विदेशी बहुरानी – 3

Jamidar aur videshi bahu ki sex story:- अगली सुबह राजेन्द्रनाथ बालकनी में अपने बेटे को गोदी में बिठा के खेल रहा है. रेवती भी पास बैठके बाप बेटे को खेलते हुए देख रही है.

इस कहानी का पिछला पार्ट यहाँ पढ़ें :- विदेशी बहुरानी – 2

Jamidar aur videshi bahu ki sex story

रेवती – कब व्यापार के लिए निकलना है जी?

राजेंद्र – कल सुबह

रेवती – इसबार कितने दिन के लिए जी?

राजेंद्र – अभी से कैसे बताऊ रेवती! पर जितनी जल्दी हो सके आने की कोशिश करूँगा.

रेवती पति के कंधे पे हाथ रखके प्यार से बोली – जल्दी आना! आपके बिना खाली खाली सा लगता है जी.

राजेन्द्रनाथ बेटे को गोदी में लिया हुआ था, वर्ना बीवी के मुँह से ऐसी बात सुनके अभी रेवती के होंठों को चुम लेता. पर खुदको सम्हाल के रेवती के नरम गाल पे हाथ रख के बोला –

मैं जितना जल्दी हो सके आ जाऊंगा रेवती! तुम बिलकुल चिंता मत करो. मैं भी कहाँ तुम्हारे बिना नहीं रह सकता हूँ.

रेवती पति के हाथ को पकड़ के प्यार से राजेन्द्रनाथ को देखती है. शायद उसके मन में भी पति के लिए कुछ अलग ख्याल आ रहे होंगे. लेकिन बेटा सामने होने के कारन कुछ कर नहीं पा रही थी. दोनों बस एक दूसरे को घूर रहे थे के तभी-

मालिक मालकिन आपकी चाय.

एक औरत साड़ी पहने चाय का ट्रे लेकर उनके पास आकर बोलती है.

रेवती – हां.. यहाँ रख दे चंपा और जा मालिक के लिए नाश्ता बना, मैं भी आती हूँ।

चंपा – जी मालकिन! अभी जाती हूं।

ये बोलके वह जाने लगती है लेकिन जाते जाते एकबार मुड़के गद्दी पे बैठे अपने मालिक को देखती है. राजेन्द्रनाथ भी एक शैतानी मुस्कान के साथ उसे ही देख रहा था. चंपा भी एक मुस्कान देकर वहां से चली जाती है. बेटे को अपने गोदी में लेते हुए रेवती को पता नहीं चलता के मालिक नौकर में इशारे में कुछ हो गया. राजेन्द्रनाथ बेटे को रेवती के पास देकर चाय पीने लगता है. रेवती भी बेटे को लेकर कमरे में चली जाती है.

राजेन्द्रनाथ बाहर देखते हुए आराम गद्दी में आराम से बैठके चाय का चुस्की लेते हुए कल रात के हर एक पल को फिर से याद करता है.

कल रात का वक़्त –

नहीं मालिक! ऐसा मत बोलो, हम आपके नौकर है आप हमारे मालिक!! चंपा डरते हुए बोली.

राजेन्द्रनाथ चंपा के सामने आकर बोला – अरे मालिक और नौकर में भी एक रिश्ता होता है सम्मान का क्या तुम हमारा सम्मान नहीं करती?

चंपा- बहुत सम्मान करती हूं मालिक.. आप हमारे लिए सबकुछ है, आपके लिए ही तो हम अभी तक जी रहे है.

राजेंद्र – तो क्या इसके बदले तुम अपने मालिक को कुछ नहीं दोगी? क्या अपने मालिक को खुश नहीं करोगी.? बोलो?

चंपा – मालिक आप हमारे लिए सब है।

पर पर चंपा भी डर रही है क्यूंकि वह अच्छे से जानती है उसका मालिक क्या चाहता है. इस हवेली के बहुत नौकर चाकर से सुना है मालिक के असली रूप के बारें में. ज़रूरत पड़ने पे राजेन्द्रनाथ क्या कर सकता है वह चंपा अच्छे से जानती है.

राजेंद्र – बोलो चंपा एक रात नहीं दे सकती तुम अपने मालिक को?

चंपा – मैं मैं मैं शादीशुदा हूं मालिक! मेरा पति है बच्चा है. यह कैसे मालिक छोड़ दो मुझे।

राजेन्द्रनाथ का मन कर रहा था चंपा को उठा के कमरे के अंदर ले जाकर उसकी इज़्ज़त से जबरदस्ती खेले, पर राजेंद्र इस खेल में पक्का खिलाडी है. वह जानता है कैसे सामने वाले से काम निकाला जाता है. अब राजेंद्र अपना आवाज़ बुलंद करके बात करता है.

राजेंद्र – भूलो मत हम क्या है? और तुम क्या हो!! तुम सब का देखभाल करते है हम और यह भी जानते हो के हम क्या क्या कर सकते है.. क्या तुम चाहती हो के तुम्हारा मालिक गुस्सा हो जाये और उस गुस्से के कारण तुम्हारे पति को कुछ हो जाये? क्या चाहती हो सफ़ेद साड़ी पहनना?

चंपा डरके रोती हुई राजेंद्र का पैर पकड़ के बोली – मालिक आपकी पैर पकड़ती हूँ ऐसा कुछ मत करना. उनके बिना हमारा क्या होगा? आप कुछ मत करना मालिक।

राजेन्द्रनाथ चंपा को उठा के अपना मुँह चंपा के मुँह के पास लेकर बोला – अगर अपने मालिक को गुस्सा दिलाओगी तो बहुत कुछ हो सकता है और अगर अपने मालिक को खुश करोगी, तो ज़िन्दगी भर पैसो का कमी नहीं रहेगा तुम्हे. इतना पैसा दूंगा के साड़ी गहने सबकुछ खरीद पाओगी. अब फैसला तुम पर है मालिक को खुश करोगी? या गुस्सा दिलाओगी – बोलो पति का भरोसा? या एक रात अपने मालिक को?

चंपा अच्छे से जानती है अगर इनको गुस्सा आ जाये तो वह धमकी को सच कर सकते है. पर डर भी तो है. आज तक पति के साथ रात बितायी हुई चंपा के सामने पहली बार कोई और मर्द खड़ा था और वह भी आमंत्रण दे रहा था उसके साथ रात बिताने के लिए.

चंपा डरते हुए बोली – लेकिन किसी को कुछ पता चल गया तो मैं किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहूंगी मालिक।

राजेंद्र समझ गया के काम हो गया है. वह चंपा के होंठों के पास अपना होंठ लाकर बोला – इस गाँव में किसी का दम नहीं के तुमको कुछ बोल सके. तुम एक बार मुझे अपना बना लो एक बार मेरी बन जाओ तुमको रानी बनाकर रखूँगा.. अपने आपको मुझे दे दो.

चंपा कुछ बोल पाती, उससे पहले ही मालिक के होंठ उसके होंठ को चूमने लगे. राजेन्द्रनाथ चंपा को चूमते हुए घर के अंदर चले गए. दरवाज़ा बंद कर दिया और चंपा को लेकर दीवार के पास खड़े हो गए. चंपा के घूँघट को हटा के गर्दन चूमने लगा वह. चंपा समझ गयी थी के अब कुछ नहीं हो सकता. मालिक के सामने अब वह कुछ नहीं कर सकती. चिल्लाकर भी कोई फायदा नहीं. यह जमींदार है और वह नौकर. मालिक गुस्से से उसके पास से पति को छीन भी सकते है – पता नहीं और क्या कर दे!! इससे अच्छा है मालिक जो करते है करने दो। एक रात अगर यह जिस्म पति के इलावा कोई और मज़ा उठाये और बदले में सब ठीक ठाक रहे तो अच्छा ही है. कम से कम मालिक गुस्सा तो नहीं होंगे किसी से.

और डरने के बदले इस समय को मान लेना होगा न चाहकर भी ऐसा करना ही होगा. चंपा डरते हुए और शर्माते हुए अब मालिक का साथ देने लगती है. राजेन्द्रनाथ चंपा के बदन से साड़ी खींच के उतार के फेक देता है. उस टाइम गाँव के औरत सिर्फ साड़ी पहनती थी. ब्लाउज सिर्फ बड़े घर के औरत पहनती थी. इसलिए साड़ी उतारते ही चंपा का नंगा बदन उस शैतान हवसी के सामने आ जाता है. चंपा की चूचियों को देखकर राजेन्द्रनाथ के मुँह में पानी आ गया. चंपा को घुमाकर उसके नंगी पीठ को चूमने लगता है वह. मालिक के होंठों का चुम्बन पीठ पे महसूस करते हुए चंपा कापने लगी. आज पहली बार एक गैर मर्द उसके नंगे बदन को देख रहा है और प्यार कर रहा है. यह क्या!! यह क्या महसूस हो रहा है चंपा के गांड में? इतना गरम ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह मालिक का लंड!! राजेंद्र अपना मुँह चंपा के मुँह के पास लाकर बोलता है – आज तुमको बहुत मज़ा दूंगा आओ मेरी बाहों में आओ चंपा।

राजेंद्र चंपा को घुमाके उसको बाहों में ले लेता है और नीचे बैठ जाता है. थोड़ी ही दूर चंपा का बच्चा सो रहा है. उस बच्चे को पता भी नहीं चला के उसके माँ के साथ क्या हो रहा है.

चंपा- मालिक किसी को पता चल गया तो?

राजेन्द्रनाथ मुस्कुराके – किसीको कुछ पता नहीं चलेगा आज की रात बस हम दोनों का है भूल जाओ एक रात के लिए उस बच्चे के बाप को. आओ प्यार करो इसको..

यह बोलके ठरकी राजेंद्र चंपा के हाथ में अपना भयानक लंड पकड़ा देता है. चंपा भी मालिक का खड़ा हुआ भयंकर लंड देखकर हैरान हो जाती है.

चंपा- हाय दय्या!! यह इतना बड़ा है आपका.!

राजेन्द्रनाथ – क्यों? पसंद नहीं आया?

चंपा शर्माके मुस्कुराती है. हलाकि ऐसा कुछ करना वह कभी नहीं चाहती थी पर हालात जब आज उसको इस सिचुएशन में लेकर आया है तो शायद उसके हाथ में भी उसका इमोशन नहीं है. राजेंद्र समझ जाता है अब यह औरत तैयार है.

राजेंद्र मुस्कुराके राजू की बीवी के कान के पास मुँह लेकर बोलता है – आज की रात बस तेरा और मेरा है अपना शर्म लिहाज भूल जा, आज किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, देख मालिक के इस अंग को इसको बहुत भूख लगी है इसको शांत कर दे चंपा बदले में तुझे इतना मज़ा दूंगा के उस राजू को भूल जाएगी। सीह्ह्ह्हह्ह आह्ह्ह्हह्हह वर्ना तू अच्छे से जानती है क्या होगा!!

ऐसे परिस्थिति में मालिक के मुँह से ऐसे लालच देने वाली बात के साथ साथ धमकी सुनकर चम्पा जैसे और भी गरम हो जाती है। न चाहते हुए भी उसके अंदर में अजीब इच्छा जाग उठती है अपने पति से प्यार करने वाली चंपा पता नहीं कब मालिक का महान लंड कसके पकड़ के हल्का हल्का ऊपर नीचे करने लगती है. एक तो जमींदार का बड़ा बेटा, ऊपर से घर का बर्तमान मालिक.. ऊपर से ऐसी रात में आँखों के सामने उनका खड़ा लंड! चंपा अब अपने ही नियंत्रण को खो चुकी थी उसकी अंदर का डर तो था पर यह कामुक पल उसको मजबूर कर रहा था पति को धोखा देने के लिए.-

आह्ह्ह्ह सीह्ह्ह्ह हां चंपा हां ऐसे ही, अब अब ज़रा मालिक को और खुश कर दे. तू समझ रही है न क्या बोल रहा हु?

ह्म्म्मम्म? चंपा मालिक के चेहरे के तरफ देखती है एक हवसी तगड़ा हट्टा कट्टा 6 फुट का पुरुष उसके मुँह के सामने अपना मुँह लेकर उसी को घर रहा है. उफ्फ्फफ्फ्फ़ जैसे कोई डाकू सरदार हो वैसे भी इस वंश का अतीत वही तो है. एक समय पे जमींदार के पूर्वज डाकू ही थे लूट पाट करके आज के जमींदार बने है. वही खून तो है इनमे भी ख़ास करके वंश के इस पुरुष में. औरत इसके लिए बस हवस का सामान है. जमींदार होने के कारण अब तक बहुत औरतो का मज़ा ले चुका है वह. और आज बारी है राजू की बीवी चंपा की. आखिर वह कैसे बच सकती थी इस आदमी से?

वही हुआ जो होना था. पति के लंड से लगभग दुगना लम्बा लंड हाथ में पकड़ के डर और कामुक अनुवृत्ति को साथ में महसूस करती हुई चंपा मालिक को देख रही थी. मोमबत्ती की रौशनी से जितना भी दिख रहा था लग रहा था, कोई कामपुरुष खुद आकर रूह को पुकार रहा हो जिस्मानी वासना को शांत करने के लिए. जैसे कोई जादू है मालिक के आँखों में, चंपा उन आँखों में देखती हुई पता नहीं कब घुटनो के बल बैठ गयी थी. जब नज़र हटी तो आँखों के सामने एक लम्बा ज़हरीला साप था! वह साप भी जैसे उसे ही घूर रहा हो.

उफ्फ्फफ्फ्फ़ कोई पुरुषांग इतना आकर्षक कैसे हो सकता है? इस जमींदार वंश का इतिहास उसे कुछ कुछ पता है. इस वंश में कैसे कैसे पुरुष पैदा हुए यह बहुत बार सुन चुकी है गाँव के कई लोगों से और अपने सासु माँ से. लेकिन दुसरो से सुनना और आँखों के सामने प्रमाण मिलने का फर्क आज पता चल रहा था उसको. साक्षात् हवेली के बड़े मालिक के बेटे का लंड उसके मुँह के सामने हिल रहा था! चंपा तो कुछ देर तक उस मरदाना अंग को घूर रही थी, हैरान और कामुकता का मिक्स फीलिंग के साथ. राजेंद्र भी जान बुझके व लंड को हिला हिला के अपनी घर की सुंदरी दासी को दिखा रहा था अपना गौरव. जान बुझके अपना लंड को चंपा के गाल पे एक एक बार टच करवा रहा था.

चंपा जो कुछ देर पहले तक उनको रोक रही थी, अब पता नहीं खुद ही उनकी इस हरकत को चुपचाप देखे जा रही थी. तभी उसके मालिक ने वह किया जो देखके चंपा के अंदर की वासना लालच मे बदल गया. मालिक ने अपना लंड का टोपा चमड़ी से निकाल के उसको दिखाया. अंदर का गुलाबी मुंडी जो काम रस से भीगा हुआ था वह देखकर अनजाने में ही चंपा के मुँह में पानी आ गया और घूंट के पीना पड़ा अपना थूक. लेकिन फिर से पानी जम गया मुँह के अंदर.

जैसे यह लम्बा गरम सख्त चीज कोई स्वादिष्ट खाना हो! राजेंद्र भी मौके का फ़ायदा उठाकर वासना में डूब चुकी दासी के होंठों के पास अपना लंड का टोपा ले जाकर कामुक आवाज़ में बोला– अब और खुद को मत रोक चंपा. यह रात बस तेरा है. भूल जा उस नालायक पति को मैं जानता हूं वह तुझे मेरे जितना खुश नहीं रख सकता, ले चंपा मैं खुद आया हूँ तेरा मालिक खुद आया है आज तुझे खुश करने इस मौके को जाने मत दे, ले इसको, स्वाद ले इसका। मालिक के मुँह से ऐसे लालची बातें सुनकर तो और पानी आ गया चंपा के मुँह में. जैसे उसके अंदर कोई और औरत आ गयी हो जो बहुत भूखी थी प्यासी थी आज तक.

जब उसके सामने खाना खुद आया हो तो वह कैसे पति बच्चे के खातिर इस मौके को जाने देती. चम्पा अब डर शर्म को भूल, पति बच्चे को भूल, बिना कुछ सोचे अपने मुँह में मालिक का लंड ले लेती है। पहली बार आज उसके मुँह में पति का नहीं, इस हवेली के मालिक का महान लंड था. जो डर अब तक, अभी तक चंपा को रोक रहा था अब वही डर पूरी तरह वासना मे बदल चुका था या शायद लालच में. खुदको भी उसे नहीं नहीं पता के वह क्यों ऐसा कर रही है? मालिक के लंड को जितना हो सके मुँह में लेकर मज़े से चूस रही थी वह. पूरा मुँह जैसे लंड से भर गया था उसका. राजेंद्र भी अपनी आंखो से पूरा कामुक दृश्य देखते हुए मज़े से उस पल का लुप्त उठाते हुए वासना में खो रहा था.

हलाकि कई औरतों के साथ वह सम्भोग कर चुका है पर जब भी कोई नयी औरत के साथ वह सोता है तो पूरी तरह भूल जाता है के यह उसका लिए पुरानी बात है. हमेशा वही पहले वाला जोश महसूस करता है वह. जैसे इस बार भी बिंदु की बहु की यौवन का मज़ा लेते हुए महसूस कर रहा था. आह्ह्ह्हह्ह्ह्हह कैसे मज़े से चूस रही है लंड को. जैसे चुसके खा जाएगी उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़. पता नहीं वह फिरंगी बहुरानी भी भाई के लंड को ऐसे ही चूसती होगी उफ्फ्फफ्फ्फ़. ऐसे वक़्त अपने भाई की बीवी को याद करते ही और तड़प गया राजेंद्र. अपने ही भाई से जैसे इर्षा होने लगी उसको.

हालांकि कोई दूसरा समय होता तो ऐसा कभी नहीं फील करता, पर ऐसे वक़्त पे बहुत इर्षा हो रहा था बड़े भाई को छोटे भाई के लिए. चंपा के मुँह में लंड का धक्का देते हुए फिर से दिमाग में वही खूबसूरत चेहरा, वही रूप, वही यौवन, वही मुस्कान आने लगा. आह्हह्ह्ह्ह ना जाने वह औरत छोटे भाई को कितना मज़ा दे रही होगी रोज, उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ छोटा उसको ठीक से शांत तो कर पाता होगा ना? विदेशी मॉडर्न लड़की की भूख भी खतरनाक होगी. पता नहीं क्या क्या करते होंगे दोनों पति पत्नी रात को उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़.

चंपा के बालों को पकड़ के उसके मुँह में लंड डालते हुए कहीं और ही खो गया था राजेंद्र. मन ही मन अपने भाई से जलन होते होते गुस्से से उसको गाली देने लगा. साला कमीना कहीं का. गाँव में सबका प्यारा भी बन गया है सब उसको सम्मान भी करता है और ऊपर से इतनी गरम बीवी भी मिल गया साले को. उफ्फफ्फ्फ़ क्या मौज करता होगा उस फिरंगी के साथ. क्या पता इस वक़्त भी बहुरानी के साथ मजे कर रहा होगा.

आह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बहुरानी. काश पिताजी मान लेते दोनों को, तो दोनों इसी हवेली में रहते और बहुरानी से रोज़ मुलाकात होती। आह्ह्ह्हह्हह छोटी बहुरानी! भाई माफ़ करना तेरी बीवी ने मेरे अंदर आग लगा डाली है आह्ह्ह्हह्हह ना चाहते हुए भी ठोंक नहीं पा रहा, उसी की तड़प ने आज इस औरत को मजबूर किया अपने पति को धोका देने के लिए. आह्हह्ह्ह्ह चूस चंपा चूस अह्हह्ह्ह्ह वाह चंपा बहुत खूब अह्हह्ह्ह्ह ऐसे ही मज़ा देती जा फिर देखना तेरा मालिक तुझे कैसे खुश करते है अह्ह्ह्हह्हह-

उम्मम्मम्म उम्मम्मम्मम्म मालिक? आपको अच्छा लग रहा है न? आप खुश तो है न मुझ से? चंपा लंड से मुँह हटाके राजेंद्र के तरफ देखकर पूछती है.

हलाकि कोई भी जानता है के ऐसे समय एक मर्द को कैसा लगता होगा पर चंपा को मालिक के मुँह से सुन्ना था के उनको कैसा लग रहा है। जमींदार साहब चंपा के तरफ देखते हुए झुक के अपना मुँह चंपा के चेहरे के पास लेकर बोलते है- अब बनी तू मेरी दासी असल में आज तक तू इस हवेली की सेवा करती थी पर आज से तू मेरी भी सेवा करेगी. बस यह रात नहीं अबसे तू पूरी तरह मेरी होगी समझी?

उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ मालिक के मुँह से यह आदेश सुनके चंपा जैसे और उत्तेजित हो गयी. जबकी पहले बस इस एक रात के लिए वह डर रही थी अब कभी भी मालिक को खुश करना ही होगा जानने के बाद डर नहीं बहुत उत्तेजित हो रही. यह क्या हो रहा चंपा के अंदर? क्या इसी को जिस्म की भूख कहते है जो सही गलत कुछ नहीं देखता? जो तड़प को रोकने की जगह और तड़पता है माँ की ममता पति का बिस्वास सब भूलके एक औरत को मजबूर कर देता है खुद को बदलने कर स्वार्थी होने में? शायद हां यही होती है जिस्म की भूख और यही भूख अब महसूस कर रही थी चंपा।

मालिक का आदेश सुनकर तभी अपना सर हिलाके हां बोलती है और मालिक के महान लंड को हिलाने लगती है ज़ोर ज़ोर से. राजेंद्र भी चंपा के हरकत से खुश होकर एक पैशनेट चुम्मी ले लेता है और फिर नज़र घुमाके सोये हुए इस औरत के बच्चे को देखता है और मुस्कुराकर मन ही मन उसको बोलता है- सोया रह आराम से बेटा. अब मैं और तेरी माँ थोड़ा मज़ा करेंगे तेरी माँ को इतना मज़ा दूंगा के वह अब से मेरी बन जाएगी। बीवी तो तेरे इस बाप की रहेगी पर सेवा मेरा करेगी. और फिर एकदिन तुझे बड़ा भाई होने का सुख दूंगा। आहहहहहह!!

राजेन्द्रनाथ चंपा के पास बैठ जाता है और उसको बाहों में ले लेता है और कान में धीरे से बोलता है- चम्पा आह्ह्ह्हह्ह आज से तू मेरी है सिर्फ मेरी – समझी?-

ahhhhhhhhhhh जी मालिक जो आप बोले. अब मैं चाहकर भी आपको रोक नहीं सकती. जो आप चाहे करिये, मेरे साथ मुझे सबकुछ भूला दीजिये मालिक। (राजेंद्र के सीने से चिपक के उनके नंगे पीठ पे हाथ घूमते हुए कामुक आवाज़ों में बोली)-

तू फ़िक्र मत कर किसी को कभी कुछ पता नहीं चलेगा. बस हम दोनों के बीच रहेगा तू अपने पति सास और बच्चे से साथ साथ अपने मालिक का भी ध्यान रख, बदले में तुझे मैं भी खुश कर दूंगा तू समझी ना?

Ahhhhhhhhhh हां मालिक अब जब इतना सबकुछ हो चुका है तो मैं भी खुद को नहीं रोकना चाहती

मालिक आपने मेरी प्यास बढ़ा दी है. अब कुछ कीजिये न मैं और नहीं रोक सकती अह्हह्ह्ह्हह। राजेन्द्रनाथ चंपा के नंगे जिस्म को महसूस करते हुए ज़मीन पे सो जाता है और फिर रात के अंधेरे में वही होता है जो नहीं होना चाहिए, यह शायद होना चाहिए. मुन्ने को पता भी नहीं चलता के पिताजी के ना होने पर, कोई और मर्द उसकी माँ को कामसुख के समुन्दर में डूबा के एक नया ही वासना की ज्ञान दे रहा है. और उसकी माँ भी उस मर्द से पूरी तरह जुड़के वासना में खुदको समर्पित कर चुकी है और वह मोमबत्ती? वह तो कब का बुझ चुका है.

वर्त्तमान का राजेन्द्रनाथ भी चाय का कप रखके उठता है. अभी उसे नहाने जाना है.

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