाहता हूँ… बस जो मैं कई सालों से ऐसा सोचता हूँ तो ये मौका मिला तो तेरे अम्मा क्यों चुद रही है… मुझे गुस्सा न दिला और जैसा कहता हूँ कर… फिर ना कहना मैंने तेरे साथ कुछ गलत किया…

समझी ना तू… मैं तुझसे ही बात कर रहा हूँ और तेरे आँसुओं से मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता… ये कहकर उसके हाथ से ग्लास लिया… और उसकी इस तरह से गुस्से में बातें सुनकर तबस्सुम डर गई…

वो उठकर किचन में जाने लगी तो उसका हाथ पकड़कर बैठा दिया और चेहरे से पूरा नक़ाब हटा दिया…

शंकर: कहाँ जा रही हो… मेरी बात समझ नहीं आई क्या?

तबस्सुम: वो… वो… मैं… वो आपको… वो चाय बनाने जा रही हूँ…

शंकर: इतना डरकर ना बोल और मेरी जितनी भी बात मानेगी उतना तेरे लिए अच्छा होगा समझी ना… तुझे नहीं पता तू कितनी खूबसूरत है… अरे तेरे जैसी औरत किसी को मिले तो उसका स्वर्ग यहीं बन जाए… उसे कोई भी चीज़ ऊपरवाले से माँगने की ज़रूरत नहीं पड़े… मुझे माफ़ कर दो… तुमने मुझे गुस्सा दिलाया… मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी जैसी हसीन औरत को डाँटू… पर तुम मेरी बात नहीं मानी तो मैं क्या करूँ…

उसकी बात सुनकर तबस्सुम थोड़ा रिलैक्स हो गई… पर ये रिलैक्स ज़्यादा देर का नहीं था…

उसका पूरा बदन भीग रहा था जिससे और उसकी चूचियाँ क्लियर दिखने लगीं… तब शंकर ने कहा…

शंकर: तुम्हें मुझसे शर्म आ रही है?

तबस्सुम ने हाँ में सिर हिलाया… और तब शंकर ने उसे खड़ा होने को कहा तो तबस्सुम खड़ी हो गई… और उसका नक़ाब देते हुए कहा— पहले अपने आँखों से आँसू पोछो…

लो जल्दी से पोछो और आज के बाद आँसू नहीं निकालोगी समझी…

ये सुनकर नक़ाब लेते हुए आँसू पोछे और हाँ में सिर हिलाया…

शंकर: लो फिर से इसे पहन लो इस नक़ाब को… शायद तुम्हें कुछ डर कम लगे…

ये सुनकर फिर से नक़ाब पहन लिया क्योंकि शंकर उसके चेहरे से अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि उसके दिल में क्या चल रहा है…

तब शंकर ने उसके बूब्स पर देखा तो पूरा क्लियर पसीने की वजह से दिख रहे थे और बुर्खा हल्का शाहीन का था तो कपड़े पहनने के बाद भी अंदर के कपड़े दिखते थे… तो उसका जिस्म पसीने की वजह से साफ़ चमक रहा था…

शंकर: ओह्ह्ह भगवान… मार डाला तूने… एक बार और मुझे… ह्म्म… क्या नज़ारा दिख रहा है तेरी चूचियाँ… आह्ह्ह… कितनी टाइट हैं बिना ब्रा के… कितनी गोल हैं… ओह्ह्ह कितनी साफ़ दिख रही हैं… ह्म्म कितने खड़े निप्पल हैं तेरे…

और तेरी आँखें… ह्म्म कितना कुछ छुपा है इनमें… जो अपने शौहर से खुश न रह पाई और आज भी इतना तुझे खोलने की कोशिश करता रहा पर तूने अपनी इज़्ज़त का हवाला देके मुझे रोके रखा… ओह्ह्ह तुझे मैं दिल से सलाम करता हूँ…

तेरी ये पाकीज़गी… इतना कुछ करने के बाद भी तूने अपनी हया-शर्म से अपने को बचाया… पर जो मेरे दिल में है वो सब करूँगा… अब तू एक काम कर… तू चाहती है ना तेरे बच्चे को कोई आँच न आए… मैं वादा करता हूँ तेरे बच्चे को मैं तेरी कमज़ोरी नहीं बना सकता और मैं भी नहीं चाहता कि तुम अपने बच्चे के खातिर ये सब सहती रहो… मुझे ये भी पता है इतनी देर मुझे नंगा देखकर तुम्हारे दिल में क्या चल रहा है…

ये कुछ नहीं जानता पर जैसे तुम्हारे ये निप्पल तने हैं और तुम्हारी पैंटी मेरी बात सुनकर या मुझे नंगा होकर गीली हुई थी… उससे यही लगा कि मुझे कि तुम अपने दिल की ख्वाहिश जो अल्ताफ़ से पूरी नहीं हुई तुम वो ख्वाहिश ऐसा नहीं मुझसे या किसी और से मिटाना चाहती हो… तुम ये ख्वाहिश अपने पति से ही मिटाना चाहती हो…

पर ये तेरे नसीब में नहीं है… तुझे कोई देसी मज़बूत आदमी मिलना चाहिए जो तुझे भरकर पेले… मैं अपने को उस लिस्ट में नहीं समझता… पर तेरे ख्यालों में इतना तो मुझे मालूम है जैसे बस में झड़ी थी तू ऐसा बार-बार झड़ना चाहती है मुझसे नहीं बल्कि अपने शौहर से ही और तेरे ख्याल में अब मेरा लंड रहता है… जैसे तू मेरे लंड को देखती है इससे साफ़ मालूम है कि तू इसे छूकर देखना चाहती है… पर तेरी पाकीज़गी इसकी इजाज़त नहीं देती…

तुम उस पाकीज़गी औरत में से हो जो अपनी ख्वाहिश दबाकर अपनी ज़िंदगी एक टेंशन से गुज़ार देती हो… बाहर तो तुम सबके सामने खुश रहती हो पर अंदर तुम्हारा दिल शमशान सा है… जिसमें सिर्फ काला धुआँ है… उसमें कभी गुलाबों के फूलों की खेती नहीं हो सकती…

तबस्सुम अपनी नज़र झुकाकर एक-एक बात गौर से सुनती रही…

शंकर: मैं जानता हूँ मैं एक इंसान हूँ और तुम मज़हबी औरत हो… जिसका मिलन इस जन्म में खुलकर किसी के सामने नहीं हो सकता जितना तुम दुनिया से डरकर अपने दिल का राज़ नहीं बता पाती…

और मैं तुम्हारे घर का लोअर क्लास नौकर भी हूँ… और तुम्हारे मिज़ाज का भी नहीं हूँ इसलिए…

मुझे अब भी समझ नहीं आता कि तुम ऐसे अपनी लाइफ कैसे गुज़ारोगी… पर जाने दो इस बात को…

अब मुझे तुम्हारी दूध की चाय पीनी है… और तुम अब बिना कोई नखरे के पिलाओगी… तुम्हें मैंने चोदा है, तुम्हारे नंगे दूध देखे हैं, तुम्हारे होठों का रस पिया है, तुम्हारी चूचियों पर अपना वीर्य निकाला है… तुमने एक पल उस चुदाई का आनंद लिया है…

अब उस आनंद के खातिर तुम मुझे मेरे ही सामने अपने दूध बुर्खे में से दिखाओ… मैं वादा करता हूँ तुम्हारी इजाज़त के बग़ैर तुम्हें टच तक नहीं करूँगा… अगर मेरी एक-एक बात मानती रही तो… बाकी तुम खुद समझदार हो…

ये कहकर ग्लास फिर से उठाता है… और कहता है— चलो आगे का बुर्खा खोलकर दोनों चूचियाँ मुझे दिखाओ और उसमें से अपना दूध से मेरा ग्लास भर दो…

तबस्सुम: खुदा के लिए अब इतना ज़ुल्म न करो… मुझे नहीं हो पाएगा…

पर यहाँ तबस्सुम के दिल में उसकी बातें सुनकर कुछ क्या बहुत कुछ हुआ… वो काफ़ी रातों को अपने पति होने के बावजूद तड़पती रही…

और जो एक-एक बात शंकर ने कही वो सब सौ प्रतिशत सच था… पर ऐसे कैसे वो सिर्फ उसकी बात जो सच होते हुए भी अपने को नंगा कर दे…

जब तबस्सुम उससे इस तरह भीख से माँगने लगी तो शंकर ने अपनी लाल आँखें दिखाकर आगे बढ़ा…

तबस्सुम: रुको रुको… मैं करती हूँ… मेरे पास न आना प्लीज़… मैं अपना दूध से चाय बनाकर लाती हूँ और आपके सामने मैं ये मिल्क निकालती हूँ… आप दूर रहें…

ये सुनकर शंकर हँसता है… और तबस्सुम अपने सिर नीचे करके कुछ लम्हा खड़ी होकर अपने अंदर हिम्मत लाती है…

और आगे के एक-एक बटन खोलने लगती है…

शंकर: मेरी आँखों में देखो और अपने बटन खोलो… अपनी नज़र एक सेकंड के लिए भी नहीं झुकना समझी?

तबस्सुम हाँ में सिर हिलाती है… अपने नक़ाब में सेक्सी आँखों से शंकर को देखकर आगे का बुर्खा खोल देती है तो उसके बहुत ही गोल तने हुए शानदार चूचियों का नज़ारा अब शंकर के सामने आखिर आ ही जाता है…

शंकर: तू चीज़ क्या है… ऐसे बच्चा होने के बाद भी… आह्ह्ह इतने गोल… ज़रा से भी बिना लटकते… ह्म्म… क्या चूचियाँ हैं… ऐसी चूचियाँ कभी किसी की नहीं हो सकतीं… ओह्ह्ह दुनिया का मैं सबसे खुशनसीब इंसान हूँ… ऐसी चूचियों वाली औरत के वो तेरा चुतिया पति कभी अपने मुँह से पिता नहीं… ह्म्म कितनी बेबस है तू जो ऊपरवाले ने इतना क़ातिलाना हुस्न देके उसे ऐसे ही बिना खेती के छोड़ दिया… देख मेरी तरफ और तू खुद सोच अगर मेरी जगह कोई होता तो तुझे छोड़ देता ऐसे ही? बता…

शंकर की बात सुनकर फिर से अपनी नज़र शर्माकर नीचे की और ना में सिर हिलाया…

तब उसकी तरफ ग्लास बढ़ाया दूध के लिए…

शंकर: मैं तेरे साथ चाय पीना चाहता हूँ और तू भी अपने दूध की चाय पीकर देख… इतना ताज़ा दूध मुझे इस दुनिया में नहीं मिल सकता…

ले ग्लास और अब मेरे सामने अपनी चूची से जितना हो सके दूध निकाल…

More Stories

One Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *