हुमा एक हाउस वाइफ और मिश्रा पान वाला – 15
Huma aur panwala ki kamuk chudai kahani:- जैसा कि आपने पिछले पार्ट में पढ़ा कि हुमा और मिश्रा के बीच शारीरिक संबंध बन चुके थे। हुमा मिश्रा के लिए टिफिन लेकर जाती थी और हर बार चुदाई के बाद ही घर लौटती थी। दोनों के बीच आकर्षण बढ़ता जा रहा था और हुमा धीरे-धीरे मिश्रा के जाल में फँसती जा रही थी। अब पढिए ये कामुक कहानी आगे ..
पिछला पार्ट यहाँ पढ़ें ==> हुमा एक हाउस वाइफ और मिश्रा पान वाला – 14
Huma aur panwala ki kamuk chudai kahani
हुमा जब घर पहुँची तो शांता ने दरवाजा खोला और शैतानी मुस्कान के साथ कहा,
शांता: आओ दीदी, मिल आई जीजू से? मजा आया?
हुमा: चुप कर शैतान, कुछ ना बोल।
शांता: दीदी कुछ भी कहो, आज से पहले मैंने आपको इतना खुश नहीं देखा।
हुमा शर्मा गई, कुछ नहीं बोली।
शांता: दीदी जाओ, काफी मेहनत की है, नहाकर फ्रेश हो जाओ।
हुमा: चुप कर भी जा शैतान।
हुमा फ्रेश हुई और अपने रूटीन कामों में लग गई। मगर कहीं न कहीं आज जो हुआ उसे वो बार-बार याद आ रहा था। जिसका उसे कोई पछतावा नहीं था। हाँ, मगर आज वो बिल्कुल हल्का और रिलैक्स महसूस कर रही थी। उसका मन बार-बार उसके मोबाइल की तरफ ले जा रहा था। उसको बार-बार मन कर रहा था मिश्रा को कॉल करने का।
मगर वो कॉल कर नहीं पाई। तभी उसका फोन बजा। फोन मिश्रा का था। हुमा जैसे कॉल उठाया मिश्रा ने डायरेक्ट बोल दिया।
मिश्रा: कैसी हो?
हुमा: जी जी, मैं ठीक। और आप?
मिश्रा: बस आपकी यादों में घिरा हूँ।
हुमा का भी वही हाल था मगर उसने बताया नहीं। कैसे बता देती कि मुझे भी आपकी बहुत याद आ रही है। कुछ और वक्त लगना था उसको खुलने को।
हुमा चुप थी।
मिश्रा: क्या हुआ, चुप क्यों हो? मेरा फोन करना अच्छा नहीं लगा क्या?
हुमा: जी वैसी बात नहीं है।
हुमा को कहना तो बहुत था मगर कह नहीं पा रही थी।
हुमा के धड़कते दिल की धड़कनें मिश्रा महसूस कर रहा था।
मिश्रा: क्या हुआ हुमा?
हुमा: कुछ नहीं।
इतना कहकर हुमा ने कहा कि फोन रखूँ, मुझे कुछ काम है।
मिश्रा: काम तो मुझे भी है मगर कुछ देर बात कर लो ना।
हुमा: जी वो… वो आप आज से दोपहर का टिफिन मत लाइए। मैं आपके लिए खाना लेकर आया करूँगी।
मिश्रा बहुत खुश हुआ।
मिश्रा: धन्यवाद हुमा जी।
हुमा: इसमें शुक्रिया की क्या बात है। आप ही तो कहते हैं कि हम कहाँ पराये हैं।
मिश्रा: हाँ सही कहा आपने।
इतना कहकर हुमा और मिश्रा फोन काट देते हैं।
दूसरे दिन…
जल्दी-जल्दी में हुमा पूछना भूल गई कि आप क्या खाएँगे। मगर शांता की मदद से उसने मिश्रा के लिए वेज खाना बना लिया।
धड़कते दिल के साथ हुमा दोपहर होने का इंतजार कर रही थी। वहीं मिश्रा का भी यही हाल था। और आखिर में दोपहर हो गई और हुमा निकल पड़ी मिश्रा के पान की शॉप की तरफ। दोपहर का वक्त था तो भीड़ ना के बराबर थी। मिश्रा की नजरें भी सड़क पर थीं। उसको दूर से आती हुई हुमा दिखाई दी जो बुर्के में थी और हाथ में एक बैग था। उसमें मिश्रा के लिए टिफिन था।
जैसे-जैसे मिश्रा की शॉप करीब आ रही थी हुमा की दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी।
मिश्रा की पान की शॉप के करीब पहुँचकर एक लंबी साँस लिए हुए हुमा ने मिश्रा को देखा। मिश्रा पान की शॉप पर बैठा हमेशा की तरह मोटा काला बद्धा इंसान जो हुमा को देख मुस्कुरा रहा था। हुमा ने यहाँ-वहाँ देखा और शॉप की तरफ बढ़ी। वहीं मिश्रा ने भी यहाँ-वहाँ देखा और हुमा को इशारा किया कि साइड वाले स्टोर से आ जाए। आसपास कोई नहीं है।
हुमा को भी स्टोर का रास्ता पता था। वो भी देर ना करते हुए अंदर दाखिल हुई और हमेशा की तरह उस छोटे से कमरे में चली गई। अंदर कमरे का हाल वही था जो कल था। वो गद्दा जो कल की दमदार चुदाई के बाद वैसा ही पड़ा था और उसके पास पिलो वो भी वही था जो कल था।
उसको देख हुमा की दिल की धड़कन बढ़ गई और कल जो हुआ उसकी याद उसके जहन में आई। हुमा शर्मा भी गई और उसके जिस्म में कुछ हुआ। तभी मिश्रा उसके पीछे आकर खड़ा हुआ। उसने स्टोर का शटर डाउन कर दिया था।
वो पीछे से आकर हुमा को लिपट गया।
मिश्रा: आ गई मेरी जान।
हुमा इस हमले से बौखला गई।
हुमा: छोड़िए क्या कर रहे हो। मैं आपके लिए खाना लाई थी।
मिश्रा: पता है मेरी जान।
हुमा: आप खाना खा लीजिए।
मिश्रा: हाँ पहले खाना खाता हूँ। बाद में खाना बनाने वाली को।
इतना कहकर मिश्रा ने हुमा का बूब्स दबाकर छोड़ दिया।
हुमा: औउचhhh
हुमा अंदर रूम में गई। अपने हाथ की बैग से एक बड़ा सा स्टील का टिफिन निकाला।
मिश्रा: वाह, खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है।
हुमा ने टिफिन खोला और बैग से कुछ प्लेट-स्पून निकालकर खाना परोस दिया।
मिश्रा खाना खाने लगा।
मिश्रा: वाह क्या स्वाद है। तुमने बनाया?
हुमा ने हाँ में सिर हिला दिया।
मिश्रा: वाह आज बहुत दिनों बाद स्वादिष्ट खाना खाने को मिला। आज पता चला घर का खाना घर का ही होता है।
खाना खाते वक्त मिश्रा सिर्फ हुमा की तारीफ करे जा रहा था। आज तक हुमा के हाथ के बने खाने की तारीफ उसके शौहर ने नहीं की थी।
मिश्रा: तुमने खाना खा लिया?
हुमा: जी।
मिश्रा: मेरे हाथ से खाओ ना।
हुमा: क्या?
मिश्रा ने सब्जी-रोटी हुमा की तरफ की और बड़े प्यार से अपने हाथ को हुमा के पिंक लिप्स तक ले गया। हुमा ने अपने लिप्स खोल दिए और मिश्रा ने अपने हाथ का निवाला हुमा को खिलाया। हुमा की आँख में हल्के से आँसू आ गए। आज तक इतना प्यार जो उसको किसी ने किया नहीं था। मगर मिश्रा को उससे कोई प्यार नहीं था। था तो सिर्फ हवस।
खैर दोनों का खाना हुआ। आज हुमा और फिदा थी मिश्रा पर।
खाना खाने के बाद मिश्रा ने हाथ धोया और अपनी धोती से पोंछते हुए कहा,
मिश्रा: मैं बाहर का जायजा लेकर आता हूँ। तुम कपड़े उतारकर तैयार रहना। मुझसे अब सब्र नहीं हो रहा।
हुमा को उम्मीद नहीं थी मिश्रा ऐसा डायरेक्ट बोल देगा।
मिश्रा बाहर चला गया। उसने यहाँ-वहाँ देखा। कोई नहीं था। मिश्रा का लंड खुशी में खड़ा हो चुका था।
मिश्रा अंदर आया तो देखा कि हुमा वैसे ही बैठी थी।
मिश्रा: अरे ये क्या, तुमने कपड़े नहीं उतारे?
हुमा ने ना में सिर हिलाया और कहा,
हुमा: मुझे शर्म आ रही है। मैं नहीं कर सकती।
मिश्रा: अरे मेरी जान ऐसा शर्माओगी तो कैसे चलेगा?
हुमा: जो करना है आप ही करो। मुझसे नहीं होगा।
हुमा ने एकदम से कहा और लंबी साँस ली जैसे बड़ी मुश्किल से बोल पाई हो।
मिश्रा मन में: इस बुलबुल को ओपन होने में वक्त लगेगा।
मिश्रा हुमा के करीब पहुँचा तो हुमा ने आँखें बंद कर दीं। हुमा नीचे बैठी थी। मिश्रा ने हुमा के बाजुओं को पकड़ उसको खड़ा किया। हुमा भी खड़ी हो गई जैसे कि मिश्रा जो कर रहा उसको करने दो।
मिश्रा ने हुमा के पैरों से पकड़कर बुर्का उतारकर उसके सीने तक ले आया। हुमा ने खुद ही अपने हाथ ऊपर कर दिए। मिश्रा ने देर ना करते हुए बुर्का उतार दिया। हुमा ने ब्लैक कमीज और ब्लू सलवार पहनी थी। सीने पर दुपट्टा न होने के कारण उसके बड़े बूब्स ब्लैक कमीज में ऊपर-नीचे होते हुए मिश्रा को नजर आ रहे थे। हुमा की दिल की धड़कन इतनी बढ़ गई थी कि उसके बूब्स ऊपर-नीचे हो रहे थे।
मिश्रा का लंड तो पहले से अकड़ा हुआ था। उससे सब्र नहीं हो रहा था। उसने हुमा के चेहरे की तरफ देखा। हुमा ने अब भी आँखें बंद कर रखी थीं।
मिश्रा ने हुमा का कमीज ऊपर उठाकर सलवार का नाड़ा ढूँढने लगा। नाड़ा हाथ में आते ही मिश्रा ने नाड़ा खींच लिया। आज हुमा मिश्रा को मना नहीं कर रही थी। आज उसका भी यही था कि जो हो रहा है हो जाने दो।
सलवार का नाड़ा खींचते ही सलवार नीचे जहाँ हुमा की पायल थी वहाँ जा गिरी।
हुमा की गोरी मांसल जाँघें मिश्रा को पागल करने लगीं मगर मिश्रा ने अपने मिशन को जारी रखा और हुमा के कमीज के बटन को खोलकर कमीज भी उतार दी। हुमा ने भी कमीज उतारने में मिश्रा की हेल्प की मगर अपनी आँखें नहीं खोलीं।
दूध जैसा गोरा जिस्म ब्लैक ब्रा और पैंटी में मिश्रा के लंड को फाड़ने के लिए काफी था। हुमा के ब्लैक गोल्डन हेयर उसके चेहरे पर आ गए थे कमीज उतारने की वजह से।
मिश्रा ने अब भी अपने आप पर कंट्रोल करते हुए हुमा की ब्रा की हुक खोल दी। ब्रा की हुक खोलते ही हुमा के बड़े गोरे बूब्स आजाद होकर लटकने लगे। मिश्रा की आँखें बड़ी हो गईं। उसने हुमा की ब्रा को अलग करते ही झुककर एक बूब्स को थाम लिया और दूसरे बूब्स को चूसने लगा।
हुमा की मीठी सिसकारी निकल गई।
हुमा: सsshhhhhhhhhhhhhhhhh
हुमा को यही मीठा एहसास तो चाहिए था। मुमुमम की आवाज करते हुए मिश्रा हुमा के बूब्स को बारी-बारी चूसने लगा।
हुमा मस्त होने लगी। उसके हाथ खुद-ब-खुद मिश्रा के ऑयल लगे बालों में घूमने लगे। काला मोटा मिश्रा झुककर एक खूबसूरत बाला के बूब्स चूस रहा था। हुमा बार-बार उसके बालों में उँगलियाँ घुमाए जा रही थी। मिश्रा कंट्रोल खो रहा था।
मिश्रा सीधा खड़ा हुआ और अपने कपड़े उतारने लगा। हुमा अब भी आँखें बंद किए हुए खड़ी थी। वो ब्लैक पैंटी में थी और उसके बूब्स के निप्पल गीले हुए थे मिश्रा के थूक से।
हुमा भी गरम हो चुकी थी। मिश्रा उसके सामने पूरी तरह नंगा खड़ा था। एक काला मोटा मिश्रा जिसको देख किसी भी औरत को घिन आ जाए मगर हुमा को आखिर उसने ट्रैप जो कर लिया था। मिश्रा नंगा होते ही नीचे घुटनों के बल बैठ गया और हुमा की पैंटी को नीचे खींच ली। एक पल में ही हुमा की पैंटी नीचे आ गई। हुमा की चूत पर एक भी बाल नहीं था। मिश्रा ने चूत को देखा और अपने लंड को मुट्ठियाने लगा।
हुमा की नजरें झुकी हुई थीं। उसने ये नजारा देखा और उसे शर्म आ गई। उसने अपने हाथ चूत पर रखे। अगले पल मिश्रा ने उस हाथ को साइड करके अपना मुँह चूत पर रखकर चाटने लगा।
हुमा: सsshhhhh
मिश्रा हुमा की दोनों टाँगों के बीच अपना मुँह घुसाए जा रहा था। हुमा का मजे के मारे बुरा हाल था। वो मिश्रा के सिर के बालों को अपनी मुट्ठियों में लेने की कोशिश करने लगी।
मिश्रा का चेहरा हुमा की मोटी जाँघों में फँसा था। अगले ही पल मिश्रा ने अपना चेहरा बाहर निकालकर हुमा को नीचे खींच लिया। हुमा गिरते-गिरते बची। वो बड़ी मुश्किल से बैठी ही थी कि मिश्रा ने उसको गद्दे पर लिटा दिया।
मिश्रा ने हुमा की टाँगें फैला दीं। मिश्रा बेसब्र हो गया था। उसने झुककर अपने लंड हुमा की चूत पर सेट कर धक्का लगा दिया।
हुमा: औउचhhhh आааhhh धीरे।
मिश्रा का लंड का सुपाड़ा हुमा की चूत में जा घुसा। मिश्रा ने फिर धक्का लगा दिया।
हुमा: आааhhhhh आराम से ना।
मिश्रा मगर कहाँ रुकने वाला था। उसने आखिरी धक्का लगाकर पूरा लंड चूत में उतार दिया।
हुमा की हल्की सी दर्द भरी सिसकारी निकली मगर तेज।
हुमा: आааhhhhhhhhh प्लीज थोड़ा स्लो। आааhhhhhhhhh
हुमा ने मिश्रा का लंड इससे पहले 3 बार लिया था तो उसको उतना दर्द नहीं जितना पहली बार हुआ था।
मिश्रा ने हल्के धक्के लगाना शुरू कर दिया।
हुमा भी हर धक्के में नीचे बिछे गद्दे को मुट्ठी में दबा रही थी और धीमी सिसकारियाँ ले रही थी। हुमा को पता था ज्यादा आवाज करेगी तो आसपास या बाहर आवाज ना चली जाए।
अब मिश्रा चुदाई शुरू कर दी। हुमा की हल्की दर्द भरी सिसकारियाँ मजे में बदल गई थीं।
अब हर धक्के के साथ हुमा का भरा हुआ जिस्म हिल रहा था क्योंकि मिश्रा जैसा मोटे शरीर वाला उसको धक्के जो लगा रहा था।
हुमा भी अब मस्त होने लगी थी। अब वो भी मिश्रा की बालों वाली छाती को सहला रही थी। हर धक्के के साथ अपनी टाँगें ज्यादा से ज्यादा फैला रही थी।
मिश्रा पर हवस सवार थी। जिस खूबसूरत बाला के सपने उसने देखे थे आज वो साकार हो गए थे।
मिश्रा अपनी बड़ी काली गाँड हिलाते हुए धक्के लगाए जा रहा था। अब उस रूम में थप-थप की हल्की-हल्की आवाज आने लगी थी। हुमा जैसे-जैसे मिश्रा के सीने को सहला रही थी उसकी चूड़ियों की छन-छन की आवाज भी अब रूम में गूँजने लगी थी।
धक्के लगाते हुए मिश्रा की नजर हुमा के गुलाब की पंखुड़ियों जैसे लिप्स पर गई जो सिसकारियों की वजह से खुल-बंद हो रहे थे। मिश्रा ने अपना चेहरा नीचे करके उन लिप्स को अपने काले लिप्स में गिरफ्त कर लिया। उम्मममम की आवाज भी अब उसमें शामिल हो गई।
ऊपर गरम-गरम किस और नीचे गरमा-गरम लंड। हुमा झेल नहीं पाई और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया।
मिश्रा को भी एहसास हुआ कि हुमा झड़ गई है। उसने धक्के लगाने बंद किए और 2 मिनट के लिए रुक गया। हुमा अब भी हाँफ रही थी। मगर अब पूरे जोश में था। उसने धक्के लगाने बंद किए थे मगर अब भी वो हुमा के लिप्स चूस रहा था।
हुमा का निचला लिप्स अब भी उसके मुँह में था। मिश्रा हुमा पर पूरी तरह लेटा हुआ था। कुछ देर बाद मिश्रा ने हुमा की चूत से लंड निकाला और हुमा को कहा,
मिश्रा: हुमा घोड़ी बन जाओ। मुझे तुम्हें पीछे से चोदना है।
हुमा हाँफते हुए उठकर बैठ गई। कुछ देर में रूम में सन्नाटा था मगर हुमा की चूड़ियों और पायल की आवाज रूम में गूँजी और मिश्रा के सामने हुमा घोड़ी बन चुकी थी। मिश्रा मुस्कुरा रहा था मगर उसकी मुस्कान हुमा नहीं देख पा रही थी। हुमा की आँखों के सामने दीवार थी और उसके हाथ नीचे बिछे गद्दे पर थे।
हुमा की बड़ी गाँड अब मिश्रा के लंड के सामने थी। मिश्रा ने हुमा की बड़ी गोरी गाँड को देखकर वासना भरी मुस्कान दी और हुमा की गाँड की गोलइयों को सहलाने लगा।
गाँड की गोलइयों को फैलाकर लंड को चूत पर सेट करने लगा। मिश्रा चूत देख नहीं पा रहा था। अंदाजे से टटोलकर हुमा की चूत पर लंड सेट किया और धक्का लगा दिया।
हुमा: सsshhhhhhhhhhh
हुमा की सिसकारी के साथ मिश्रा का आधा लंड चूत में जा घुसा था। मिश्रा ने अपनी आँखें बंद कीं और हुमा की गाँड की गोरी गोलइयों को सहलाते हुए फिर धक्का लगा दिया। हुमा का चेहरा सामने दीवार के करीब जाकर वापस आया।
मिश्रा का पूरा लंड चूत में जा घुसा था। मिश्रा ने धक्के लगाना शुरू किया और अब हर धक्के के साथ हुमा हिल रही थी। उसका चेहरा बार-बार दीवार के करीब जाकर वापस आ रहा था। उसके बड़े बूब्स लटककर यहाँ-वहाँ हो रहे थे।
मिश्रा हुमा की गाँड की गोलइयों को थरथराता देख बड़बड़ाने लगा।
मिश्रा: आааhhh मेरी जान बहुत मस्त है तुम्हारी गाँड। तुम्हारी गाँड का मैं बहुत पुराना आशिक हूँ।
मिश्रा गाँड को सहलाए जा रहा था और धक्के भी लगाए जा रहा था। मिश्रा भी अब बरदाश्त नहीं कर पाया और अपना लंड बाहर खींच लिया और हुमा की गाँड की गोलइयों पर अपने लंड का पानी बहाने लगा।
मिश्रा हाँफते हुए यहाँ-वहाँ देखने लगा। करीब में ही पुराने न्यूजपेपर पड़े थे। मिश्रा ने उसमें से एक न्यूजपेपर को लेकर हुमा की गाँड पर बहते हुए उसके पानी को साफ किया।
मिश्रा हाँफ रहा था। मिश्रा काफी रिलैक्स महसूस कर रहा था। वहाँ हुमा भी हल्का महसूस कर रही थी।
हुमा पलटकर पीठ बल लेट गई और फिर जल्दी से उठकर अपने कपड़े पहनने लगी। मिश्रा भी अपनी धोती बाँधने लगा।
पिछले 24 घंटे में हुमा 2 बार जबरदस्त चुदाई हुई थी। उसकी जिंदगी में ये सब पहली बार ही हो रहा था।
हुमा जाने के लिए रेडी हो गई थी तो मिश्रा उसको गले लगाकर कहा,
मिश्रा: जा रही हो? मन नहीं कर रहा तुमसे दूर रहने को।
हुमा का भी यही हाल था मगर वो नहीं जानती थी कि वो एक ट्रैप में फँस चुकी है।
हुमा मिश्रा से अलग हुई और जाने की इजाजत माँगी। कुछ ही पल बाद हुमा जा चुकी थी।
ऐसे ही अब दिन गुजरने लगे। अब हुमा कभी खुद टिफिन लाती तो कभी सैफ के घर पर होने की वजह से शांता के हाथ भिजवा देती। सैफ को इस बात का कुछ नहीं पता था।
लेकिन जब भी हुमा टिफिन लाती बिना चुदे नहीं जाती।
ऐसे ही एक दोपहर को उसी छोटे से रूम में पान की शॉप के पीछे का मंजर था।
उस रूम में हल्की सी रोशनी थी। एक पुराना फैन चल रहा था। हुमा की सलवार-कमीज एक साइड में पड़े थे। वहीं दूसरी तरफ मिश्रा की धोती-कुर्ता पड़ा था। उसके पास में हुमा की ब्रा-पैंटी पड़ी थी।
नजारा कुछ ऐसा था कि हुमा घोड़ी बनी हुई थी और मिश्रा उसको पीछे से चोद रहा था। हर धक्के के साथ हुमा आगे हो जाती तो कभी पीछे।
मिश्रा धना-धन हुमा को पीछे से जोड़े जा रहा था। हुमा की गाँड थरथरा रही थी।
मिश्रा: आааhhh हुमा तुमको पीछे से चोदने में मुझे बड़ा मजा आता है।
हुमा: सsshhhhhhh आааhhhhh हिलते हुए कहती है। मैंने कब आपको रोका है। आपको जो करना है कीजिए। सsshhhhh आааhhhhh
मिश्रा: मजा आ रहा है ना?
हुमा: जी सsshhhhh
तभी बाहर एक बाइक की आवाज आती है। बाइक की आवाज जानी-पहचानी लगती है। फिर वो बाइक वाला हॉर्न बजाता है। कीiiiiikkkkk कीiiiiikkkk
ये आवाज भी जानी-पहचानी लगती है मिश्रा और हुमा को। मगर दोनों चुदाई का मजा ले रहे थे। तभी बाइक की आवाज बंद होती है और आवाज आती है,
सैफ: मिश्रा भाई…
ये आवाज सुनकर दोनों चौंक जाते हैं। ये आवाज सैफ की थी।
मिश्रा धक्के लगाना रोक देता है।
हुमा भी डर के मारे सहम जाती है। वो और आगे हो जाती है जिस वजह से उसकी चूत से मिश्रा का लंड बाहर आ जाता है।
हुमा बहुत ज्यादा डरी हुई थी। हुमा डरते हुए पीछे पलटकर देखते हुए इशारे से कहती है बाहर जाकर देखिए। बाहर वो आए हैं।
मिश्रा फुसफुसाते हुए: तुम डरो नहीं। मैं संभालता हूँ अभी।
मिश्रा जल्दी-जल्दी अपनी धोती-बनियान पहनकर बाहर जाता है।
सैफ: अरे भाई अंदर क्या कर रहे थे? दुकान को खुला छोड़कर।
मिश्रा: सैफ अभी-अभी अंदर गया था। कुछ साफ-सफाई कर रहा था।
सैफ: भाई कुछ ज्यादा मेहनत नहीं कर रहे थे क्या जो इतना हाँफ रहे हो। बाल भी बिखरे हैं तुम्हारे।
हुमा भी ये सब सुनकर डर रही थी।
मिश्रा हँसते हुए: भाई अब सफाई में ये सब कहाँ याद रहता है कि अपना हाल क्या है।
मिश्रा: बोलो भाई क्या सेवा करूँ?
मिश्रा का लंड धोती में सिकुड़ गया था।
सैफ: भाई अब क्या कहूँ। मुझे कुछ पैसों की जरूरत थी।
मिश्रा: बस इतनी सी बात। कितने चाहिए?
सैफ: भाई 10000।
10000 सुनकर हुमा भी सोच में पड़ जाती है। इतने पैसों की आखिर क्या जरूरत आ गई सैफ को।
मिश्रा अंदर आया और हुमा को इशारा करते हुए कहा कि मेरे कुर्ते में से पैसे निकालकर दो। हुमा को तो जैसे साँप सूँघ गया था।
वो अब भी ऐसे ही नंगी ही बैठी थी। उसने मिश्रा का कुर्ता उठाया। उसमें 500 की नोटों की गड्डी थी। उसमें से 10000 निकालकर मिश्रा को दिए। मिश्रा ने इशारा किया टेंशन मत लो, मैं हूँ ना।
हुमा को पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगा। बाहर मिश्रा सैफ को पैसे देकर अंदर आया। सैफ की बाइक की आवाज जब तक दूर तक सुनाई नहीं दी हुमा कुछ नहीं बोली। उसके बाद वो बोल पड़ी।
हुमा: मिश्रा जी जो हो रहा गलत हो रहा। आज अच्छा नहीं लगा। मेरे शौहर बाहर खड़े और मैं इस हालत में अंदर। अब ये गुनाह मैं और नहीं कर सकती। वो बेचारे मेरे लिए पैसे कमा रहे हैं। पता नहीं क्या परेशानी होगी उनको।
मिश्रा का माथा ठनका। उसको लगा ओह अब क्या होगा। उसने फिर अपने शातिर दिमाग से चाल चली।
मिश्रा: अरे मेरी जान सैफ भाई ने मुझसे ये पैसे क्यों लिए मुझे पता है।
हुमा: क्यों?
मिश्रा: वो बात ऐसी है कि आज शांता का जन्मदिन है। उसको आज सैफ भाई को तोहफा देना था।
हुमा: क्या? आज शांता का बर्थडे है?
मिश्रा: हाँ।
हुमा: मगर ये सब आपको कैसे पता?
मिश्रा: यकीन नहीं आता तो घर जाकर पता कर लो।
हुमा उठकर कपड़े पहनने लगती है।
मिश्रा उसको रोकने लगता है मगर वो नहीं रुकती।
हुमा के जाते ही मिश्रा शांता को कॉल करके सब बात बता देता है।
शांता: तुम फिकर ना करो। मैं संभाल लूँगी। मगर इसके अलग से 5000 लूँगी।
मिश्रा: क्या 5000? मगर 5 तो बहुत ज्यादा है।
शांता: सोच लो कहीं बुलबुल हाथ ना निकल जाए।
मिश्रा: ठीक है ले ले।
हुमा जैसे ही घर पहुँचती है शांता से पूछती है,
हुमा: क्या आज तुम्हारा जन्मदिन है?
शांता: हाँ दीदी मगर आपको कैसे पता चला?
हुमा: आखिर मुझे क्यों नहीं बताया?
शांता: वो दीदी साहब ने बोला था किसी को मत बताना। आज शाम को हम बाहर खाना खाने वाले हैं। और हाँ देखो साहब ने मुझे क्या तोहफा दिया।
शांता के डायमंड की रिंग निकालकर दिखाती है।
हुमा: ये कब दिया? अभी-अभी?
हुमा मन में: आज तक ना मुझे कोई तोहफा दिया मेरे जन्मदिन पर और ना ही कहीं ले गए। फिर से उसका मन उसके शौहर के खिलाफ कर दिया शांता ने।
असल में सैफ को वो पैसे बिजनेस के काम के लिए चाहिए थे और ना ही आज शांता का कोई बर्थडे था।
सब कुछ एक धोखा था।
हुमा: अरे पगली मुझे तो बता देती तुम्हारा बर्थडे है आज। मैं भी कुछ तोहफा लाती।
शांता: दीदी तुमने तो बहुत कुछ दिया है मुझे। और साहब ने क्या दिया तुमने क्या दिया बात एक ही है।
हुमा कुछ नहीं बोली मगर सैफ के लिए उसके दिल में जो थोड़ा सा प्यार जगा था वो भी खत्म हो गया था।
हुमा के अंदर जाने के बाद शांता ने सैफ को कॉल किया।
शांता: हेलो साहब आपसे बात करनी है।
सैफ: हाँ बोलो।
शांता: साहब आज मेरा जन्मदिन है।
सैफ: अरे वाह।
शांता: साहब आपसे कुछ माँगूँ।
सैफ: हाँ बोलो।
शांता: साहब आज बाहर खाना खाना है आपके साथ।
सैफ: आज… चलो तुमने पहली बार कुछ माँगा है तो आज चलते हैं।
शांता: धन्यवाद साहब।
सैफ: और हाँ हैप्पी बर्थडे।
शांता की चाल चल चली जा रही थी।
सैफ का फोन हुमा को आता है। वो कहता है कि आज वो बाहर खाना खाकर आएगा।
हुमा समझ गई मगर उसने कहा कुछ नहीं।
आज का दिन भी बीत गया और शांता और मिश्रा की कामिनी चाल फिर कामयाब हो गई थी।
कुछ दिनों बाद हुमा और मिश्रा की चुदाई हो चुकी थी और हुमा सलवार और ब्रा में मिश्रा की बाहों में थी।
हुमा: आपसे एक बात कहूँ।
मिश्रा: हाँ बोलो मेरी जान।
हुमा: पहले बोलो आप कि आप हाँ बोलोगे।
मिश्रा: तुम्हारी बात मैं कैसे टाल सकता हूँ जान।
हुमा: मुझे आपका गाँव देखना है। मैंने लाइफ में कभी गाँव नहीं देखा है। प्लीज।
मिश्रा: मगर वो… वो मेरी बीवी और बेटे को क्या बोलेंगे?
हुमा: मैं सोच रही थी क्यों ना शांता को साथ ले लें तो ना सैफ को कोई शक होगा ना आपके बीवी-बेटे को।
मिश्रा फँस गया था। उसकी हालत खराब हो गई थी।
मिश्रा: वो… वो ठीक है मैं कुछ करता हूँ। मगर मेरी बीवी और बेटा बहुत…
हुमा: हाँ जानती हूँ वो बहुत खडूस टाइप है राइट।
मिश्रा: हाँ।
कुछ देर बाद हुमा चली जाती है मगर मिश्रा का टेंशन बढ़ गया था। उसको शांता की याद आती है। उसको पता था हर मुश्किल से यही निकलती है। अभी भी यही काम आएगी।
मिश्रा: हेलो शांता।
शांता: हाँ बोलो।
मिश्रा: गड़बड़ हो गई यार।
शांता: क्या हुआ बताओ भी।
मिश्रा सब बात बताता है।
शांता: बस इतनी सी बात? हो जाएगा मगर।
मिश्रा: हाँ तुझे अलग से पैसे दूँगा ठीक है।
शांता: ठीक है। तू फिर जहाँ मैं बोलती हूँ वहाँ आ जा 1 घंटे में।
1 घंटे बाद एक छोटे से घर में शांता और मिश्रा बैठे थे। वो घर नाटक मंडली में काम करने वाले कलाकारों का था।
वहाँ एक औरत और उसका बेटा रहते थे जो नाटक में काम करते थे।
शांता उनको सब समझाती है।
औरत: देखो बाबा तुम्हारा काम लफड़े का लगता है। किसी को पता लग गया तो…
शांता: कुछ नहीं होगा। कौन से बैंक लूटने को बोल रहे तुमको। बस सिर्फ एक्टिंग करो एक खडूस औरत की।
लड़का: माँ कोरोना की वजह से कोई काम भी तो नहीं है। जो भी हो कर लेते हैं।

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Hello komal