एक घर के अजीब रीति रिवाज 1

A Family traditions hindi sex story:- ये कहानी भारत देश के किसी असीम गाँव में से एक ऐसे ही पिछड़े और दुनिया से कटे हुए एक गाँव की है। हमारे देश के अलग-अलग जगहों, अलग-अलग प्रांत, अलग-अलग कबीलों या गाँव में भांति-भांति के ट्रेडिशन या परंपरा निभाई जाती हैं सदियों से।

कभी ये परंपरा अजीबोगरीब तो कभी बड़ी ही अच्छी और सादी होती हैं। ये परंपरा या रीति-रिवाज कभी-कभी बड़े ही अजीब हो जाते हैं और उनका कारण भी लुप्त हो जाता है किंतु ये बनाई इतिहास में हुई कुछ घटनाओं के कारण ही होती हैं।

ऐसा ही हमारे हीरो का गाँव ब्रजपुर की अजीब रीति और रिवाज पर आधारित है…

A Family traditions hindi sex story

तो क्या है ये रिवाज? क्या हैं रीतियाँ और ये कैसे हमारे हीरो का जीवन बदल देती हैं, बस इस कहानी का यही सारांश है…

तो चलते हैं इस सफर पर, इस गाँव के सफर पर, दुनिया के स्ट्रेस से दूर…

ये कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसका किसी भी जगह या व्यक्तिगत से संबंध बस एक संयोग है। ये एक पूरी तरह से इनसेस्ट स्टोरी होगी न कि एडल्टरी। तो जिनको ऐसी कहानियों से दिक्कत हो वो अभी के अभी ये कहानी छोड़ सकते हैं या अपने रिस्क पर पढ़ सकते हैं।

कहानी में बताए गए ट्रेडिशन काल्पनिक हैं। ऐसे ट्रेडिशन बताकर हम किसी के भी मार्मिक और कल्चर को मजाक या ठेस पहुँचाने का हमारा उद्देश्य नहीं है।

कैरेक्टर्स

पापा: सूर्य प्रताप
माँ: रोशनी

बड़ी बेटी: अमृता
मंझली बेटी: सौम्या
छोटी बेटी: काजल
छोटा बेटा: अमन प्रताप (हीरो)

चाचा: रोहित प्रताप
चाची: सुहानी

बड़ी बेटी: रिद्धि
छोटी बेटी: सिद्धि

बड़ी बुआ: सौम्या (हाँ इनका और छोटी दीदी का नाम सेम है)
बड़ी बेटी: रूही
छोटी बेटी: सोनिया

छोटी बुआ: दिव्या

बड़ी बेटी: रश्मि
छोटी बेटी: प्रिया

मौसी: पूजा (इनके परिवार के बारे में कहानी में आगे पता चलेगा)

एक नौकरानी: आयशा
बेटी: सना

5 फीमेल वर्कर्स फ्रॉम खेत:

  1. शांति सिंह
  2. ज्योति राठ
  3. सीमा भीरू
  4. रचना खैरनार

कहानी में और भी कई सारे पात्र हैं जिनका सही वक्त आने पर खुलासा कर दिया जाएगा।

हर मुश्किल का भी अंत होता है और हर रात की सुबह। मेरे परिवार में इस जनरेशन में सबको लड़कियाँ ही हो रही थीं, किसी को भी लड़का नहीं हो रहा था।

तब जाकर पापा-चाचा ने एक बहुत पुराने बाबा से बात की। उसने कहा बेटा तो तुम दोनों भाई में से किसी एक को ही होगा।

बाबा ने एक बूटी दी, कहा इसको खाकर आज रात संबंध बनाना…

किंतु बालक के जन्म उपरांत उसको मेरे पास लाना। कुछ अड़चनें आ सकती हैं नहीं तो।

ठीक बोलकर पापा-चाचा ने वो बूटी लेकर घर आ गए और माँ और चाची को सारा सार बता दिया। और उस रात दूध में मिलाकर उस बूटी को रात भर धमाकेदार सेक्स हुआ…

लंड का हर एक बूंद उन दोनों की चुत के जितने अंदर हो सके छोड़ दिया। ये सेक्स रात भर चलता रहा और सुबह तक चुत में इतना गाढ़ा सफेद पानी भर चुका था कि जब सुबह हुई तो कपड़े पहनने के बाद भी उनके चुत से दिन भर मनी रिसकर उनकी पैंटी को गीला कर रहा था…

10 महीनों बाद…

दोनों को ही, चाची और माँ को, एक तंदुरुस्त बच्चा हुआ।

जहाँ चाची ने एक बहुत ही प्यारी परी जैसी बेटी को जन्म दिया वहीं माँ ने मुझे जन्म दिया।

सब बहुत खुश थे क्योंकि उनको उनके खानदान का वारिस चिराग मिल चुका था जो कि बहुत ही ज्यादा जरूरी था…

लेकिन बाबा के कहे अनुसार हम दोनों को बनाकर पास ले गए और दिखाया गया। बाबा ने दोनों बच्चों पे हाथ रखा, कुछ भभूति चटाई। फिर पापा को बुलाकर एक बड़ा सा ड्रम दिखाया जिसमें कुछ दवाइयाँ थीं और फिर उन्होंने पापा के कान में कुछ कहा। और जिसको सुनते ही पापा घबराए, परेशान ही चहलक आए। उन्होंने एक नजर अपने भाई को देखा जो दोनों बच्चों के साथ खेल रहा था। फिर वो भी हल्की सी मुस्कान दिए और ठीक है बाबा, आप जो भी कहते हैं सच होता है…

आपने जैसा कहा वैसा ही होगा…

फिर वो चाचा वापस आ जाते हैं साथ में वो ड्रम भी ले आते हैं…

रास्ते में चाचा पूछते हैं कि उनको बाबा ने क्या कहा। इस पर पापा मुस्कुराकर कह देते हैं कुछ नहीं, वक्त आने पे सब पता चल जाएगा सबको…

घर आकर वो मामा को ड्रम दिखाकर कुछ कहते हैं और फिर सब नॉर्मल हो जाता है…

फिर हम सब यूँ ही खेलते-कूदते वक्त बीतने लगता है और फिर…

8 साल बाद…

पापा कहते हैं मुझे बेटा, तुझे हॉस्टल में जाकर आगे पढ़ाई करनी होगी।

सारे घरवाले इस बात से बड़े नाराज हो जाते हैं लेकिन उनके खिलाफ कौन ही बोले। और फिर रोते-धोते मुझे शहर के हॉस्टल में भेज दिया जाता है…

नए शहर में मुझे शुरू में बड़ा अजीब लगता लेकिन धीरे-धीरे मुझे वहाँ रहने की आदत हो जाती और मेरा मन लग जाता।

हर 3 महीने पर पापा मुझे मिलने आते चाचा के साथ लेकिन और कोई मुझसे मिलने नहीं आता। जिस पर मुझे बहुत ही गुस्सा आता। मैं पापा पर भी गुस्सा करता, क्या कोई मुझसे मिलने नहीं आना चाहता। जिस पर पापा कहते जल्द आएँगे और मैं मन मारकर रह जाता कि नेक्स्ट टाइम शायद कोई मुझसे मिलने आएगा…

इस तरह दिन हफ्ते और हफ्ते महीनों में बदलने लगे और मैं घर और गाँव सब कुछ भूलने लगा…

लेकिन मुझे एक चीज जो डेली याद रहती थी वो है कसरत करना। और पापा हर बार मुझे एक बूटी देकर जाते थे जो कि मुझे रोज सुबह दूध में खानी होती थी। जिसको खाते ही कुछ देर मेरा बदन जलने लगता और मेरा लंड पूरा खड़ा होकर तन जाता… ये सिलसिला घर से चलता आ रहा था इसलिए इसको न चाहते हुए भी मैं डेली खा ही लेता। भले मुझे इससे क्या फायदा-नुकसान नहीं पता था लेकिन ये अब मेरा डेली रूटीन हो गया था…

और फिर मेरे बारहवीं की इम्तिहान के दिन आ गए और मैंने पापा से एक अच्छा गिफ्ट माँगी थी अगर मैं फर्स्ट आया तो…

जिस पर उन्होंने हाँ कह दिया और मैं फिर पूरी मेहनत से पढ़ाई पर लग गया और अच्छे से हर विषय का इम्तिहान देने लगा।

कुछ दिन बाद मेरे परीक्षा खत्म हो गई और अब थी गर्मी की छुट्टियों का वक्त…

सारे बच्चे अपना-अपना सामान बाँधकर घर जाने की तैयारी में थे सिर्फ मुझे छोड़कर क्योंकि हर गर्मियों की छुट्टियों में घर तो जाता नहीं था। वहीं हॉस्टल में रहता। पापा मुझे कुछ समर क्लासेस में जॉइन करवा देते और वैसे ही गर्मी की छुट्टियाँ खत्म होती थीं मेरी। तो मेरे लिए गर्मी की छुट्टियाँ उतनी भी कोई खुशी का माहौल नहीं था लेकिन इस बार सब कुछ बदलने वाला था। कुछ तो होने वाला था…

तो बच्चे सब अपना सामान पैक कर रहे थे वहीं मैं एक कोने में बैठा एक किताब पढ़ रहा था।
मुझे कोई कुछ कह भी नहीं रहा था न पूछ भी नहीं रहा था क्योंकि सबको पता था मैं गर्मियों की छुट्टी के लिए कहीं जाता नहीं था…

और यूँ ही कुछ दिन बीत गए और ये मई का महीना था। पापा अभी तक आए नहीं थे। हमारा रिजल्ट्स भी कल निकलने वाला था। मैं यूँ ही सोच में डूबा हुआ था कि आखिर इस बार पापा-चाचा लोगों को इतना देर क्यों लग रही है। फिर मुझे लगा शायद कल आ जाएँगे। कल रिजल्ट्स भी था और अच्छे मार्क्स आने पर मुझे एक गिफ्ट भी मिलने वाला था।

मुझे क्या गिफ्ट देंगे यहीं सब सोचते-सोचते ही मैं गहरी नींद में चला गया और इस तरह दूसरा दिन यानी रिजल्ट्स का दिन भी आ गया। आज हमारा रिजल्ट्स निकलना था।

गर्मी हल्की बढ़ी हुई थी और रिजल्ट्स का टेंशन। इन दोनों से बहुत सुबह से बेचैन था। फिर भी मुझे दी हुई बूटी मैं डेली खाता था। उस दिन भी खाया था लेकिन गर्मी में और गरम लगने लगी तो उस दिन मुझे बहुत तेज गुस्सा आ गया और मन ही मन खुद से कहने लगा ये क्या ही अजीब दवा मुझे डेली खानी पड़ती। इसका फायदा क्या है और मैं कब अपने बाकी परिवार से दोबारा मिल पाऊँगा। यहीं सब सोचते हुए मैं नहाने चला गया।

वहाँ ठंडा पानी की बूंदें मेरे शरीर को छूने लगीं तो एक सुकून सा सिहरन पूरे शरीर में दौड़ गया और इसके ही साथ जो मेरा लंड पिछले आधे घंटे से खड़ा था उसको थोड़ी शांति मिली और धीरे-धीरे शांत होता हुआ चला गया। और फिर मैंने अच्छे से नहाया।

नहाकर जब निकला तो देखा पापा और चाचा आए हुए हैं।

पापा: रिजल्ट्स निकलने हैं और इस बरखुरदार को देखो नहा रहे हैं।
चाचा: अरे भैया जी गर्मी भी तो देखो कितनी पड़ रही है।

मैं उनको देखते ही उनके पाँव छुए और मुस्कुराकर मिला।

चाचा: और कैसा मेरा बेटा?
पापा: हम्म दवा ठीक टाइम पे खा रहा है तो।
मैं: हाँ बढ़िया हूँ चाचू और दवा भी टाइम पे लेता हूँ। मैं जैसे बचपन से खा रहा।
पापा: चलो फिर बढ़िया बात है। और मुझे गले लगाकर ढेर सारा प्यार किया।

फिर घर से बहुत सारा खाना भेजते थे मेरे लिए हर बार की तरह। वो खाया। बहुत ही स्वादिष्ट खाना था। खाते-खाते मुझे याद आया हर बार माँ-चाची कुछ गिफ्ट्स या लेटर भेजती थीं मेरे लिए लेकिन इस बार कुछ भी मुझे दिया नहीं था चाचा ने न पापा ने।

मैं: चाचा इस बार चाची ने कुछ भिजवाया नहीं मेरे लिए।
चाचा: हाँ भिजवाया है ना।
मैं: ये लड्डू और लड्डू का टिफिन मेरे तरफ बढ़ाते हुए।
मैं: क्या चाचा आप भी… मैं तो…

पापा: अरे 4 बजने वाले हैं रिजल्ट्स निकलने वाले हैं तेरा अमन।

तब मेरा ध्यान जाके घड़ी पे गया जो 4 बजने ही जस्ट वाला था। मैं दौड़कर गया और लैपटॉप लेकर आया और अपना एडमिट कार्ड निकालकर चेक करने लगा (ये लैपटॉप मेरा नहीं मेरे रूममेट का था जो कि मैं अकेले में बोर न हो जाऊँ बोलकर छोड़कर गया था)।

मैंने रिजल्ट्स की वेबसाइट खोली और अपना नंबर टाइप किया और एक सेकंड में प्रार्थना, डर और सारे गुजरे हुए दिन ख्याल मेरी आँखों के सामने से गुजर गए और अगले ही पल रिजल्ट्स मेरे सामने था। और मैंने साइंस में 90% मार्क्स रखे थे और टॉप किया था।

ये देखते ही चीखकर उठकर नाचने लगा। पापा को चाचा ने बता दिया मेरे मार्क्स के बारे में।

वो भी बहुत खुश हुए मेरे मार्क्स को सुनकर…

और फिर बाकी दोस्तों के भी फोन आने लगे। सब बात की, सबने मुझे कॉन्ग्रेचुलेट भी किया (फोन हॉस्टल के लैंडलाइन पे आए थे मुझे नहीं)।

मैं: अब तो मुझे बहुत बढ़िया गिफ्ट माँगता है आप दोनों के तरफ से…

चाचा: चिंता मत कर बेटा तुझे एक गिफ्ट मेरे तरफ से और एक पापा के तरफ से मिलेगा…

दो-दो गिफ्ट का सुनके मेरे मन में ऐसे ही लड्डू फूटने लगे थे…

फिर कुछ देर यूँ बातचीत के बाद चाचा ने मुझे अपने बैग में से दो पैक्ड गिफ्ट दिए जिनमें लिखा था फ्रॉम चाची एंड चाचा टू लव्ड अमन…

उस पैक को मैंने जल्दी से खोला। उसमें एक छोटा सा लेटर निकला जिसमें लिखा था कॉन्ग्रेचुलेशन्स अमन बेटा हमको पता है तुम टॉप करोगे इसलिए ये गिफ्ट तुम्हारे लिए… और गिफ्ट में दो डब्बे थे, एक छोटा सा और एक बड़ा डब्बा…

उसमें था…

उसमें से एक डब्बे में एक लेटेस्ट उस वक्त के हिसाब से नोकिया का एक कैमरा वाला कीपैड फोन था और बड़े डब्बे में एक लैपटॉप था…

गिफ्ट देखकर तो मैं खुशी से पागल ही हो गया था। मैंने जोर से चाचा को गले लगा लिया…

चाचा: पसंद आया?
मैं: बहुत बहुत…
चाचा: ये तेरी चाची का ही आइडिया था तुझे देने का… चाची को ही थैंक यू बोलना…

मैं: पर गाँव में तो टावर है ही नहीं।
चाचा: लग रहे हैं ना…
मैं: फिर जल्दी में सबसे बात कर पाऊँगा।
चाचा: हाँ अब तू सबसे जल्दी बात कर पाएगा बेटा। बोलकर मेरे सर पर हाथ फेरा…

फिर शाम को मैं पापा-चाचा के घूमने भी गया जहाँ मैंने बहुत सारी शॉपिंग की सबके लिए गिफ्ट और खुद के लिए बहुत सारे कपड़े…

इस बार कुछ अजीब था। चाचा मुझसे कुछ ज्यादा ही कपड़े खरीदवा रहे थे… इतने सारे कपड़े क्यों चाचा?

अरे मैं तो दिलवा रहा हूँ, खरीद ले…

फिर मार्केट से आकर हमने खाना खाया और उस रात बात करते हुए निकल गई।

दूसरे सुबह जब मैं उठा तो गेट के बाहर एक चमकती हुई हीरो होंडा बाइक खड़ी थी…

मैं ये देखकर पागल गया। दौड़कर उसके पास गया। उसपे लिखा था फॉर माई बिलव्ड डग्गू…

डग्गू तो मुझको माँ बुलाती हैं…

मैंने जोर से चिल्लाकर पापा और चाचा को बुलाया। वो लोग उधर गेट पे ही खड़े थे। मुझे सुनते ही बाहर आ गए…

और कहा—

पापा: कैसा लगा गिफ्ट?
मैं: बहुत बढ़िया लगा। मैंने बाइक पे बैठते हुए बोला…
पापा: तेरी माँ के तरफ से ये गिफ्ट है…
मैं: तो मैं यूँ ही बोल दिया तो आपके तरफ से क्या मिलेगा…
पापा: उसको सुनकर तू बहुत खुश होगा… वो ये सबसे बड़ा गिफ्ट है।
मैं: अब क्या और गाँव वापस चलने को तो नहीं बोल दोगे… (मैं इतना खुश था कि जो मन में आया बोल दिया अब)

मैं इतना ज्यादा खुश था कि जो भी मन में आया बोल दिया था लेकिन अब मैं चुप हो गया और कुछ सेकंड के पॉज के बाद—

पापा: हाँ अबसे तू गाँव में ही रहेगा। तेरा दाखिला भी वहीं के पास के कॉलेज में करा दिया है। तू वहीं पढ़ेगा अब से…

ये सुनकर तो मैं जैसे काटो तो खून नहीं वाला हो गया। सन रहकर देखने लगा कभी चाचा को तो कभी पापा को। इतने साल बाद मुझे सबके चेहरे हल्के-हल्के याद आने लगे। गाँव याद आने लगा… माँ, चाची, बुआ, दीदी जो बीच-बीच में लेटर लिखते रहती थीं मुझे। सबसे मैं मिल पाऊँगा…

ये खुशी मुझसे छुपाए नहीं छुप रही। इतनी खुशी… इतनी खुशी… लेकिन वो कहते हैं ना खुशियों के बाद दुख आते हैं। बस वो ही अब आने वाला था।

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