विधवा बहू की चूत की प्यास

Sasur aur Widhwa bahu ki chudai story:- हैलो दोस्तों, आज मै फिर से आपके लिए एक कामुक sasur bahu hindi sex story लेकर आई हूँ। ये स्टोरी सच्ची घटना पर आधारित है। ये स्टोरी मेरे एक रीडर ने भेजी है। तो चलिए स्टोरी शुरू करते है।

दो साल पहले एक भयानक सड़क हादसे ने रमेश की जिंदगी छीन ली थी। वह मात्र 28 साल का था, और उसकी पत्नी, सुनीता, मात्र 25 की उम्र में विधवा हो गई। सुनीता का वैवाहिक जीवन छोटा लेकिन प्यार भरा था। रमेश के साथ बिताई रातें, उसके स्पर्श, उसके चुंबन—सब कुछ सुनीता के मन में बसे हुए थे। अब वह अपने ससुराल में अकेली रहती थी, अपने ससुर हरि प्रसाद के साथ। हरि प्रसाद 55 साल के थे, मजबूत कद-काठी वाले, लेकिन उम्र के साथ थोड़े शांत हो चुके थे।

सासु माँ का देहांत हुए भी काफी समय गुजर चुका था। उनका घर बड़ा था, लेकिन खालीपन से भरा, सिर्फ वह दो लोग ही तो थे घर मे और दोनों अकेले। सुनीता दिन भर घर संभालती, दिन तो किसी तरह कट जाता, लेकिन रातें काटनी उसके लिए भारी पड़ती थी।

Sasur aur Widhwa bahu ki chudai story

रात के गहराते अंधेरे में, जब घर में सन्नाटा छा जाता, सुनीता अपने कमरे में अकेली लेटी रहती। उसकी आंखों में आंसू होते, और मन में रमेश की यादें घूमतीं रहती। वह सिसकती और मन ही मन बोलती ‘रमेश, तुम्हारे बिना कैसे जियूं?’। धीरे-धीरे, उसे सब याद आता, रमेश के साथ बिताए वो हसीन पल, वो चुदाई के यादगार लम्हे, उसकी यादें कामुक हो जातीं।

रमेश का नंगा शरीर, उसके लंड का स्पर्श, वो ताबड़तोड़ चुदाई—सब कुछ उसे उत्तेजित कर देता। सुनीता का हाथ धीरे से अपनी साड़ी के नीचे सरक जाता। वह अपनी चूत पर उंगलियां फेरने लगती। ‘आह… रमेश’! उसकी सिसकियां कमरे में गूंजतीं और जब टक वह झड़ ना जाती तब टक उसे नींद नया आती।

एक ऐसी ही रात थी। घड़ी में दो बजे थे। सुनीता बिस्तर पर लेटी थी, साड़ी ऊपर चढ़ाई हुई। उसकी चूत गीली हो चुकी थी, रमेश की यादों से। वह अपनी उंगली चूत के होंठों पर रगड़ रही थी। ‘उफ्फ… रमेश, तुम्हारा लंड कितना मोटा था… मुझे चोदो ना…’ वह फुसफुसाई। उंगली अंदर सरक गई, उसकी उंगली चूत की दीवारों को सहला रही। दूसरी उंगली चुत के दाने को रगड़ रही थी। उसकी सांसें तेज हो गईं थी, सिसकियां हल्की थी, लेकिन कोई भी कमरे के बाहर से स्पष्ट सुन सके इतनी तेज थी। कमरे से बाहर, घर में सन्नाटा था, लेकिन सुनीता अपने आप मे खोई हुई थी।

Sasur bahu ki chudai story

तभी ससुर हरि प्रसाद को प्यास लगी। वह सोते हुए उठे, और पानी पीने के लिए बाहर जाने का सोच कर अपने बिस्तर से उठ खड़े हुए। हरी प्रसाद किचन मे जा ही रहे थे की उनको हल्की सिसकारियों की आवाज़ें सुनाई दी। सिसकियाँ धीमी थी लेकिन स्पष्ट थी, ध्यान से सुन तो सुनीता के कमरे से वो सिसकियाँ या रही थी। ‘क्या है ये? क्या सुनीता रो रही है?’ उन्होंने सोचा। वह उत्सुकतावश धीरे से सुनीता के रूम के दरवाजे के पास गए। दरवाजा थोड़ा खुला था।

अंदर का दृश्य देखकर वे ठिठक गए। सुनीता बिस्तर पर मुड़ी हुई थी, उसका हाथ चूत में था, और आंखें बंद। वह बड़बड़ा  रही थी ‘आह… हां… चोदो मुझे…’ उसकी आवाज साफ सुनाई दी। हरि प्रसाद का दिल धड़क गया। ‘अरे बापरे, बहू तो खुद को संतुष्ट कर रही है। दो साल हो गए, लेकिन अभी भी बहु रमेश की याद में तड़प रही है।’

वे चुपके से लौट आए, लेकिन उनकी नींद उड़ चुकी। बिस्तर पर लेटे लेटे वो सोचने लगे। ‘सुनीता जवान है, इस उम्र में अकेली रहना ठीक नहीं। उसकी दूसरी शादी कर देनी चाहिए। कोई अच्छा लड़का मिलेगा, तो ये तड़प खत्म हो जाएगी।’

अगली सुबह, नाश्ते पर उन्होंने बात छेड़ी। ‘बेटी, तू अभी जवान है। रमेश चला गया भगवान की यही मर्जी थी, लेकिन अभी तुम्हारे सामने पूरा जीवन पड़ा है, जीवन तो चलना है। मैं तेरी दूसरी शादी करवा दूं? कब तक रमेश की यादों के सहारे ज़िंदगी चलेगी’

सुनीता चौंक गई। चाय का कप हाथ से छूटते-छूटते बचा। ‘पिताजी, नहीं! मैं रमेश को भूल नहीं सकती। वो मेरा पहला और आखिरी पति था। शादी का नाम न लीजिए।’ उसकी आंखें नम हो गईं। हरि प्रसाद ने कोशिश की समझाने की, लेकिन सुनीता अड़ी रही। ‘मैं यहीं रहूंगी, आपके साथ। घर संभालूंगी। बस इतना ही।’ हरि प्रसाद हार मान गए, लेकिन मन में चिंता बनी रही।

दिन बीतते गए। सुनीता की रातें अब भी वैसी ही थी। वह अकेली अपने कमरे मे रात को तड़पती रहती और जब तड़प हद से ज्यादा बढ़ जाती तो चुत मे उंगली करके खुद को शांत कर लेती। हरि प्रसाद भी कभी-कभी उत्सुकतावश बहु को देखते और उसकी सिसकारियाँ सुन लेते, लेकिन चुप रहते।

एक दोपहर, जब हरि प्रसाद नहाने गए। गर्मी का मौसम था और गर्मी ज्यादा थी, वे अपने कमरे के बाथरूम का दरवाजा खोलकर ही नहाते थ। उस दिन भी वो पूरे नंगे होकर नहा रहे थे, बाथरूम का door खुला था। अचानक हरी प्रसाद के कमरे का दरवाजा खुला—सुनीता चाय लेकर आई थी।

‘पिताजी, आपकी चाय…’ लेकिन उसके शब्द गले मे ही अटक गए। सामने हरि प्रसाद नंगे खड़े थे, उनका बलिष्ठ शरीर पानी से पूरा भीग था। उनका लंबा और मोटा लंड हवा मे लहर रहा था, हालांकि वो खड़ा नहीं था लेकिन इस अवस्था मे भी वो इतना लंबा मोटा दिख रहा था कि किसी भी औरत को देखने पर मजबूर कर दे। उम्र होने के बावजूद उनका लंड मजबूत था और उसकी नसें फूली हुईं थी। कुछ पल के लिए सुनीता की नजरें ससुर जी के लंड पर ठहर गईं। ‘ओह गॉड इतना बड़ा…’ मन में कुछ हरकत हुई। चूत में एक झनझनाहट। सुनीता का चेहरा लाल हो गया। वह तो ऐसे जम गई थी जैसे कोई मूरत हो, उसकी नजरें ससुर जी के लंड से हट ही नहीं रही थी। तभी ससुर जी बोल उठे-

Sasur aur vidhwa Bahu ki chudai story hindi

‘बेटी, तू… बाहर जा!’ ससुर जी की आवाज ने सुनीता की तंद्रा तोड़ी और वह हड़बड़ाई, हरि प्रसाद ने तौलिया उठाया, लेकिन देर हो चुकी। सुनीता वहाँ से बाहर भागी, और अपने कमरे में जाकर बैठ गई। उसके मन में तूफान मचा। ‘पिताजी का लंड… कितना बड़ा था, इतना बड़ा। रमेश से भी डेढ़ गुण बड़ा। अगर वो…मेरे साथ…’ ससुर जी के साथ चुदाई की कल्पना ने उसे उत्तेजित कर दिया। उसे रात भर नींद नहीं आई। हाथ चूत पर गया, लेकिन इस बार रमेश की बजाय ससुर हरि प्रसाद का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था।

अगले दिन, घर में अजीब सी चुप्पी थी। सुनीता हरि प्रसाद से नजरें न मिला पा रही। हरि प्रसाद भी असहज था। पूरा दिन ऐसे ही झिझक और असहजता मे गुजर गया। शाम को बारिश हुई। आंधी तूफान की वजह से बिजली भी चली गई। वह दोनों अंधेरे में, लिविंग रूम में बैठे थे, लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा था। सुनीता ने चुप्पी तोड़ने की कोशिश की-

‘पिताजी, डर लग रहा है।’

हरि प्रसाद ने उसके कंधे पर हाथ रखा। ‘डरो मत बेटी। मैं हूं ना।’

ससुर जी के स्पर्श से ही सुनीता सिहर गई, हालांकि आज पहली बार नहीं था की उसके ससुर जी ने उसे टच किया था, वो अकसर एक बेटी की तरह उसको कंधे, सिर, कमर पर टच करते रहते थे, लेकिन आज का स्पर्श अलग ही था, वो कल की घटना का असर था।

‘पिताजी, कल… वो…’ उसके शब्द न निकले।

हरि प्रसाद समझ गए। ‘सॉरी बेटी, मुझे ऐसे बिना कपड़ों के नहीं नहाना चाहिए था।

नहीं पिताजी मेरी गलती थी, मुझे दरवाजा खटखटा के आना चाहिए था।

तूने सब देख लिया था क्या?

सुनीता ने सिर झुका लिया। ‘पिताजी, मैं… मैं तो आपका वो देखकर उत्तेजित हो गई थी। दो साल से अकेली हूं। रमेश की याद तो आती है, लेकिन आपका… आपका लंड देखकर…’ सुनीता की आँखों से आंसू बहने लगे।

हरि प्रसाद का दिल पिघल गया। उन्होंने सुनीता को गले लगा लिया। ‘बेटी, मैं भी तुझे तड़पते देखता हूं। रातों को तेरी सिसकियां सुनता हूं। शादी न करना चाहती तो ठीक, लेकिन ये तड़प…’

बारिश तेज हो गई। बिजली आने का का कोई चांस नहीं था। सुनीता हरि प्रसाद की छाती से लिपटी हुई थी। दोनों की सांसें तेज चल रही थी। हरी प्रसाद का हाथ बहु की पीठ पर सरकने लगा।

‘पिताजी… ये गलत है।’ सुनीता बोल तो रही थी लेकिन उसका शरीर साथ न दे रहा था।

ससुर बहू की चुदाई स्टोरी

हरि प्रसाद ने सुनीता का चेहरा ऊपर किया, और उसको होंठों पर एक चुंबन कर दिया। सुनीता ने पहले तो विरोध किया, लेकिन वह उत्तेजना मे अपना कंट्रोल खो रही थी। फिर धीरे धीरे वह भी ससुर जी के चुंबन का जवाब देने लागि। अब चुंबन गहरा हो गया। उनकी जीभें आपस मे लड़ने लगीं। हरि प्रसाद का हाथ बहु की साड़ी के ब्लाउज पर गया, और हल्के से एक एक कर वह बहु की चूचियां दबाने लगे। ‘आह… पिताजी…’ सुनीता सिहर उठी।

हरि प्रसाद ने सुनीता की साड़ी धीरे धीरे उतार डी। अब वह ब्रा और पेटीकोट में थी। उसकी चूचियां फूली हुईं। उन्होंने फिर ब्रा खोली, और चूचियों को मुंह में लिया। वह बारी बारी से बहु की चूचियाँ चूसने लगे, वह बीच बीच मे निप्पलस पर भी काट लेटे। सुनीता उनकी इस हरकत पर सिहर जाती और हल्की सी सिसकी उसके मुंह से निकाल जाती-

‘उफ्फ… पिताजी, धीरे से…’ सुनीता अब आनंद की दुनिया मे गोते लगा रही थी।

हरी प्रसाद का हाथ धीरे धीरे नीचे गया, उन्होंने बहु का पेटीकोट ऊपर किया। सुनीता की चूत गीली थी और खूब पानी बरस रही थी। उन्होंने अपनी 2 मोटी उंगलियां अंदर डालीं।

‘बेटी, तेरी चूत कितनी रसीली है। दो साल के बाद आज बरसात हुई है।’

सुनीता तड़पी, ‘हां पिताजी… चोदो मुझे… रमेश की तरह… नहीं, अपने इस हलाबी लंड से…’

हरि प्रसाद नंगे हो गए। उनका लंड खड़ा था, मोटा डंडा, सुपाड़ा एकदम चमकदार। सुनीता ने तुरंत उसे हाथ मे पकड़ लिया और सहलाने लगी।

‘कितना बड़ा है… आपका मुंह में ले लूं?’

हरि प्रसाद ने हाँ मे सिर हिलाया।

सुनीता घुटनों पर बैठी, और लंड को मुंह में ले लिया। ससुर जी का लंड इतना बड़ा और मोटा था की बड़ी मुश्किल से बहु के मुंह मे समा पा रहा था। केवल सुपाड़ा ही मुंह मे या पा रहा था। वह अब लंड को जीभ से चूसने लगी

‘आह… बेटी, तेरी लंड चूसाई कमाल की है।’ हरि प्रसाद के हाथ उसके बालों में रेंगने लगी और उन्होंने बहु के बालों को पकड़कर बहु का मुंह चोदना शुरू कर दिया। वह सुनीता के गले तक अपना लंड उतार देते और फिर पूरा बाहर निकालकर अंदर पेल देते। पूरा लंड बहु की लार से गीला हो गया था और कुछ लार बाहर भी टपक रही थी। कुछ देर मुंह चोदने के बाद-

फिर हरि प्रसाद ने उसे बिस्तर पर लिटाया। और बहु के पैर फैला दिए, अब वह चूत पर लंड का सुपाड़ा रगड़ने लगे। सुनीता से अब रहा नहीं जा रहा था-

‘डालो पिताजी… चोदो अपनी बहू को…’ सुनीता चीखी।

हरी प्रसाद ने एक हल्का स धक्का दिया और एक धक्के में ही लंड हल्का स अंदर चला गया। 2 साल से कोई लंड चुत मे नहीं गया था तो चूत की बिल्कुल टाइट थी। लंड अंदर जाते ही सुनीता को ऐसा लगा जैसे कोई गरम डंडा चुत मे उतार दिया हो।

‘आह्ह्ह… पिताजी दर्द हो रहा… थोड़ा धीरे करिए।

अच्छा बहु…’ हरि प्रसाद धीरे-धीरे पेलने लगे।

थोड़ी देर धीरे से चोदने के बाद अब चूत गीली हो गई थी और, लंड आसानी से अंदर बाहर सरक रहा। अब हरी प्रसाद के धक्कों मे तेजी आई, और कमरें में ठप ठप की आवाज़ें गूंजने लगी। Sasur ne bahu ko choda

‘चोदो… पिताजी जोर से… उफ्फ…’ सुनीता की चीखें पूरी कमरे मे गूंज रही थी।

हरि प्रसाद बहु की चूचियां चूसते हुए लंड को बहु की चूत पेल रहे थे।

लगभग 15 मिनट इस पोजीशन मे चोदने के बाद उन्होंने पोजीशन बदली। अब सुनीता ऊपर आ गई। और लंड पर बैठकर, उछलने लगी। उसकी चूत लंड को निगल रही थी। वह पूरी तेजी से उछलकूद कर रही थी और हरी प्रसाद भी नीचे से पूरी स्पीड मे धक्के लगा रहे थे।

‘हां… पिताजी… और तेज चोदो, तुम्हारा लंड मेरी चूत को भर रहा… आप तो रमेश से से बढ़िया चुदाई करते हो…’

 हरि प्रसाद नीचे से धक्के मार रहे थे। दोनों का पसीना बह रहा था, और सांसें उसेन बोल्ट से भी तेज दौड़ रही थी। फिर उन्होंने पोजीशन बदली और डॉगी स्टाइल मे चोदने लगे। सुनीता को घुटनों के बाल उलटी खड़ी करके, गांड ऊपर कर, हरि प्रसाद ने पीछे से चुत मे लंड डाला, और पूरी रफ्तार मे चुदाई करने लगे। वह बीच बीच मे बहु की गांड पर थप्पड़ मार रहे थे और फुल स्पीड मे चुदाई कर रहे थे।

‘आह… मारो… चोदो अपनी रंडी बहू को…’ सुनीता मदहोशी मे बड़बड़ा रही थी। लंड चूत में पूरी स्पीड मे अंदर बाहर आ-जा रहा था, बाहर बारिश होने से मौसम मे ठंडक जरूर थी लेकिन अंदर दो जिस्मों की गर्मी ने मौसम को गरम कर दिया था।

चुदाई को चलते लगभग 1 घंटा हो गया था हरि प्रसाद अब झड़ने के करीब पहुँच गया था, और और उसकी कमर पूरी रफ्तार मे चल रही थी।

‘बेटी, मैं झड़ने वाला हूं… अंदर डालूं?’

सुनीता चिल्लाई, ‘हां… पिताजी भर दो मेरी चूत को… अपने माल से गर्भ ठहरा दो…’

हरी प्रसाद ने 10-15 तेज धक्के लगाने के बाद एक आखिरी जोर का धक्का दिया, और लंड फड़का, और गर्म वीर्य की धार सुनीता की चूत में उतरने लगी। सुनीता को ऐसा लगा जैसे गरम लावा उसकी चुत मे उतार दिया हो और वह भी कांपने लगी, और उसकी चूत सिकुड़ गई और वह भी साथ साथ झड़ने लगी। दोनों हांफते हुए गिर पड़े।

बारिश थम चुकी थी, लेकिन उनकी आग न बुझी। रात भर वे चुदाई करते रहे। सुनीता की तड़प शांत हो गई, लेकिन ये एक नई शुरुआत थी। हरि प्रसाद ने कहा, ‘बेटी, अब तुम मेरी हो। शादी की बात भूल जा।’ सुनीता मुस्कुराई, ‘हां पिताजी… तुम्हारा लंड ही मेरा पति है अब।

उस रात के बाद, घर का माहौल बदल गया। सुनीता और हरि प्रसाद के बीच एक गुप्त रिश्ता बन गया। दिन में वे सामान्य थे—बहू-ससुर। लेकिन रात होते ही कमरे बंद, चुदाई का दौर चालू। सुनीता अब खुलकर अपनी कामुकता जाहिर करती। एक रात, वह हरि प्रसाद के कमरे में घुसी।

‘पिताजी, आज गांड मारोगे?’ हरि प्रसाद हंस पड़े। उन्होंने तेल लगाया, उंगली से गांड ढीली की। फिर लंड डाला। सुनीता दर्द से चीखी, लेकिन आनंद में। ‘आह… फाड़ दो मेरी गांड…’

दूसरी रात, रोलप्ले। हरी प्रसाद ने कहा, ‘मुझे रमेश समझो।’ हरि प्रसाद ने रमेश की नकल की। ‘और, सुनीता को उसका पति बनकर चोदा।’ अब तो ये हर रोज की बात हो गई, वह रात दिन बस चुदाई करते और सुनीता अब अपने पति को भूल चुकी थी।

धीरे-धीरे, उनका रिश्ता गहरा होता गया। इस बीच सुनीता गर्भवती हुई। दोनों ने वह शहर छोड़ दिया और दूसरे शहर मे जाकर पति पत्नी की तरह रहने लगे। दोनों खुश थे विधवा की तड़प खत्म, नई जिंदगी शुरू।

तो दोस्तो आपको ये छोटी सी ससुर बहू की सेक्स स्टोरी कैसी लगी कमेंट करके ज़रूर बताना।

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