विदेशी बहुरानी – 2

Ek bade ghar ki Bahu ki hindi sex story:- तरुण घर लौट के आया है पर अकेला नहीं, अपनी प्रेमिका और होने वाली बीवी की साथ। हवेली के बरामदे में तरुण का पूरा परिवार खड़ा है सिर्फ उसके पिताजी रुद्रनाथ को छोड़ के। सब बहुत खुश है के उनका कुल दीपक लौट आया है। पर एक इंसान की नज़र तरुण पे नहीं। तरुण का हाथ पकड़ के आती हुई उस अप्सरा पर है।

Part 1 ==> विदेशी बहुरानी – 1

Ek bade ghar ki Bahu ki hindi sex story

उफ्फफ्फ्फ़ कितनी खूबसूरत है यह। दूध जैसी गोरी। वैसे तो विदेशी लड़की गोरी होती ही है पर यह तो जैसे गुलाबी है। सुनहरी लम्बे ज़ुल्फ़ें और उसके ऊपर ऐसी खतरनाक रूप और नीली आंखें। न चाहते हुए भी तरुण के दादा यानि बड़े भाई राजेन्द्रनाथ की धोती के अंदर कुछ कुछ हलचल होने लगता है। वैसे तो पिताजी के सामने हमेशा वह चुपचाप रहता है पर असल में उसका रूप एकदम अलग है। वह बहुत ही ठरकी और लालची इंसान है। शायद यह गुण भी उसको अपने महान पिताजी से ही मिला है। अपने समय में रुद्रनाथ भी कुछ काम नहीं थे।

अपने पिताजी का उस रूप के बारें में राजेंद्र को भी पता था। कई बार वह देख भी चुका है अपने पिता को घर की नौकरानी के साथ। बचपन में जिस बात से राजेंद्र को डर लगता था। उम्र बढ़ने के साथ साथ उसके अंदर भी परिवर्तन आने लगा और वही डर आकर्षण में बदल गया। और आकर्षण एक दिन हवस में। बिलकुल पिता के जैसे ही कामुक पुरुष बन गए घर के बड़े पुत्र। हां शायद अत्याचारी हिंसक स्वभाव का नहीं है। कभी गरीब पे अत्याचार नहीं किया। पिताजी के डर से इस गाँव में नहीं, लेकिन दूसरे गाँव के बहुत लड़किओं को भोग कर चुका है। कोलकाता जाकर वहा के मेहेंगी कोठी जाकर भी ऐश कर चुका है। इसलिए औरत का जिस्म उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन आज अपने भाई के साथ एक ऐसी विदेशी लड़की देखकर वह अपनी आँखें को उससे हटा नहीं पा रहा है।

क्या है यह? उफ्फ्फ्फ़ कोई इतनी खूबसूरत कैसे हो सकती है? वाइट गाउन और फॉरेन लम्बी टोपी पहनी है वाह। भाई के जितनी ही लगभग लम्बी है। शायद इस घर की। नहीं नहीं। इस पूरी गाँव में इतनी लम्बी औरत नहीं होगी। शायद शहर में भी मुश्किल से मिलेगी। और मिल भी गयी। क्या वह इतनी हसीन होगी? असंभव!

कमला अपने बेटे को देखकर बहुत खुश होती है। तरुण अपनी माँ के पास आकर पैर छूके प्रणाम करता है। और फिर अपनी माँ से अपने प्यार का परिचय करता है।

तरुण – माताजी। कैसी हो आप? अरे हां। यह है रेबेका। मैं इससे।

कमला – क्या? रे। रेबेका कमला मुस्कुराके बोलती है।

रेबेका – आई एम रेबेका कार्टर। नमस्ते। माँ जी।

ये बोल के रेबेका कमला के पैर छूती है। तरुण वहां रहते ही उसे अपने कल्चर के बारें में पहले ही बहुत कुछ बता और सीखा दिया था। अब तो रेबेका बंगाली और हिंदी भी बोलती है आराम से। कब क्या करना चाहिए वह लगभग जान चुकी थी।

कमला खुश होकर – जीती रहो बेटी। वाह्ह्। कितनी प्यारी है मेरी बहु। और इतनी लम्बी! देखो तो! आओ बहु। अपनी ससुराल के बाकी लोगों से मिलो। यह तुम्हारे जेठ है।

रेबेका – जी। जेठजी? व्हाट?

तरुण- बरोथेर इन लॉ। माय बिग ब्रदर।

रेबेका – ओह या जेठजी”

ये बोलके मुस्कुराकर वह राजेन्द्रनाथ के पास आकर “नमस्ते दादा” बोलके पैर छूने के लिए नीचे झुकती है। और जैसे ही वह झुकती है। राजेन्द्रनाथ की नज़र सीधा जाता है रेबेका के ड्रेस से झलक देती हुई क्लीवेज के तरफ। झुकने के कारण राजेन्द्र रेबेका की क्लीवेज अच्छे से देख पाता है। राजेन्द्रनाथ शायद ऐसे कुछ देखना चाहते नहीं थे, पर जब ऐसा मौका आँखों के सामने आ गया तो खुद को रोक ना पाए। वह दृश्य देखकर खुद को कैसे कण्ट्रोल कर रहा था, सिर्फ वह ही जानता था। पहले तो सोचा था तरुण के आने के बाद उसको बहुत डाँटेगा। पर रेबेका को देखने के बाद सब गड़बड़ हो गया था।

रेबेका इसके बाद राजेंद्र की बीवी रेवती से मिली। रेवती उसको गले लगा के बोली – वाह देवरजी। ढूंढ ढूंढ के क्या खजाना खोज लाये हो। कितनी प्यारी है यह। आओ। मैं तुम्हारी जेठानी।

रेबेका – व्हाट? जेठ। जेठानी? मीन्स?

तरुण – शी इस योर जेठानी। टोल्ड यू न। शी इस माय ब्रदर्स वाइफ। यू कॉल हर दीदी। तुम दीदी बोलना।

रेबेका – ओके।नमस्ते दीदी।

रेवती – नमस्ते। अरे वाह। तुम तो बहुत अच्छी हिंदी बोलती हो। बंगाली भी जानती हो?

रेबेका – हाँ। एक्ठु। एक्ठु। तोमर देवर सिखिएचे (थोड़ा थोड़ा। तुम्हारा देवरजी ने सिखाया है)

कमला – और यह है तुम्हारा छोटा देवर। अनिमेष।

अनिमेष छोटा था सबसे। इसलिए खुद जाकर अपनी होने वाली भाभी को प्रणाम करता है।

रेबेका – ओह्ह्ह। तुम कितना स्वीट है अनिमेष। तुम मेरा भाई जैसा है। माय लिल ब्रदर।

कमला। आओ बहु। अंदर चलो।

तरुण- माता जी। अभी तक आपकी बहु हुई नहीं है। अभी बाकी है। उसी के लिए तो लाया हूं इसे।

कमला- अरे हुई नहीं तो क्या? जल्द हो जाएगी। मेरी दूसरी बहु होने वाली है यह। पूरा गाँव को सजा दूंगी रौशनी से। लेकिन बेटा।

तरुण- लेकिन क्या माँ? और पिताजी कहाँ है?

राजेंद्र – अंदर चल। सब बताता हु।

राजेन्द्रनाथ तरुण को सब बताता है के उनके पिताजी बिलकुल भी राज़ी नहीं है इस शादी के लिए। तरुण भी कुछ ऐसा ही सोचा था। वह जानते थे के पिताजी शायद राज़ी नहीं होंगे। इसलिए एक डर था। पर उसकी माँ को राज़ी देखकर थोड़ा भरोसा आया है। कम से कम माताजी को तो कोई प्रॉब्लम नहीं है।

तरुण- लेकिन माँ। अब क्या होगा? मैं रेबेका के साथ कहाँ रहूँगा? पिताजी के आदेश अनुसार हम दोनों तो यहाँ नहीं रहे सकते। और मैं रेबेका को छोड़ने को सोच भी नहीं सकता हु।

कमला- बेटा। तू चिंता मत कर। मैंने तेरे पिताजी को समझाया है। उन्होंने तुम दोनों के शादी को मान लिया है। पर अभी तुम दोनों को यहाँ रहने देने को राज़ी नहीं है। थोड़ा गुस्से में है वह। तू तो जानता है अपने पिताजी का गुस्सा। तू अब हमारे दूसरे हवेली जो गाँव के जंगल के पास नदी के पास है वही रहेगा बहु के साथ। तू और बहु वहां अभी आराम से वहीँ पे रहना। तू चिंता मत कर। जैसे तेरे पिताजी शादी के लिए मान गए। वैसे ही तुम दोनों को भी एक दिन अपना ही लेंगे। मैं सब ठीक कर दूंगी। बहु को हम तब यहाँ ले आएंगे।

राजेन्द्रनाथ – हां भाई। तू फिकर मत कर। मैंने उस हवेली को साफ़ करने के लिए नौकरो को भेज दिया है। कोई परेशानी नहीं होगी तुमको वहां और हम तो है ही।

तरुण – ठीक है। जो आप लोगों को सही लगे।

रेबेका – ओके मदर। थैंक यू सो मच।

कमला – हँ? बेटा तुम क्या बोली कुछ समझ नहीं आया।

तरुण- यह आपको धन्यवाद कह रही है।

रेबेका – हाँ। माताजी। आपको ध ध धन्यबाद!

उसकी टूटी फूटी हिंदी सुनके सब हंस देते है। तरुण की माँ अपनी होने वाली बहु के माथे को चूमती है। लेकिन रेवती अपने पती की बातों से हैरान हो रही थी। क्यूंकि जब तक तरुण आया नहीं था, तब तक तो उसका पती भी ससुर जी के तरह गुस्से में था। वह भी तरुण के इस डिसिशन के खिलाफ था और अब वह अलग ही सुर में बात कर रहा है। अचनाक क्या हुआ? खैर। अच्छा ही है। लेकिन रेवती नहीं जानती थी के उसका पती क्यों ऐसे बदल गया। क्यूंकि उसकी कामुक नज़र जो अपने ही भाई की खूबसूरत विदेशी प्रेमिका के ऊपर थी।

शायद खुद से अपने भाई के होने वाली पत्नी को लेकर गलत सोच कभी नहीं सोचता वह। लेकिन रेबेका की ख़ूबसूरती न चाहते हुए भी राजेन्द्रनाथ को मजबूर कर रही थी, गलत नज़र से उसको देखने को। मन ही मन में उसको लेकर कुछ अलग सोचने को। बार बार दूसरी नज़र से उसे घूरने को।

शादी को हुए आज 5 दिन हो गया था। हालांकि रुद्रनाथ को यह शादी बिलकुल भी मंज़ूर नहीं थी, पर अपने बेटे के शादी में कोई कमी नहीं रखा उन्होंने। धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ। गाँव के सब लोगों को खाना खिलाया गया। गाँव के बुजुर्ग, प्रधान सब आकार वर बधु को आशीर्वाद करके गए। इस शादी के वक़्त रुद्रनाथ अपने रीति रिवाज को पालन करने के इलावा मौजूद नहीं थे और ना ही रेबेका की परिवार से कोई आया। उसकी फॅमिली भी एक इंडियन से शादी के खिलाफ थी। पर रेबेका भी परिवार को छोड़ के तरुण के साथ इंडिया आ गयी थी।

वैसे भी उसके परिवार में माता पिता और बहन के इलावा कोई नहीं था। और उनका भी आपस में नहीं बनती है। इसलिए तरुण से मिलने के बाद रेबेका को खुशी से जीने का एक नया रास्ता मिला था। शादी के बाद अगले ही दिन दोनों यह हवेली छोड़ के वह दूसरी हवेली चले आए थे। इस हवेली को रुद्रनाथ के पिताजी ने आराम घर या आराम हवेली के तरह बनाया था। मतलब कभी कभी बिश्राम लेने के लिए या ज़िन्दगी का मज़ा लेने के लिए इस हवेली को इस्तेमाल किया जाता था।

न जाने कितनी औरतों के कामसुख का गवाह है यह आराम हवेली। कितनी औरतो अपनी यौवन को सामपित कर चुकी है इस जमींदार वंश के पुरुष के हाथों। बड़े जमींदार यानि तरुण के पिता रुद्रनाथ ही अपने युवा अबस्य में कई बैजी को यहाँ ले आते थे। नाच गाने से महल जमा देते थे सारे लड़कियां। और फिर रात को जमींदार और उनके दोस्त लोग आपजी अपनी भूख मिटाने के लिए उन औरतों को लेकर दरवाज़ा बंद करते थे। सारी रात महोत्सव चलता था हवस का। और आज इतने समय बाद उसी हवेली में उसी जमींदार की बहु को जाना पड़ा रहने के लिए। शायद यही होना था।

आराम हवेली, तरुण के पिताजी की हवेली यानि असली हवेली जहाँ तरुण पैदा और बड़ा हुआ। उसके जैसा उतना बड़ा नहीं है छोटा है। पर एक तरह से देखे तो किसी भी गरीब के घर के सामने तो वह एक महल ही होगा। 2 माली की खूबसूरत एक हवेली – बहुत ही खूबसूरत जगह पर बनाया गया हैं चारो तरफ हरियाली पेड़ पौधे और पीछे दूर एक तालाब। सारा दिन पंछियों की आवाज़े सुनाई देती है। बालकनी से गाँव का नज़ारा दिखता है। बहुत ही शांति है उस जगह में। हालाकि बहुत दिनों से इस्तेमाल नहीं होता था। लेकिन राजेंद्र के हुकुम के अनुसार सब नौकर लोग इस हवेली को एकदम साफ़ सुथरा करके रहने लायक बनाके गए थे।

कमला देवी। मतलब तरुण की माँ और रेबेका की सासुमा सब बंदोवस्त करके राखी थी अपने बहु बेटे के लिए। बेटे बहु की देखभाल के लिए 24 घंटे के लिए 2 नौकर को भी रखे गए थे। वह 2 नौकर में से एक का नाम कांता था और दूसरा उसी का पति भोला। भोला घर का देखभाल करता था, बाजार से सामान लाना, घर का बाकी ज़रूरी काम कर देना और रात को पहरा भी देना और उसकी बीवी कांता रेबेका की यानि जमींदार बहुरानी की देखभाल करती थी। मतलब जमींदार बहु की दासी। वैसे भोला और कांता में उम्र का फरक बहुत था। उस ज़माने में ऐसा ही होता था। कांता लगभग रेबेका की उम्र की ही थी। गाँव की गरीब औरत होकर भी अच्छी खासी दिखती थी कांता और रेबेका मालकिन का पूरा ख्याल रखती थी।

इस हवेली के नीचे के एक घर में कांता और भोला का रहने का इंतेज़ाम किया गया था। वैसे तो बीच बीच में तरुण के परिवार के लोग जैसे कमला देवी, रेवती अपने बच्चो के साथ, छोटा देवर आकार घूम जाते थे और उनके साथ थोड़ा समय बिता के लौट जाते थे। लेकिन यह कभी कभी ही होता था। लेकिन रुद्रनाथ और उनका बड़ा बेटा राजेंद्र कभी नहीं आए इस घर में। एक तो गुस्से में और दूसरे शायद कुछ और बात के डर से आए नहीं। वैसे भी यह हवेली उस हवेली से बहुत दूर था। एकदम नदी के बाजु में। इसलिए हर रोज़ खबर ले पाना मुश्किल था। इसलिए कमला देवी भोला और कांता को पूरे समय के लिए नयी बहुरानी के लिए रख कर गयी थी।

तरुण भी अपना स्टडी डिग्री कम्पलीट करके एक डॉक्टर बन चुका था। और गाँव के हॉस्पिटल को जॉइन कर चुका था। विदेश से पढ़के आया था वह, इसलिए गाँव के लोग भी खुश थे के उनका मालिक का बेटा इतना बड़ा डॉक्टर है तो अच्छा इलाज करेगा। देखते ही देखते तरुण भी अपनी ड्यूटी पे बिजी हो गया। रुद्रनाथ जमींदार होने के साथ साथ नमक का बिज़नेस भी करते थे। इस मामले में बहुत बार कोलकाता जाना पड़ता था राजेन्द्रनाथ को। कभी कभी व्यापार के लिए और भी बहुत जगह जाना पड़ता था उनको। इसी व्यापार के काम से बाहर घूम घूम के कोलकाता के बहुत सारी अश्लील जगह जाकर मज़ा करके लौटता था राजेन्द्रनाथ।

नयी नयी औरत के कमरे में घुसकर अपना झंडा गाड़ के लौट आता है। औरत के जिस्म का मज़ा लेना उसका शौक बन चुका था। जब भी किसी बेश्या के पास जाता था, राजेंद्र तो वह वेश्या भी खुश हो जाती थी। क्यूंकी मालिक बहुत इनाम देते थे और उसके ऊपर जो मज़ा देते थे राजेन्द्रनाथ जी पूरी तरह बावली हो जाती थी। हवस का ऐसा नंगा नाच होता था के वह औरत ठीक से चल भी नहीं पाती थी अगले दिन। हवस का पुजारी जमींदार राजेन्द्रनाथ सारी रात उस बेश्या को पूरा निचोड़ लेता था। एक तो हवस का भूखा ऊपर से उसका 9 इंच का लम्बा मोटा लंड। जो किसी भी औरत के मुँह से चीख निकाल दे।

इस मामले में वह पूरा अपने दादाजी पे गया था। उसके दादाजी भी खतरनाक थे, हवस के मामले में। जितना अत्याचारी उतना ही हवसी। यह भी सुनने को मिलता है के उस इंसान ने तो अपने भाई के बीवी तक को अपना बना लिया था। राजेंद्र के दादाजी यानि रुद्रनाथ के पिताजी का प्रकोप इतना था, के कोई कुछ बोलने की हिम्मत भी नहीं करते थे। गाँव के कई औरतो के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना चुके थे। यहाँ तक की इतना खतरनाक थे वह के गाँव के किसी प्रजा को यानि घर के मरद को बाहर बिठा के उसीके बीवी के साथ समय बिताकर आते थे।

पती अंदर से बीवी की और जमींदार जी की हवस से भरी आवाज़ें सुनकर भी कुछ कर नहीं पाता था। क्यूंकि इसका अंजाम उसको पता होता था। आखिर में जमींदार साहब का जब मज़ा लेना हो जाता था तब उस औरत को महेगी इनाम देकर बाहर आकर पती के हाथों मे कुछ पैसा देकर लौट जाता था। ऐसे कई घर की औरतो को वह जमींदार अपना शिकार बना चुका था। और वही गुण राजेन्द्रनाथ को वंश परंपरा से मिला था। बिना औरत को चोदे वह ज़्यादा दिन रह ही नहीं पाता है। चाहे बाहर की हो या अपनी बीवी।

घर पे पत्नी को भी मज़ा देता है। रेवती मतलब राजेन्द्रनाथ की पत्नी अच्छे से जानती है के उसका पति और भी औरतों के साथ शारीरिक मिलन करते है पर कभी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। उस जमींदार समय में कोई भी पत्नी ऊंची आवाज़ में पति से बात करने के बारें में सोच भी नहीं सकती थी। इसलिए वह सब जानकार भी चुप रहती थी। और दूसरी वजह थी के रात को राजेन्द्रनाथ रेवती को ऐसा कामसुख देता था के रेवती पति के गलत काम सब भूल जाती थी और पति के उस तगड़े लंड के मज़े में खो जाती थी। रेवती इस बात से खुश थी के उसका पति एक तगड़ा मर्द है जो उसकी जिस्म की भूख को पूरा मिटा देता है।

एक मर्द को ऐसा ही तो होना चाहिए। और ऐसा मर्द के भूख कभी एक औरत से मिट नहीं सकती ये भी रेवती जानती थी। इसलिए कभी पति का विरोध नहीं किया। शायद इसलिए उनका सांसारिक जीवन खुशहाल था। राजेन्द्रनाथ भी अपनी पत्नी को हर सुख दिए थे। साड़ी गहने से लेकर औरत का सुख सब। शुरू शुरू में जब भी मौका मिलता था वह अपने पत्नी रेवती के साथ काम क्रिया शुरू कर देता था। यहाँ तक की जहाँ भी पत्नी को अकेली पाता था वही पे। एकबार तो स्नानघर से लौटके आते हुए उसके पति ने उसको फिरसे स्नानघर के अंदर ले जाकर शुरू हो गए थे।

अपनी बीवी का पानी से भीगा हुआ साड़ी में लिपटा जिस्म देखकर वह खुद को रोक नहीं पाए थे। रेवती भी जानती थी ऐसे मर्द को रुकने को बोलने का कोई मतलब नहीं है, इसलिए वह भी जो होता है होने देती थी। शुरू में बहाना करती थी, पति को रोकने का। पर पति का मोटा लम्बा ज़मींदारी लंड अंदर जाते ही सारा बहाना गायब हो जाता था और पति पत्नी काम क्रिया के सुख में डूब कर खो जाते थे। जब तक मुन्ना जन्म नहीं लिया था, तब तो हर रात दोनों की सुहागरात होती थी। पति का सम्पूर्ण हवस अपनी बीवी पे निकालता था।

घर की बड़ी बहु जो दिनभर जमींदार घर की बहु होकर रहती थी। रात को जैसे अपने ही पति की वेश्या बन जाती थी। ऐसे तगड़े मर्द को सुख देना और उनसे सुख लेना यही होता था उसका उद्देश्य। कई बार जब कमला देवी को रात को हल्का होने के लिए बाहर निकलके बाथरूम के तरफ जाना पड़ता था, तब उन्होंने भी ऊपर के फ्लोर से अपनी बहु की आवाज़ें सुनी है। रात के सन्नाटे में प्यारी बहु रानी की आवाज़ें सुनकर कमला देवी के चेहरे पे हल्का मुस्कान खिल उठता था। मन ही मन सोचती थी- बेचारी बहु का पता नहीं क्या हाल कर रहा होगा मेरा बेटा। बिलकुल अपने बाप पे गया है। अपने उम्र में वह भी तो ऐसे ही मुझे।

ऐसे ही एक रात को राजेन्द्रनाथ अपने कमरे में लेटा हुआ है। लेकिन नींद नहीं आ रही उसे। दिमाग में एक चेहरा आ रहा है। वही चेहरा जो एकदिन देखकर उसका दिमाग घूम गया था। रेबेका। इस घर की मझली बहु और अपने ही भाई की बीवी। वैसे तो राजेन्द्रनाथ कितना भी औरत का हवसी हो लेकिन कभी नहीं सोचा था के खुदके भाई के पत्नी पर गन्दी नज़र डालेगा। पर जब भाई की बीवी ऐसी असाधारण खूबसूरत हो तो राजेंद्र जैसा मर्द कैसे रोक पायेगा खुद को? लेकिन अपनी हवस को वह बस खुदके दिमाग तक ही सीमित रक्खा था। बस उसका शरीर ही जानता था के भाई की पत्नी के लिए कैसे गरम हो जाता है वह।

जैसे इस वक्त हो चुका था। धोती में तम्बू बन गया है। उफ्फफ्फ्फ़ बार बार लगातार वही फिरंगी बहु का चेहरा दिमाग में आता है और यही हाल हो जाता है धोती में। राजेन्द्रनाथ एक बार बाजु में देखा। रेवती अपने बेटे को लेकर गहरी नींद में सोई है। राजेन्द्रनाथ बिस्तर से उठा और आहिस्ते से नीचे उतरा। अब इस तम्बू को शांत तो करना पड़ेगा, वर्ना नींद नहीं आएगी। एकबार जाग जाये तो बहुत तड़पाता है यह डंडा। धीरे से दरवाज़ा खोलके बरामदे में आया राजेंद्र। रात के 12 बज रहे है। उस टाइम पे रात के 12 मतलब घनी रात। सब सो जाते थे 9 बजे तक।

राजेंद्र ने सोचा बाथरूम जाकर इस भूखे लंड को हिलाकर लंड को शांत करेगा। चाहता तो अपनी पत्नी को जगा कर अपना औरत की जिस्म की भूख मिटा सकता था, पर थोड़े ही दिन पहले अपनी पत्नी को ऐसे ही रात में कामसुख देते हुए अपने बेटे को जगा दिया था। गलती बेटे की नहीं थी। हवा के नशे में चूर होकर दोनों जैसे लगाम तोड़ दिए थे। छोटा मुन्ना अपने माँ बाप के अश्लील हरकतों से जाग के रोने लगा था। किसी तरह उसको रेवती ने शांत कराया था। वैसे भी आज जैसे अपनी पत्नी के साथ कुछ करने का इच्छा नहीं हो रही थी।

ऐसा नहीं के रेवती में कोई कमी है। अगर होती तो इस हवेली की बड़ी बहु थोड़ी बन पाती? रंग रूप और काम से सर्वगुण सम्पन्न है बड़ी बहु। सासु माँ की और ससुर की भी सेवा करती है। रुद्रनाथ तो अपने तरुण के लिए एक ऐसी ही पत्नी और घर की दूसरी बहु लाना चाहता था पर सब गड़बड़ कर दी उसने। ऊपर से ऐसी फिरंगी को ले आयी जिसको देखने के बाद से राजेंद्र के दिमाग से उसका चेहरा जा ही नहीं रहा। राजेंद्र दूसरे फ्लोर से नीचे उतरने लगा। नीचे आकर राजेन्द्रनाथ घर के स्नानघर के बाजु में बाथरूम के तरफ जा ही रहा था के तभी उसके हवसी दिमाग में एक शैतानी आईडिया आया।

क्यों इस लंड के ताज़ा रस को बाथरूम जाकर ऐसे ही नष्ट करू? उससे अच्छा है इस माल को सही जगह डाला जाये। लंड का असली जगह। जहाँ घुसने के लिए हर लंड तड़पता है। औरत की योनि। राजेन्द्रनाथ एक शैतानी मुस्कान देते हुए अपनी लंड को रगरते हुए सीधा हवेली के पीछे के तरफ जाने लगा। उस तरफ हवेली में काम करने वाले नौकर लोगों का कमरा है। हवेली के पीछे से थोड़ा ही दूर एक घर, जो हवेली का ही हिस्सा है वहां बिंदु अपने बहु बेटे और पोते के साथ रहती है। बिंदु बहुत साल से इस हवेली में काम करती है। उसके बेटे का अभी 3 साल पहले ही शादी हुआ था। तब से बहु बेटे को लेकर यही रहती है।

उसकी बहु चंपा भी हवेली के देखभाल में अपनी सासु माँ का हाथ बँटाती है। और बिंदु का बेटा राजू जमींदार के बिजनस में, राजेन्द्रनाथ का हेल्पर कम नौकर है। लेकिन अभी इस वक्त राजू या बिंदु कोई नहीं है। बिंदु को लेकर उसका बेटा सहर गया है बिंदु को डॉक्टर दिखाने। बिंदु के पैर के हड्डी में कुछ प्रोब्लेम्स आयी है तो राजू माँ को लेकर कोलकाता गया है, 2 दिन हुए। अभी सिर्फ चंपा और उसका छोटा बच्चा ही है घर पे।

राजेन्द्रनाथ बिंदु के घर के पास पहुँचता है। जो होने वाला है वह सोचकर ही उसका लंड उत्तेजना से उछल रहा है। अरे वाहहह!! खिड़की खुली है। राजेन्द्रनाथ खिड़की से झांकता है। घर के अंदर एक टेबल पे मोमबत्ती जल रही थी, जो कभी भी बुझ सकती है। उसी मोमबत्ती की रौशनी में राजेन्द्रनाथ ने देखा नीचे एक जवान औरत सो रही है। बाजु में उसका बेटा सो रहा है। उफ्फ्फफ्फ्फ़। नींद के कारण चंपा की साड़ी घुटनो तक उठ गयी है। वैसे तो चंपा गोरी नहीं है पर काली भी नहीं है। लेकिन अभी वह सब देखने का हालत में नहीं है राजेन्द्रनाथ। अब उसको अपनी लंड शांत करने के लिए एक चूत चाहिए। और चूत सामने है। ऊपर से बिंदु की बहु को ऐसे सोया हुआ देखकर तो कपड़े के अंदर का हिस्सा और गरम हो गया जमींदार बेटे का।

कुछ देर तक वही चुपचाप खड़ा होकर धोती के ऊपर से अपना गुप्तांग दबाते हुए लालची नज़रो से उसको घूरता रहता है। यह भी अलग उत्तेजना जगाता है उसमे। अह्ह्ह्हह गाँव की औरत की रात की ख़ूबसूरती का जैसे कोई जवाब नहीं। वह विदेशी बहुरानी के लिए हवस तो अपनी जगह था ही पर अपने देसी औरतों के लिए राजेंद्र अलग ही ठरकी था। घुटनो तक उठी हुई साड़ी से नंगी टांग बाहर निकली हुई देखकर जैसे उसके मुँह में पानी आ रहा था।

नहीं। अब और नहीं इंतज़ार कर सकता है वह! अब उसको वही करना है जिसके लिए आया है। दरवाज़े पे नॉक होता है ठक। ठक। ठक। चंपा की नींद खुल जाती है। वह अकेली है। अभी न ही सास है और नहीं पति। वह थोड़ा डर के पूछती है – क। क। कौन?

बहार से मर्दानी आवाज़ आती है – मैं हूँ राजेन्द्रनाथ!!

अरे!! मालिक इस वक्त? यहाँ?

चंपा उठके तुरंत दरवाजा खोलती है और देखती है उसके घर के बाहर उसके मालिक लम्बा हट्टा कट्टा राजेन्द्रनाथ खड़ा है।

मालिक को देखके चंपा अपनी घूंघट डालके पूछती है – मालिक आप यहाँ। इस वक्त।

जवाब में राजेन्द्रनाथ एक मुस्कान देता है। एक शैतानी मुस्कान।

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