किस किस को प्यार करूँ 1

Ek pariwar me chudai ki hindi kahani:- ये कहानी शुरू होती है नॉर्थ ईस्ट जम्मू के छोटे से गाँव से। जहाँ एक शख़्स जिसका नाम था शेर शाह, एक दबंग शख़्स थे। इनकी 3-4 गाँव में पहुँच थी और वो हमारे गाँव के मुखिया थे। इसलिए उनका पूरे गाँव में इज्ज़त करते थे। गाँव की कुल आबादी हज़ारों की थी उस समय।

मेरे पिता की एक बड़ी हवेली थी, कई बीघा ज़मीन और एक पहाड़ी ज़मीन थी जहाँ कई सारे पौधे और जड़ी-बूटियाँ लगाए गए थे। पहाड़ी ज़मीन क़रीब 3 एकड़ के वर्ग में फैला हुआ था। उस पहाड़ से एक झील बहती थी जो पूरे गाँव के लोगों की प्यास बुझाती थी और जायदाद की कोई कमी नहीं थी। मेरे पिता जब तक इस दुनिया में थे तब तक लोग खुशहाल जीवन जी रहे थे। हर तरफ़ खुशहाली छाई हुई थी।

Ek pariwar me chudai ki hindi sex story

मेरी माँ बहुत ग़रीब विधवा थीं और उनके माँ-बाप नहीं थे। इसलिए शेर शाह उन्हें ले आए अपने घर और उन्हें खेतों में काम दिया। और शेर शाह एक दिन नशे में माँ के साथ सो गए जिसका पछतावा उन्हें सुबह हुआ। जब वो उठे तब तक बहुत देर हो चुका था। इसलिए सोचे कि अगर माँ ने किसी को कुछ बता दिया तो उनकी बदनामी हो सकती है। इसलिए शेर शाह ने मेरी माँ से निकाह किया और उन्हें अपने घर से 500 मीटर दूर पक्का घर दे दिया क्योंकि उनकी पहली बीवी को ये रिश्ता मंज़ूर नहीं था।

ऐसे ही समय बीतता गया और कुछ सालों बाद मैं पैदा हुआ। और मुझे देखकर दाई माँ ने बोला – “दूसरे शेर शाह पैदा हुए हैं।” और मेरे पिता ये सुनकर बहुत ख़ुश हुए।

जब मैं हुआ तो मेरे पिता ने अपने घर ले आए। बोले – “मेरा ख़ून है तो बाहर क्यों रहेगा?” लेकिन बड़ी माँ उन्हें ख़ुशी नहीं हुई। उन्हें लगा कि अब हिस्सा करना होगा दौलत का।

मेरी माँ को वो नौकरानी की तरह काम करवातीं अपनी हवेली में और जो बचा-खुचा खाना होता वो मुझे लाकर खिला देतीं। ऐसे ही समय गुज़रता गया और जब मैं 13 साल का था तभी मेरी माँ का इंतकाल हो गया बीमारी से।

कुछ सालों में मेरे पिता और पहली माँ का भी रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई। अब मैं अकेला हो चुका था। कोई पूछने वाला नहीं था। मेरे सौतेले भाई लोग खेतों में मुझे भेजकर नौकरों की तरह काम करवाने लगे। और वहाँ जो काम करते वो बोलते –

शम्भू काका: मालिक आप हम सबके साथ क्यों काम करते हैं?

उनकी बातों को सुनकर बोला –

मैं: आप लोग तो जानते हैं मैं इस घर का सौतेला बेटा हूँ।

शम्भू काका: लेकिन ख़ून तो आप शेर शाह मालिक का ही है। फिर ये लोग नौकरों की तरह क्यों पेश आते हैं मालिक? आप जाओ यहाँ से। हम कर लेंगे आपका भी काम।

मैं: शम्भू चाचा आपकी उम्र ज़्यादा है। आप आराम करें। मैं अपना काम कर लूँगा। आप चिंता न करें।

मैं कुछ अपने पर्सनैलिटी के बारे में बता देता हूँ। मैं अपने पिता के ऊपर गया था। मेरी लंबाई लगभग 6 फ़ुट 5 इंच की है और मैं कुछ ख़ास नहीं दिखता। न ज़्यादा गोरा और न ज़्यादा काला। एवरेज कलर है स्किन का। लेकिन एक चीज़ ऊपर वाले ने मुझे नवाज़ा है वो है लंड। उसकी लंबाई आम इंसानों से भी ज़्यादा बड़ी है – क़रीब 16 इंच लंबा और 5 से 6 इंच मोटा। इतना लंबा और मोटा कैसे हुआ वो आपको आगे की स्टोरीज़ में पता चलेगा। और गाँव के लोग मुझे एक दानव की तरह ही समझते हैं और मेरा शरीर थोड़ी बॉडीबिल्डर की तरह है।

अपने खेतों में काम कर-करके मैं बिल्कुल पक्का हो चुका हूँ और न मुझे मार से फ़र्क़ पड़ता है न किसी ज़ख्म से। ऊपर वाले ने इतने ज़ख्म दे दिए हैं कि मुझे सहने की आदत हो चुकी है। और मेरे भाई लोग उतना ध्यान नहीं देते थे। मेरे माँ-बाप के मरने के बाद से ही मैं जैसे अनाथ सा हो गया था और खेती-बाड़ी में मुझे लगा दिया गया था। मेरी पढ़ाई-लिखाई भी उन्होंने छुड़वा दी थी। मैं 10वीं तक ही पढ़ पाया था गाँव के गवर्नमेंट कॉलेज से। और मेरी लाइफ़ नर्क से भी बदतर बना दी थी मेरे भाइयों ने और नौकर की तरह ट्रीट करते थे लेकिन मुझे अब आदत सी हो चुकी थी।

मेरे दोनों भाइयों के बेटे शहर पढ़ाई करने गए हुए थे और उनकी बेटियाँ 10वीं तक पढ़ाई करवा के घर पर बैठा दी थीं क्योंकि उस समय लड़कियों को ज़्यादा पढ़ाई नहीं करवाई जाती थी और वैसे भी गाँव में बस 10वीं तक ही कॉलेज होती थी। और मैं रोज़ रात को सोते हुए बस यही दुआ करता था कि हे ऊपर वाले मुझे अपने पास बुला ले। मैं ऊब चुका हूँ इस संसार से और मैंने क्या गुनाह किया है जो इस जन्म में मुझे इतनी बदतर ज़िंदगी मिली है।

यही सब सोचके मेरा दिमाग़ भी ख़राब होने लगा और अब कोई मतलब भी ज़्यादा नहीं रखता था अपने घरवालों से। बस अब घर से खेत और खेत से घर – सिर्फ़ यही चलता रहता था मेरा। ऐसे ही दिन गुज़रने लगे मेरे। और जब मैं ज़्यादा उदास हो जाता तो पहाड़ों पर निकल जाता जो मेरे घर से 2 किमी पर था और वहाँ जाके ख़ूब रोता और ऊपर वाले को कोसता…

तभी रोते हुए मेरी नज़र वहीं पहाड़ के खाई में कुछ दिखा – सुंदर सा नीले रंग का फूल। फिर सोचा नीचे उतर के मुझे देखना चाहिए। मैं पहाड़ से एक बरगद का पेड़ था उसकी जड़ें नीचे खाई तक जा रही थीं। फिर उसे पकड़के नीचे जाने लगा और बहुत मुश्किल से नीचे उतरा। और जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा एक गुफ़ा थी जिसमें मुश्किल से अंदर जाया जा सकता था वो भी लेटकर। और उस गुफ़ा से पानी की धार भी निकल रही थी और मुझे अंदर जाने में डर लग रहा था।

आख़िर अंदर कहीं कोई साँप-बिच्छू न हो लेकिन मैं हिम्मत करके अंदर जाने लगा। कुछ मीटर जाने के बाद मैंने देखा अंदर ब्लू कलर का 1 फूल है और बीच से पानी की धार नीचे गिर रही है। इतनी साफ़ पानी आज तक नहीं देखी। और मैं वहीं गुफ़ा के अंदर जाके फूल के पास बैठ गया और एक फूल को तोड़के सूंघने लगा। ये फूल शायद चमत्कारी था। सूंघते ही मेरे जिस्म में बदलाव आने लगे। मस्ती से मेरा शरीर मचलने लगा जिसका असर मेरे लिंग पर हुआ और मेरा लिंग इतना टाइट हुआ जितना पहले कभी नहीं हुआ था। फिर मैं सोचने लगा आख़िर ये कौन सा फूल है। और ऐसे ही सोचते हुए मैं वहीं गुफ़ा के अंदर बेहोश हो गया।

थोड़ी देर के बाद उठा तो देखा जो ब्लू फूल थे वो ग़ायब हो गए थे। बस कुछ फूल बचे थे लेकिन उनमें फूल की जगह फल थे जो अजीब से थे – पर्पल कलर और फल के चारों ओर हल्के काँटे लगे थे जैसे ड्रैगन फ्रूट होते हैं वैसे ही फल दिख रहे थे। मैंने सोचा ऊपर वाले ने मुझे ज़हर दिया है। इसे खाके अपना जीवन त्याग कर देता हूँ और मैं खाने लगा। लेकिन फल के उन काँटों की वजह से मेरा मुँह ख़ून से लाल हो गया। क़रीब आधा खाया ही था कि मैं वहीं फिर बेहोश हो गया…

क़रीब 2 घंटे बाद उठा तो मैंने सोचा ऊपर वाले भी मुझसे मज़ाक कर रहे क्योंकि मैं मरा नहीं। फिर मैं गुफ़ा में जो पानी था उसे पीने लगा। बहुत प्यास लगी थी। पानी एकदम मीठा। आज तक ऐसा पानी पूरी ज़िंदगी नहीं पिया था। पानी पीने के बाद मेरी भूख बढ़ गई। तभी बग़ल में जो फल आधा खाया था वो वहाँ पड़ा हुआ था। फिर उसे उठाके खाने लगा। इस बार मेरा मुँह नहीं छिला और जो पहले घाव बने थे इस फल को खाते हुए वो अब ठीक हो चुके थे। मैं देखके अचंभा में पड़ गया। भला इतनी जल्दी घाव कैसे ठीक हो गया और मेरे शरीर में अलग सा जोश था।

फिर थोड़ी देर के बाद मैं उस गुफ़ा से निकल गया और बरगद का झाड़ पकड़के ऊपर चढ़ने लगा। इस बार मुझे कोई तकलीफ़ नहीं हुई क्योंकि मेरा शरीर एकदम पत्थर की तरह हो गया था। थकान भी मुझे नहीं लग रही थी…

ऐसे ही सोचते हुए मैं ऊपर पहुँच गया और घर की तरफ़ जाने लगा। पहले मेरा दिमाग़ ज़्यादा अच्छी तरह नहीं चलता था लेकिन जब से गुफ़ा से बाहर यहाँ हूँ तब से मुझे दिमाग़ कंप्यूटर से भी ज़्यादा तेज़ चलने लगा। शायद उस चमत्कारी फूल और पानी पीने से मेरे शरीर में बदलाव आया हो। यही मन में सोच रहा था। मैं गुफ़ा में बहुत देर तक रहा। आज टाइम का पता भी नहीं चला क्योंकि शाम जो हो चुका था। वैसे भी मेरा कौन इंतज़ार करेगा। माँ और पिता तो हैं नहीं जो मेरे बारे में…

चिंता करेंगे। जब माँ थी तब मुझे किसी भी चीज़ की चिंता नहीं करने देती थीं। भले ही मेरे पिता हमसे अलग रहते थे लेकिन वो मुझे बहुत प्यार करते थे और मुझे कुछ न कुछ हवेली से मेरे लिए भेजवाते रहते थे खाने और पहनने के लिए। फिर मैं अपने टूटे-फूटे कच्चे मकान में पहुँचा जहाँ पहले यहाँ नौकर रहा करते थे। वही घर मुझे मिला था पापा के मरने के बाद। पहले भाइयों ने घर से क़रीब 500 मीटर दूर वाला मकान दे दिया था। उस मकान में सीमेंट वाला छत और दीवार पक्के थे जिसमें दो रूम, लैट-बाथ अटैच्ड थे और एक हॉल टाइप का बना हुआ था। और वही हॉल में एक लकड़ी वाला चूल्हा था जिसमें मैं ख़ुद खाना बनाता और खाता। फिर मैं भूखा ही अपने टूटे-फूटे घर की बिस्तर पर सो गया।

सुबह मैं हमेशा की तरह आज भी जल्दी उठ गया था और उठते ही सबसे पहले बाथरूम में फ़्रेश होने चला गया। अपनी आँखों को मलाते हुए मैंने जैसे ही अपने अंडरवियर नीचे करके अपने लंड को पेशाब करने के लिए पकड़ा तो मुझे एक ज़ोर का झटका लगा क्योंकि लिंग पर मेरे हाथ लगते ही मेरी सारी नींद एक पल में ही ग़ायब हो गई।

और जब मेरी नज़र अपने लिंग पर गई तो देखा वो सर उठाए खड़ा था और मैं अपने लंड को बड़े ही हैरानी से देख रहा था। और मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि एक ही रात में मेरा लंड इतना बड़ा कैसे हो गया। और मेरा लंड मेरे घुटने तक था – क़रीब 16 इंच और उसकी मोटाई ऐसी थी जैसे एक मोटी लौकी लटक रही हो और सुपड़ा ऐसे जैसे टेनिस बॉल हो। ये इतना भयानक और ख़तरनाक लंड मेरा कैसे हो गया। और मैं अपने लंड को बार-बार छूकर देख रहा था कि क्या ये सच है या कोई ख़्वाब।

और जब मुझको यक़ीन हो गया कि ये कोई सपना नहीं बल्कि हक़ीक़त है तो बहुत ही ख़ुश हो गया। और जब मेरी नज़र बाथरूम के शीशे पर गई तो देखा मेरा शरीर भी एकदम बॉडीबिल्डर की तरह हो गया था और मेरे पेट पर सिक्स पैक आ चुके थे। मेरे चेहरे पर एकदम रौनक थी। फिर उसके बाद मैं जल्दी से फ़्रेश हुआ और नहाया। आज मैं बहुत ख़ुश। फिर बाथरूम से बाहर आ गया…

आज मैं 18 का हुआ था और सुबह-सुबह मेरे पिता जी के वकील मेरे पास आए और मुझे पक्के घर में देखने के बाद बोले –

वकील: तुम यहाँ क्यों रहते हो? तुम शेर शाह के बेटे हो। तुम्हें तो हवेली के अंदर होना चाहिए। तुम्हारा हक़ बनता है उस हवेली पर। और अभी चलो मेरे साथ।

मैं: साहब मेरे भाई लोग घर में घुसने नहीं देते…

वकील: देखो समीर, तुम्हारा भी हक़ बराबर है हवेली और पूरी ज़मीन-जायदाद पर। ऐसा शेर शाह ने बिल में लिख के गए हैं। मैं कोई ग़लत बात नहीं बोल रहा हूँ।

मैं: वकील साहब मुझे पैसा और जायदाद की कोई लालच नहीं है। बस प्यार ही मिल जाए वही बहुत है मेरे लिए…

वकील: जैसा तुम कहो। लेकिन जब कोई भी तुम्हें यहाँ से और जायदाद से निकालने की कोशिश करे तो तुम मत निकलना क्योंकि तुम्हारा बराबर का हिस्सा है इस प्रॉपर्टी में।

मैं: अपने भाई और भाभियों से बहुत प्यार करता हूँ क्योंकि मेरी माँ ने कहा था इस घर के किसी से नफ़रत मत करना और मैं वही कर रहा हूँ।

इतनी बात सुन वकील साहब चले गए और मैं चारपाई पर लेट गया। ऐसे ही दिन मेरे बीतने लगे और इधर भाइयों की बेटियाँ जवान हो रही थीं और उनके शादी की बात चल रही थी क्योंकि गाँव में शादी जल्दी करवा दी जाती है।

एक लड़का मिला जो एक टीचर था गवर्नमेंट कॉलेज में। परिवार भी अच्छा था और बात चलने लगी। लेकिन लड़के वाले बोले –

लड़के वाले: मेरी बेटी की शादी नहीं हो रही है। साँवली है और दिमाग़ भी कम होने की वजह से 30 साल की हो गई है। जब तक इसकी शादी नहीं होगी तब तक बेटे की भी शादी नहीं करूँगा…

जुनैद भाई: बहन जी अगर मेरे भाई से आपकी लड़की की शादी करवा दें तो मेरा छोटा भाई पढ़ा-लिखा नहीं। बस खेती-बाड़ी करता है और जीवन चला रहा है…

लड़की वाले: मुझे कोई आपत्ति नहीं है। जैसा भी लड़का हो बस मेरी बेटी की निकाह हो जाए और कुछ नहीं चाहिए।

उसके बाद मेरी और मेरी भतीजी आफ़रीन की शादी फ़िक्स हो गई और डेट निकला 1 महीने बाद की। और मेरे घर के कुछ रिश्तेदारों को बुलाया गया जो बहुत क़रीब थे लेकिन ज़्यादा धूम-धाम से मेरी शादी नहीं हुई न ही आफ़रीन की।

सुहागरात की रात में बीच वाली इनायत भाभी मेरे कच्चे मकान में आईं और बोलीं –

इनायत भाभी: समीर चल पक्के मकान में। तेरे भाई ने ऊपर वाला गेट खुलवा दिया है। आज से तू वहीं रहेगा और तेरी बीवी को वहीं रूम में छोड़ दी हूँ…

ये सुनते ही मेरे आँखों में आँसू आ गए क्योंकि इतने सालों बाद मेरे बड़े भाई ने मेरे बारे में सोचा और अपने हवेली पर मुझे रहने का मौक़ा दिया। वैसे मैं चाहता तो ज़बरदस्ती घर में घुस जाता लेकिन मैं जानता था आज नहीं तो कल मेरे भाई मुझे मेरा हक़ देंगे…

मेरे पिता ने एक बड़ा हवेली बनवाई थी। ये 3 फ़्लोर का है और 1st फ़्लोर में 10 रूम्स और 2 बिग हॉल और 4 बड़ा रूम मेहमानों के लिए है। वेस्टर्न लुक लैट-बाथ सब रूम में अटैच्ड है और ऊपर 3rd फ़्लोर पर जाने के लिए दो सीढ़ियाँ हैं – एक बाहर से और एक अंदर से। 1st फ़्लोर पर बड़े भाई और मंझले भाई ही रहते हैं। 2nd फ़्लोर में दोनों भाइयों के बच्चे रहते हैं…

3rd फ़्लोर में अब मेरी एंट्री होती है लेकिन ऊपर वाले मंज़िल पर 3 बड़े रूम, वेस्टर्न लैट-बाथ और 1 स्टोर रूम ही बने थे।

जब मैं ऊपर रूम में पहुँचा तो देखा रज्जो लाल कलर की लहंगा में घूँघट डालके नीचे गद्दे पर बैठी हुई थी। वैसे उसे मैंने देखा ही नहीं था। भाई लोगों ने मेरी निकाह करवा दी थी और मैंने कुछ पूछा भी नहीं क्योंकि मैं अपने भाइयों की इज्ज़त जो करता था और उनके बात को पत्थर की लकीर समझता था। इधर जब मैं रज़िया के पास पहुँचा तो थोड़ा वो पीछे हटी तो मैं बोला –

मैं: डर क्यों रही हो मुझसे? मैं तुम्हारा शौहर हूँ।

मेरी आवाज़ को सुनके बाद उसके मुँह से सुरीली आवाज़ निकली –

रज़िया: अम्मी ने कहा है ज़्यादा बात मत करना और जो तेरा शौहर कहेगा वो करना…

मैं उसकी बात को सुनके वो लड़की को शायद कुछ नहीं पता था क्योंकि लड़कियाँ घर से कम ही बाहर निकलती हैं और निकलती भी हैं तो अपने भाई या माँ के साथ बाहर जाती हैं। इसलिए उसे दुनियादारी की समझ नहीं होती है। उनके सगी भाभी, मौसी या फिर सहेलियाँ ही सिखाती हैं। फिर मैं बिस्तर पर बैठा और मैंने घूँघट ऊपर करने ही वाला था कि तभी मेरा हाथ पकड़ लिया रज़िया ने। मैं उसकी तरफ़ देखा और बोला –

मैं: मेरा हाथ क्यों पकड़ी तुम तो…

रज़िया: पहले मेरा नेक दे फिर घूँघट उठेगा।

मैं: (स्माइल के साथ) अब ये किसने कह दिया?

तो वो बोली –

रज़िया: अम्मी ने।

मेरे पास तो कुछ नहीं है। मैं कमाता भी नहीं हूँ और बस खेती-बाड़ी करता हूँ और जो अनाज बेचके पैसे मिलते हैं वो बड़े भाई को देता हूँ। मेरी बातों को सुनके रज़िया बोली –

रज़िया: जो दिल करे आपका वो मुझे दे दे। मुझे पैसे नहीं चाहिए।

मैं उसकी बातों को सुनके मुझे बहुत ख़ुशी हुई और मैं सोचने लगा कि क्या दूँ। फिर याद आया कि अम्मी ने मरने से पहले मुझे एक अँगूठी दी थी और बोली थीं कि अपनी बहू को दूँगी लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हुआ। फिर मैं बिस्तर से उठा और बक्सा खोलके देखा तो कपड़े के किनारे एक छोटी सी डिब्बी में वो सोने की अँगूठी रखी हुई थी। लेके आया और बिस्तर पर बैठके उसकी मेहंदी लगी बाईं हाथ को पकड़ा तो वो शरमाते हुए अपना हाथ आगे बढ़ा दी। फिर मैंने अपने दाहिने हाथ से इस सोने की अँगूठी को पहना दिया और बोला –

मैं: ये माँ ने अपनी बहू के लिए सँभाल के रखी हुई थी। अब तुम इसे सँभाल के रखना। कहीं खो मत देना।

और वो ख़ुश हो गई। फिर मैंने अपने दोनों हाथों से उसका घूँघट ऊपर किया और देखते ही मुँह से निकला –

मैं: माशाल्लाह! क्या ख़ूबसूरत चेहरा है।

भले ही वो एवरेज कलर की थी लेकिन उसकी फेस एकदम मासूम सा। दिल ही दिल में मैं बहुत ख़ुश हुआ और मुझे ऐसे घूरता हुआ पाया तो रज़िया शरमाते हुए किलर वाली स्माइल दी। और उसकी स्माइल देखके मैं तो घायल सा गया। और फिर मैं उसके ग़ौर से देखने लगा तो पाया कि उसके रसीले होंठों पर डार्क लिपस्टिक लगी हुई और तीखी नज़र, सुराहीदार गर्दन। उफ़्फ़ क़यामत थी। मैंने आगे बढ़के उसके सर से घूँघट पूरा हटाया तो देखा सर पर मांग टीका और नाक में एक बड़ी सी नथनी। दोनों कानों में बड़े-बड़े झुमके। गले में हार एक चेन पहनी हुई थी। ये सब देखके उससे पूछा –

मैं: तुम्हें पता है सुहागरात में क्या होता है और क्या नहीं?

मेरी बात को सुनके रज़िया थोड़ा शर्माई और अपनी सुरीली आवाज़ में बोली –

रज़िया: हाँ मेरी बड़ी बाजी ने बताई है।

ये सुनके बोला –

मैं: तो क्या बताया है आपकी बड़ी बहन ने? मुझे भी बताओ क्योंकि मुझे तो पता ही नहीं है कि सुहागरात क्या होती है।

रज़िया: चल झूठे। लड़कों को तो हम लड़कियों से भी ज़्यादा पता होता है। मुझसे ज़्यादा चालाकी न करें आप…

उसकी बातों से मेरी हँसी निकल गई और बोला –

मैं: देखो आज तक मेरी लाइफ़ तुम्हारे सिवा कोई लड़की नहीं आई और न ही कभी किसी के साथ कुछ किया है। ये मेरा फ़र्स्ट टाइम है…

रज़िया: मेरा भी फ़र्स्ट टाइम है जी। और मुझे तो कोई लड़का पसंद भी नहीं करता था मेरे साँवले रंग की वजह से। और जो लड़का शादी के लिए मुझे देखने आता वो मुझे रिजेक्ट कर देता। और मैं इतनी उदास रहने लगी कि मेरा मानसिक संतुलन भी खो दिया। फिर दवा हुई तब जाके ठीक हुई हूँ लेकिन अभी दवा चल रही है। और आप पहले लड़के हो जो मुझे देखे बिना ही शादी के लिए हाँ कर दिए। इसलिए आपकी इज्ज़त मैं मरते दम तक करती रहूँगी और आपको कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दूँगी। आप जो कहोगे वो मैं करूँगी। ये मेरा प्रॉमिस है आपसे।

ये सुनके मैं थोड़ा सैड सा हो गया और उसे बोला –

मैं: देखो रज्जो मुझे नहीं पता कि तुम्हें लड़के क्यों रिजेक्ट कर दिए पर मुझे तो तुम बहुत ख़ूबसूरत लगी हो। तुम्हारे लिप्स, तीखी नज़र, सुराहीदार गर्दन देखकर मेरा दिल ख़ुश हो गया। लेकिन मुझे कुछ और देखना है। क्या तुम दिखाओगी…

रज़िया: क्या देखना है? अब तो ये रज्जो सिर्फ़ आपकी है। जो देखना है वो देखें। जो करना है वो करें। लेकिन एक वादा करें मुझसे कि आज के बाद आप मुझे छोड़के नहीं जाएँगे।

मैं: वादा करता हूँ रज्जो। तुम्हें अपने दिल से कभी दूर नहीं होने दूँगा।

ये सुन वो मुझसे लिपटकर रोने लगी।

मैं: क्या हुआ रज्जो? आज रोने की रात नहीं ख़ुश होने की रात है। आज हम दो जिस्म एक होने की रात है…

रज़िया: कुछ नहीं जी। बस हम दोनों के प्यार को किसी की नज़र न लगे। यही ऊपर वाले से दुआ माँगती हूँ…

मैं: रज्जो मैं वादा कभी नहीं तोड़ूँगा। जब तक साँस है मेरी मैं तुमसे ख़ुद से भी ज़्यादा प्यार और हिफ़ाज़त करूँगा।

और मेरी ऐसी बातों से रज्जो बहुत इमोशनल होने लगी और मुझसे लिपट गई। और हम दोनों का इमोशनल से रोमांस में बदल गया। मैं उसके रसीले होंठों को पीने-काटने लगा। उस टाइम तो मुझे उतना आता नहीं था लेकिन प्यार भी कोई सिखाने की चीज़ होती है। और इधर मैं सोचने लगा…

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