एक घर के अजीब रीति रिवाज 2
Family me chudai ki desi hindi kahani:- तो ये सुनते ही मेरे शरीर में खुशी की लहर दौड़ रही थी…ऐसा लग रहा था जैसे इस गर्मी में किसी को ठंडक मिल गई हो।
कुछ देर मैंने सारे घटनाओं को कारणक रूप से समझा, याद किया, मिश्री की तरह स्वाद लिया। फिर दोबारा पूछा…
इस कहानी का पिछला पार्ट अगर आपने नहीं पढ़ा तो पहले वो पढ़ लें ==> एक घर के अजीब रीति रिवाज 1
मैं: सही में पापा?
पापा: हाँ सही में।
चाचा: हाँ इसलिए तो कल तेरा ज्यादा सामान-कपड़े खरीदवाया हूँ…
तो चल अब कॉलेज जाकर तेरा एसएलसी, और क्या-क्या काम हैं करवा आते हैं। और ये बोलते हुए चाचा ने बाइक की चाबी मेरे तरफ फेंकी।
चलानी तो आती है ना बरखुरदार? चाचा ने मजाकिया लहजे में पूछा…
मैं: हाँ हाँ बिल्कुल। फिर मैं बाइक पे चाचा को लेकर कॉलेज की तरफ निकल गया…
कॉलेज में सारे काम करवाए और न्यू कॉलेज का भी फॉर्म भर दिया…
कुछ मार्कशीट वगैरह जब आएँगे तो कॉलेज वाले डायरेक्ट कॉलेज भिजवा देने को चाचा ने उनसे बात किया ताकि हमको फिर आने का झंझट न हो और कुछ पैसे भी थमा दिए।
जिस पर उन्होंने कहा हाँ हम खुद ही इसका दाखिला उस कॉलेज में करवा देंगे आप जैसा चाहो…
ये सारा काम निपटाकर हम लोग मार्केट चले गए। वहाँ से मैंने फिर से सबके लिए गिफ्ट लिए, सब पैक करवाए। ये सब कामों में आज का दिन कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। और शाम को जब वापस हॉस्टल पहुँचा तो पापा ने मुझे एक सिम दिया फोन के लिए और उसमें अच्छा-खासा रिचार्ज कराया हुआ था… और फिर मुझे पैकिंग करने की हिदायत दी…
मैं जल्दी-जल्दी अपने कपड़े-सामान बाँधने लगा और धीरे-धीरे गाँव को याद करने लगा। सब कैसे होंगे, सबसे मिलूँगा तो ये कहूँगा वो कहूँगा… हजार बातें, हजार चीजें थीं…
यहीं सोच में डूबा अपना सारा सामान बाँध लिया… एक बैग में मेरे सारे कपड़े और एक बैग में सारे गिफ्ट वगैरह…
अब सोने का हुक्म हुआ… लेकिन बंदा मारे खुशी के सोए कैसे…
रात तो मेरी ख्वाबों में जागते हुए ही कट गई घर वापस जाने की…
इतने सालों बाद फाइनली वो सवेरा था जो खुशी लेकर चढ़ा जो मुझे गाँव वापस ले जाने का मौका दे रहा था…
इस सवेरे की काली रात से बेखबर मैं सुबह उठकर फिर अपने कसरत में लग गया। उसके बाद फिर वो बूटी खाने को गया तो वहाँ पापा दिखे।
पापा: बहुत बड़ा हो गया रे बेटा तू… घर सब अबसे तेरी जिम्मेदारी। तू अबसे सबको संभालेगा। मैं तो रिटायर ले रहा हूँ…
मैं: क्या पापा आप भी? अभी आपको बहुत खटना है रिटायरमेंट से पहले… समझे…
पापा: अच्छा बेटा।
मैं: हाँ पापा…
और फिर हम दोनों ही हँस दिए।
फिर मैं जड़ी-बूटी निकालकर दूध में घोलकर पीने लगा…
इस पर पापा ने कहा ये डेली खा रहे हो तो?
मैं: डेली खा रहा हूँ।
पापा: हाँ तुम्हारे नेक्स्ट जन्मदिन तक इसको खाते रहना। छोड़ना फिर उसके बाद और नहीं खाना…
मैं: ठीक पापा आप जैसा बोले…
और फिर कुछ देर में हम सब तैयार थे गाँव ब्रजपुर को निकलने को। लेकिन बाइक का मामला। मैं जिद पर बैठ गया। मैं कार से नहीं, बाइक से ही जाऊँगा अपना सामान अपने साथ लेकर।
आखिर खुद की बाइक चलाई ही कितनी थी और ये मौका मैं हाथ से जाने नहीं देना चाहता था।
सबने मना किया कार में चलने को कहा पर मेरी जिद के आगे हार मानना ही पड़ा और हिदायत दी कार के पीछे धीरे-धीरे चलूँगा तभी…
तो मैंने ये शर्त मान ली और मैं अपना बैग उठाकर चल दिया गाँव की ओर…
अपनी बाइक पे सुनहरे चमकते वादियों से होता हुआ गर्मी के दिनों में कार के पीछे-पीछे एक लंबा बहुत लंबा रास्ता तय करते हुए…
धीरे-धीरे हम आगे बढ़ते गए। मुझे धुंधली यादें ताजा होने लगीं…
शाम होते-होते हम गाँव के करीब आ गए थे। तभी एक छोटा पूल आया और जैसे ही कार उसपे चढ़ी उनके जस्ट पीछे मेरी गाड़ी थी…
अचानक ही…
हम गाँव के करीब आ पहुँचे थे। ये बात मेरी धुंधली यादें मुझको याद दिला रही थीं…
इस गाँव के मधुर संगीत हो चिड़िया गा रही थी। उससे ही मुझे पता चल रहा था कि गाँव, मेरा गाँव नजदीक है अब…
अब गाँव से कुछ कम दूर एक ब्रिज था। वहाँ जैसे ही कार चढ़ी अचानक ही एक धमाका हुआ…
ये एक बहुत जोरदार धमाका था। इससे पहले मैं कुछ समझ पाता धमाके से मैं भी एक ओर झस गिरा और फिर मेरे आँखों के सामने अँधेरा छा गया…
हाँ, किसी ने पूल पर बम लगा दिया था…
इस धमाके से मेरी लाइफ का सबसे बड़ा टर्निंग आता है…
मेरे आँखों के सामने अँधेरा छाने के बाद मेरा सर दुख रहा था और पूरा शरीर अचानक से कमजोर लगने लगा…
आँखें खोलने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी लेकिन पूरी एनर्जी जुटाकर मैंने आँखें खोलीं तो मुझे सामने एक प्यारी सी लड़की की धुंधली सी परछाई सी दिखी…
उसने मुझे जैसे ही आँखें झपकते देखा वो जोर से चिल्लाती हुई दौड़ी— मामी काकी भाई को होश आ गया…
तभी कुछ और लोग मेरे कमरे में आए। कुछ रोने लगे। एक ने आकर मुझे गले लगा लिया और कैसा है बोला।
मैं हल्की आवाज में बोला— हल्का सर दर्द दे रहा, कमजोरी सी लग रही, पानी थोड़ा…
मेरे इतना कहते ही कोई दौड़कर गई और पानी लेकर आई। मैंने थोड़ा पानी पिया तो मुझे अच्छा लगा…
मैं थोड़ा संभाला तो मुझे पापा और चाचा की याद आई…
शरीर में ताकत तो थी नहीं। उतने में ही बोला— पापा चाचा कहाँ हैं?
उस धुंधली परछाई ने मेरा सर जिसने अपनी गोद में लिया था उसने कहा— सब ठीक हैं तू आराम कर…
ये सुनकर पता नहीं मुझे सुकून से सोने लगा और आँख मूंद ली मैंने…
अब जब दोबारा नींद खुली तो देखा खिड़की से हल्की रोशनी आ रही। मुझे तेज प्यास लग रही थी। मैं उठा तो देखा कोई मेरे गोद में लिए हुए सोया हुआ था। ध्यान से देखा तो वो मुझे मेरी माँ जैसी लगी। मैं कुछ सेकंड को चौंका… क्या-क्या…
फिर मेरी नज़र सामने रखे एक आईने पे पड़ी। जब वहाँ सामने देखा तो मैं नहीं, कोई कमजोर सा लड़का था। शक्ल बुझी-सुझी हुई, सर पर एक बड़ा सा पट्टी बँधी थी…
और जब मेरी नज़र मेरी पटी पे पड़ी तो मुझे हल्का सा अंदेशा हुआ… और फिर वही सारा दृश्य मेरे आँखों के सामने घूम गया लेकिन मैंने मजबूती रखी। आगे पड़ा पानी की पूरी जग ही पी डाली। ऐसा लग रहा था जन्मों से प्यासा हूँ…
पानी पीकर थोड़ी राहत महसूस हुई। तब मैं मुड़ा तो मेरी माँ के शक्ल वाली औरत अपनी आँखें खोलती हुई महसूस हुई। उसने मुझे देखा तो दौड़ खड़ी हुई— तो ठीक है? खड़ा क्यों है?
क्या हुआ? इधर-उधर मुझे देखते हुए बड़े सहजता से देखते हुए…
मैं: मुझे बाथरूम जाना है।
इस पर उन्होंने बड़ी अजीब सी बात बोली— यहीं कर दे। मैं तेरे कपड़े बदल दूँगी। तू आराम कर बस…
इस पर मैंने कहा— मुझे बाथरूम लेके चलो नहीं तो मैं खुद चलूँ…
इस पर उसने कुछ सोचा और मुझे बाहर ले आई और फिर बाथरूम के गेट के पास मैं भी चलू क्या साथ में बोली…
मैं ना बोलकर चला गया। अंदर जाकर मैंने बाथरूम किया। ऐसा लग रहा जैसे कब से न किया हो। फिर 10 मिनट बाद बाहर आया। अब मुझे लगने लगी तेज भूख। मैं उस औरत को ही कहा— भूख लग रही। वो मुझे वापस उसी कमरे में ले गई। वहाँ थोड़ी देर में फ्रूट्स ले आई। मुझे काटकर दिए। मैं धीरे-धीरे खाने लगा और पेट भर खाने के बाद मैं फिर से नींद के आगोश में समाहित हो गया…
अब जब दोबारा मेरी नींद खुली तो अब शरीर में थोड़ी ताकत महसूस हुई और तब जाकर देखा तो सामने वो औरत जो मुझे मेरी माँ जैसी लग रही थी वो कोई और नहीं बल्कि मेरी माँ ही थी…
मैंने जोर से चिल्लाया— माँ तुम…
और उनको गले लगाकर रोने लगा। वो भी बिना कुछ कहे मुझे पूछकर ने लगीं…
अब जाकर कुछ तस्वीर साफ होने लगी थी…
घटना मुझे थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगी थी।
मैंने माँ से पूछा— ये सब क्या है? मैं यहाँ कैसे और पापा चाचा कहाँ हैं…
माँ एक पल को तो चुप रहीं। फिर बोलीं— अरे वो ठीक हैं। तुझको ही ज्यादा चोट लग गई थी तो तू तो उठ ही नहीं रहा था…
मैंने अपना दिल मजबूत किया और कहा— माँ झूठ बोलकर फायदा नहीं। सच बोलो मुझको।
तो माँ अचानक से फूट पड़ीं और मेरे गले लग बस आँसू बहाने लगीं और फिर बताया वो बात कि उस धमाके में दोनों नहीं बच पाए। सब कुछ रख हो गया और उस धमाके की चपेट में भी आ गया था और गाड़ी का कोई भारी हिस्सा मेरे सर पर लग गया था जिससे मैं भी बेहोश था और उठ ही नहीं रहा था…
मैं: मैं कितने दिन से बेहोश था?
माँ: आज 8वाँ दिन है…
मैं: 8 दिन? इतने दिन से?
धमाका किसने किया और क्यों? उस आदमी को तो मैं छोड़ूँगा नहीं।
माँ: वो एक नक्सल का लीडर था जो कि गाँव में बनने वाला टावर का सामान उधर से आने वाला था उसको उड़ाना चाहता था…
लेकिन तुम लोग आ गए और तब उसी पुलिया के पास था और धमाके में वो भी मर गया। उसके बाद सिक्योरिटी ऑफिसर इनवेस्टिगेशन हुई, आर्मी आई और सारे नक्सल को मार गिराई। उन्होंने ही तुमको हमारे तक पहुँचाया। हमें तो कुछ पता नहीं था…
और माँ फिर रोने लगीं…
मैं: अंदर से मैं भी हिल चुका था लेकिन मुझे पापा की बात याद आई— आप सबको मुझे संभालना है। और मैंने बोला— माँ मैं तो हूँ आपका बेटा। देखो ठीक हूँ, फिट हूँ। आप रोई मत…
माँ: ये आँसू तो ये हैं कि हम सब डर गए थे कि कहीं तुझको भी… लेकिन तू ठीक है। तुझे अब हम कहीं नजरों से दूर जाने नहीं देंगे। कुछ नहीं होने देंगे तुझे…
मैं: हाँ मुझे कुछ नहीं होगा माँ। चिंता मत करो। अब मैं आ गया हूँ…
माँ ने आँसू पोछे और कहा— कुछ खाएगा?
मैं हाँ बोलकर गेट की तरफ नजर दौड़ाई तो उधर एक बहुत ही खूबसूरत सी लड़की खड़ी मुझे देख रही थी एकटक…
मैंने उसको देखा— पूरी चमकती हुई दूध की रंगत और प्यारे छोटे आँख और होठ, कान…
पतली सी 28 कमर और उसके ऊपर 32 के बूब्स। उसकी पूरी कहर लग रही थी। मैं एक नजर देखा तो आँख रुक ही गई…
माँ ने मेरा ध्यान तोड़ते हुए कहा— ये तेरी चाची की छोटी बेटी हैं…
मैं चौंककर— क्या? ये सिद्धि हैं? नाक बहता रहता था वो मन में…
माँ: इसने तेरी देखभाल बहुत मेहनत से की है… तो इसका भी ऋणी है तू यानी कर्जदार…
मैं: हाँ जब मेरी आँख खुली तब भी यहीं थी शायद यहाँ…
माँ: हाँ यहीं थीं।
ये सब सुनकर वो धीरे से चलकर एंटर हुईं रूम में…
उसकी पायल की खनक गूँज रही थी जो पूरे इतने दर्द भरे माहौल में भी सुकून की लहर उत्पन्न कर रही थी…
पता नहीं वो खनक से बड़ी सुकून मिल रही थी…
सिद्धि: भाई ठीक हैं। मुझे कोई कर्ज नहीं चाहिए इनसे।
माँ: वो तुम लोग जानो-समझो। और वो उठकर चली गईं शायद बाथरूम वगैरह…
मैंने अच्छे से सिद्धि को नजर भर देखा फिर बोला…
मैं: तेरी तो ये नाक में उंगली डालने वाली बंदरिया इतनी खूबसूरत कब से हो गई।
सिद्धि: बंदर कहinke…
सिद्धि को मैं इतने साल बाद देख रहा था लेकिन वक्त का फलसफा देखो कितनी खुशियों से नहीं, दुख की घड़ी में मैं उससे मिल रहा था…
सिद्धि थोड़ी देर तो चुप से मुझे देखती रहीं और मैं उससे। फिर वो दौड़कर आकर मेरे गले लग गईं और रोना शुरू…
वो अनबन की बातें बड़बड़ाने लगीं…
भाई अब मैं आपको कभी भी आँखों से दूर नहीं होने दूँगी। आप अब हमेशा मेरे आँखों के सामने रहना होगा। आप पर आने वाली हर मुसीबत को मुझसे होकर पहले गुजरनी होगी। मैं वो किसी को भी आपको मेरे आप से जुदा नहीं होने दूँगी…
मैं उसको पूछकरता हुआ उसको चुप कराते-कराते मेरे भी आँखों से उतने देर से रुके हुए बाँध टूट पड़े और वो बहने लगे…
उन निमवान आँसुओं से भरे आँखों को उठाकर देखा तो वहाँ चाची… उनके भी आँखों से आँसू रुक रहे नहीं थे। जब उन्होंने देखा कि मैं भी रो रहा हूँ तो वो भी दौड़कर हम दोनों को गले लगा लिया…
रोते हुए आँखों से बोला— मेरा बेटा क्यों रो रहा है तू… तू तो अब हम सब की हिम्मत है। तुझे ही अब इस घर को संभालना है हम सब औरतों को और गाँव को…
तू ही रोने लगेगा तो कैसे होगा? मेरा शेर दिल पुततर है ना। बचपन में भी जब तू हॉस्टल गया था एक बूँद आँसू नहीं रोया था। आज क्यों रो रहा…
मेरा जो हाल और बुरा हो गया। उधर सिद्धि भी सिसक-सिसक कर रोने लगीं…
तो फिर कुछ देर मैंने आँखों का और दिल दर्द पूरा बहने दिया और फिर डिसाइड किया— नहीं मुझे हिम्मत दिखानी होगी। चाची ठीक कह रही हैं। मुझे ही अब सबको संभालना है…
मैं इस तरह से रोकर भी अब कुछ बदल तो सकता नहीं। और अपना दिल मजबूत किया और बोला…
हाँ चाची मैं हूँ आपका शेर बेटा। अब आ गया हूँ ना। अब कुछ भी हो जाए मैं आप लोगों का साया हूँ। मैं हूँ ना। आप लोगों को कुछ घबराने या सोचने की जरूरत नहीं। मैं आप सबको संभाल लूँगा…
चाची भी— हाँ बेटा मुझे यकीन है। और अपने आँसू पोछते हुए सिद्धि को अलग करते हुए— चल बेटा अब भाई को आराम की अभी जरूरत है…
सिद्धि जाना तो नहीं चाहती थीं लेकिन न चाहते हुए भी जाना पड़ा मेरे आराम करने वाले बात पर…
सिद्धि: मैं आती हूँ। अपने आँसू पोछते हुए।
मैं: हाँ।
आराम कीजिए और जल्दी से स्ट्रॉन्ग हो जाइए भैया। थोड़ी सी क्यूट से अंदाज में सिद्धि ने कहा…
जिसको सुन मेरे दिल पर मरहम लगा और एक हल्की-फुल्की सुकून वाली मुस्कान मेरे चेहरे पे आई…
फिर थोड़ी देर बाद अमृता दीदी दूध का एक ग्लास लेकर आईं। उनके आँखें भी सुरख लाल थीं लेकिन वो बड़ी बेटी होने का फर्ज निभाकर सबको संभाल रही थीं शायद।
उन्होंने मुझको एक झूठी मुस्कान दी और कहा—
मेरा बेटू तो पूरा मुस्तैदा बनकर आया है शहर से।
मैं: दीदी की ये झूठी कोशिश मुझसे देखी न गई।
मैं दौड़कर दीदी को गले लगा लिया…
मैं: दीदी आपको मेरे सामने स्ट्रॉन्ग बनने का एक्टिंग करने की कोई जरूरत नहीं…
मेरे इस बात पर दीदी भी फूट पड़ीं और फूट-फूट कर रोने लगीं…
दीदी: मैं थक गई बेटू (दीदी मुझे बेटू बचपन से बुलाती थीं) स्ट्रॉन्ग बन-बनकर। तू ठीक हो का? तू मेरा स्ट्रेंथ है। तू ठीक हो गया है अब मुझमें बहुत स्ट्रेंथ आ गई है बेटू। अब मैं सबको संभाल लूँगी। रोते हुए…
मैं: हाँ दीदी मैं बिल्कुल ठीक हूँ।
दीदी: बेटू तेरे लिए तो सब कुछ कुर्बान… और कुछ देर यूँ ही गले लगकर रोने के बाद
और आँसू पोछते हुए पीछे हुईं। इस बार उनके चेहरे पर वो बोझ नहीं दिख रहा था जो कुछ देर पहले था…
दीदी सामने से टेबल से दूध का ग्लास उठाते हुए— अब मेरा स्ट्रॉन्ग भाई को और स्ट्रॉन्ग बनने के लिए गरम दूध पी ले…
मैंने दूध की तरफ देखा। ग्लास लेते हुए और कहा— मेरी बूटी होती तो मिलाकर खा लेता। जिस पर दीदी बोलीं— वो इसी में है। तू पी ले…
मैं: इसमें कहाँ से?? लेकिन ज्यादा सवाल-जवाब नहीं किया और मैं पी लिया…
दीदी कुछ देर बैठी मुझे निहारती रहीं। फिर मेरे गले लगकर— थैंक यू बेटू मुझे हिम्मत देने के लिए। मुझे बहुत जरूरत थी। दूध का ग्लास लेकर चली गईं…
और मैं फिर से अपने बेड पर लेट आराम की नींद में सो गया…
जब मेरी नींद खुली तो मुझे फुसफुसाने की आवाज आ रही थी…
मैंने आँख खोली तो सामने…
मेरी फुसफुसाने की आवाज से आँख खुली तो सामने बड़ी बुआ और छोटी बुआ दोनों बैठी कुछ बात कर रही थीं। उनके साथ और दो लड़कियाँ थीं…
छोटी बुआ: उठ गया बेटा…
मैं आँख मलते हुए उठा— हाँ बुआ आप लोग…
बड़ी बुआ: हाँ बेटा हम तो यहीं हैं। बस तेरी चोट की वजह से कम लोग ही तुझसे मिलने आ रहे और कुछ तो डर के प्रार्थना में ही लगे हैं तेरी सलामती के लिए।
सब तुझसे बहुत प्यार करते बेटा।
छोटी बुआ: हाँ बेटा तू कैसा है? अब कैसा लग रहा?
मैं: पहले से बहुत बेहतर हूँ बुआ। अब थोड़ा सा एनर्जी भी लगने लगी है शरीर में। धीरे-धीरे अच्छा लग रहा है…
बड़ी बुआ: लाख-लाख शुक्र है तू ठीक। बेटा नहीं तो हम सब का क्या होता…
मैं: कुछ नहीं होता बुआ। मैं हूँ ना। और उन दोनों को भी गले लगाकर आश्वासन देने लगा। वहीं रोना-धोना चालू… इसी बीच मैंने देखा कि वो दोनों लड़कियाँ बड़ी जानी-पहचानी सी लग रही थीं लेकिन याद नहीं आ रही थीं। वो भी चुपचाप मुझे देखते हुए आँसू के मोती अपने सुंदर गुलाबी गालों से बहाती जा रही थीं…
थोड़ी देर में जब मैं लग हुआ तो… बुआ लोगों ने अपने आँसू पोछे और कहा— इनसे मिल। हम ज्यादा। इनको तेरी जरूरत है। मैंने देखा।
छोटी बुआ: समझकर कि मैं उन्हें पहचान नहीं पा रहा और यहाँ कहना नहीं चाहता ऐसे माहौल पर कि मैं उन्हें पहचान नहीं पा रहा। बोलकर कुछ बोल नहीं पा रहा… बोलीं— ये जो पतली सी लड़की हैं ये हैं मेरी छोटी बेटी यानी प्रिया और वो दूसरी वाली हैं तेरी सोनू दीदी (सोनिया दीदी को मैं सोनू दीदी बोलता था)…
अब मुझे याद आया उनका चेहरा। अब सारे डॉट्स जुड़ने लगे थे…
मैंने कहा— सोनू दीदी अब तो मोटू की मोटू रह गईं (वो बचपन में मोटू थीं लेकिन अब मस्त फिगर की मालकिन थीं। फिगर भी आगे जाके कहानी में पता लगेगा। वेट रीडर्स) और ये सोनू दीदी की फिरफिरी (प्रिया दीदी) उनके साथ-साथ भटकते रहती थीं हमेशा। तू तो अब अलग दिख रही। कितनी बड़ी हो गई हो आप लोग।
दोनों दीदी सिसकते हुए— और क्या हमेशा छोटी बच्ची रहेंगी क्या? और क्या मुझको मोटी और मुझको फिरफिरी बोल रहा तू? सिसकते हुए नाक सिकोड़कर बोलीं।
मैंने उठाकर दोनों को गले लगा लिया…
दोनों ने बहुत प्यार से मेरा इस्तकबाल किया। मुझे अपनी दर्द बताई कैसे वो मेरे लिए घबराईं, डरी हुई थीं, कितनी बेचैन थीं मुझे देखने को लेकिन मुझको डिस्टर्ब न हो तो बोलकर नहीं आ पा रही थीं… लेकिन दूर से बार-बार देखकर जा रही थीं।
मैंने भी उनको बहुत सारा प्यार दिया और गले से लगाया रखा…
कुछ देर बाद बड़ी बुआ— अब तुम दोनों रानी का हो गया हो तो मेरे बेटा के लिए खाना लाके दूँ मैं और उसको आराम करने दो।
दीदी लोग एक साथ— हम आते हैं। फिर तू जल्दी से ठीक हो जा। सब ठीक हो जाएगा। हम लोग फिर मस्ती करेंगे।
मैं: हाँ दीदी।
ये कहकर बुआ और दीदी लोग कमरे से चले गए…
मेरे लिए सबके दिलों में इतना प्यार देख मेरे आधे घाव का दर्द तो यूँ गायब हो गया था…
हर कोई मुझसे कितना प्यार करता, मुझसे मिलना चाहता था लेकिन मुझको डिस्टर्ब न हो बोलकर मेरा कितना ख्याल रख रहे थे।
कुछ पल के लिए तो मैं भी अब गई घटनाओं को भूलने लगा था।
सच ही कहते हैं लोग—
“प्यार, अपनापन, फिकर और दिल के जज्बात से अच्छा मरहम कोई है ही नहीं”
मेरे भी घाव और चोट तेजी से भरने लगे थे इतना प्यार पाके…
और अब मुझे लगी थी तेजी से भूख। कुछ देर बाद मुझे बड़ी खुशबू सी आई…
तो देखा एक लड़की प्लेट में खिचड़ी लेकर आ रही है। मैंने उसका शक्ल देखा। मुझे लगा इन्हें भी मैं जानता हूँ। कहीं तो देखा हूँ उनको…
वो आते ही बोलीं…
मैं जानता हूँ कि स्टोरी अभी बहुत स्लो जा रही है लेकिन ये टाइम मैं कैरेक्टर्स को और अच्छे से डेवलप करने में ले रहा हूँ ताकि उनके इमोशन से आप लोग सब जब स्टोरी फास्ट होती जाएगी तब कनेक्ट कर सको। अदरवाइज पेस फास्ट कर भी सकते हैं…
क्या बोलती पब्लिक??

Maa/sis ke sath sex ki tips ke liye msg karo telegram @Vishal_rangila