मेरी दीदी बनी देसी रंडी – 1

Didi ki chudai ki desi kahani:- नमस्कार दोस्तों। मेरा नाम राहुल है (बदला हुआ नाम)। ये मेरी फर्स्ट स्टोरी है जो मैं लिखने जा रहा हूँ। ये स्टोरी होगी मेरी दीदी पर जिसका नाम है नीतू (बदला हुआ नाम)। ये स्टोरी एकदम रियल है जो मैं आपको आज बताने जा रहा हूँ।

मैं राहुल – उम्र 18 मेरी दीदी नीतू – उम्र 24, फिगर 34-32-36 (मेन हीरोइन)

कहानी के हीरो तो बहुत हैं जो कहानी के साथ आते रहेंगे।

मेरे फादर का नाम राजीव अग्रवाल। उम्र 50। मम्मी का नाम सीमा अग्रवाल। उम्र 45।

Didi ki chudai ki desi kahani

हम यूपी के रहने वाले हैं लेकिन हम कई सालों से दिल्ली में रह रहे हैं। लेकिन हमारा गाँव यूपी में है। हमारा गाँव आना-जाना रहता है। मेरी दीदी की शादी को हुए 3 साल हो गए हैं। उनके हस्बैंड का नाम है हरीश। उम्र 29। और जो चेन्नई में जॉब करते हैं तो वो महीने या कुछ महीनों में 4 या 5 दिन के लिए ही घर आते थे। अब स्टोरी स्टार्ट करते हैं।

मेरी दीदी नीतू दिखने में बहुत सुंदर हैं और उनका फिगर भी बहुत बढ़िया है। कोई भी अगर उसको देख ले तो चोदे बिना ना रह पाए। इतनी सुंदर हैं। खासकर उनकी बाहर को निकली हुई गाँड। आह! क्या ही गाँड है। मन तो करता है कि गाँड में लंड डाल दूँ लेकिन कभी कर नहीं पाया। चलो कहानी पर आते हैं।

दीदी के शादी के 2 साल बाद उनके हस्बैंड चेन्नई में जॉब करने चले गए। जिसके कारण दीदी का अपने ससुराल में मन नहीं करता था। जिससे दीदी ने सोचा क्यों ना वो अपने घर जाएँ कुछ महीनों के लिए। दीदी ने अपने हस्बैंड को सब बात बताई और दीदी यूपी से दिल्ली आ गईं हमारे साथ रहने के लिए। दीदी को दिल्ली में 1 महीना हो गया था। दीदी की कहानी की शुरुआत तब हुई जब दीदी एक दिन दीदी और मैं सब्जी लेने गए।

मैं: दीदी मम्मी ने क्या-क्या सब्जी लाने की बोली है? आपको याद है?

दीदी: हाँ मेरे को याद है क्या लेनी है क्या नहीं।

हमारे घर से मार्केट ज्यादा दूर थी। रिक्शा से आने-जाने में 15 से 20 मिनट लग जाते थे।

दीदी और मैं सब्जी खरीदने के लिए बाजार जा ही रहे थे। हमने रिक्शा लिया और मार्केट की तरफ निकल गए। कुछ देर बाद हम मार्केट पहुँच गए। हम सब्जी लेने के लिए जैसे ही दीदी और मैं मार्केट में पहुँचे हमने देखा कि उधर बहुत भीड़ है। भीड़ इतनी थी कि पैर रखने की भी जगह नहीं थी। उसके बावजूद हम मार्केट में चलने लगे।

हम जिस एरिया में गए थे वो एरिया के पास एक और एरिया था जो कि उधर के लुढ़े पड़े लफंगे टाइप के हैं।

दीदी और मैं मार्केट के अंदर गए और कैसे-कैसे मैंने कुछ सब्जी खरीद ली। जब हम आगे जा रहे थे तो किसी ने दीदी की सेंडल पर अपना पैर रख दिया। जैसी ही दीदी आगे बढ़ीं दीदी की सेंडल टूट गई।

दीदी ने मेरे को बोला: राहुल देख मेरी सेंडल टूट गई। अब क्या करूँ? इधर कोई आसपास ठीक करने वाली दुकान है क्या?

मैं: हाँ दीदी इधर एक मोची है। चलो हम उधर चलते हैं।

दुकान कुछ इस तरह से थी।

हम जब मोची की दुकान पहुँचे तो उधर 1-2 लोग और थे और मोची अपना काम कर रहा था। जैसे ही मैंने उससे पूछा अंकल कितना टाइम लगेगा वो मेरी तरफ देखा। जैसे ही उसने मेरी तरफ देखा उसने मेरी दीदी पर नजर डाली और वो मेरी दीदी को गंदी नजरों से देखता रहा।

मैंने वापस पूछा: ओ अंकल कितना टाइम लगेगा?

तो अंकल ने बोला: अभी बस 10 मिनट लगेंगे। तब तक तुम थोड़ा वेट करो।

मैं: दीदी अभी तो थोड़ा टाइम लगेगा। क्यों ना जब तक मैं सामान लेकर आ जाऊँ और आप अपनी सेंडल ठीक करवा लेना।

दीदी: ठीक है राहुल तू जा। मैं तेरा इधर ही वेट करूँगी।

मैं सामान लेने चला गया।

मेरे को उधर सामान लेने गए 10 मिनट हो गए थे। मैं बाकी का सामान ले रहा था तब एकदम से बारिश स्टार्ट हो गई और मैं बारिश से बचने के लिए एक दुकान के नीचे आ गया।

उधर मोची की दुकान पर दीदी और अंकल ही थे। जब बारिश स्टार्ट हुई तो दीदी बचने के लिए जगह ढूँढ रही थीं लेकिन अंकल की दुकान उतनी बड़ी नहीं थी।

दीदी को भीगता देख अंकल बोले: अरे बेटी तुम बारिश में क्यों भीग रही हो? तुम मेरे झोपड़ी में वेट कर लो बारिश रुकने का।

दीदी ने उनको मना कर दिया।

एकदम से बारिश और तेज हो गई जिससे दीदी की साड़ी कुछ ज्यादा ही गीली हो गई और दीदी ने अंकल से बोला।

दीदी: ठीक है अंकल जी।

और दीदी उसके झोपड़ी के गेट पर जाकर खड़ी हो गईं।

दीदी की साड़ी दीदी के शरीर से बिल्कुल चिपक गई थी और दीदी के बूब्स और गाँड का शेप एकदम अच्छे से दिखाई दे रहा था।

दीदी बारिश में भीगते हुए।

बारिश के साथ-साथ तेज-तेज हवा भी चलने लगी।

जिसका फायदा अंकल को हो रहा था। दीदी को ठंड लगने लगी थी और अंकल दीदी को खा जाने वाली नजरों से देख रहे थे।

अंकल: बेटा अगर तुमको ठंड लग जाएगी तुम अंदर जाकर अपना शरीर को पोंछ लो।

दीदी: नहीं अंकल जी मैं ठीक हूँ।

अंकल: बात बनाओ नहीं तो तुमको ठंड लग जाएगी।

दीदी: ठीक है।

अंकल झोपड़ी के अंदर गए और अंदर उन्होंने शरीर को पोंछने के लिए अपनी एक धोती दे दी।

दीदी ने वो धोती ले ली। दीदी अपना शरीर पोंछ रही थीं कि अंकल बाहर गए और अपनी दुकान के आगे प्लास्टिक का एक बड़ा सा पन्ना डाल दिया जिससे दुकान में बारिश ना आए। जिससे बाहर से अंदर नहीं देखा जा सकता था।

फिर अंकल भी अपनी झोपड़ी में चले गए। दीदी ने अपना शरीर पोंछ लिया था लेकिन साड़ी अभी भी गीली थी।

अंकल: बेटा अब तुमको ठंड नहीं लग रही ना?

दीदी: नहीं।

अंकल: बेटा आपका नाम क्या है? मैंने आपको इस एरिया में देखा नहीं कभी।

दीदी: मेरा नाम नीतू है और मैं इधर पास से ही हूँ। वो मैं घर से ज्यादा बाहर नहीं जाती। और आपका क्या नाम है?

अंकल दीदी का क्लीवेज देख रहे थे और मुस्कुराके दीदी से बोला।

अंकल: मेरा नाम अकरम है और मैं इधर ही रहता हूँ।

दीदी: ओह।

अंकल: वैसे मैंने इतनी सुंदर लड़की नहीं देखी आज तक। तुम तो कुछ ज्यादा ही सुंदर हो बेटा।

दीदी ने कुछ नहीं बोला और मुस्कुरा दिया।

दीदी को अभी भी ठंड लग रही थी क्योंकि साड़ी अभी भी गीली थी। दीदी को ठंड से काँपता हुआ देखकर अंकल बोले।

अकरम: अरे बेटा तुम्हें तो अभी भी ठंड लग रही है।

दीदी ने बोला: मैं ठीक हूँ अंकल जी।

अकरम: कहाँ ठीक हो तुम तो अभी भी काँप रही हो।

दीदी: अंकल जी मैं ठीक हूँ।

अकरम: बेटा तुम एक काम करो। तुम अपने कपड़े उतार दो और ये धोती लपेट लो। जब बारिश रुक जाएगी तब अपने कपड़े पहन लेना।

दीदी इस बात पर शॉक हो गईं। कैसे दीदी किसी दूसरे के घर में वो भी किसी के सामने अपने कपड़े उतार सकती थीं।

दीदी: नहीं अंकल जी मैं ठीक हूँ।

अकरम मन में सोच रहा था: साली कपड़े नहीं उतार रही। साली को बिना साड़ी में देखने का मन कर रहा है लेकिन उतार नहीं रही।

अकरम: बेटा तुम बीमार हो जाओगी।

दीदी: नहीं मैं ठीक हूँ।

अकरम: अच्छा बेटा तुम अपने कपड़े उतार लो। मैं बाहर चला जाता हूँ।

दीदी ने मन में सोचा कि मैं फिर भी कैसे कपड़े बदल सकती हूँ लेकिन दीदी का दिल कर रहा था कि बदल लेती हूँ कपड़े क्योंकि दीदी मॉडर्न ख्यालों की थीं।

फिर दीदी ने बोला।

दीदी: ठीक हाँ अंकल जी मैं बदल लेती हूँ लेकिन आप बाहर ही रहना।

मैं अभी भी दुकान के नीचे बारिश रुकने का वेट कर रहा था। दोपहर के टाइम वैसे भी ज्यादातर दुकानें बंद रहती हैं। ऊपर से बारिश हो रही है और कोई भी बाहर नहीं आने वाला।

मैं बहुत देर से बाहर खड़ा था तो मैंने दीदी को कॉल किया।

मैं: दीदी आप ठीक हो ना? बाहर बारिश हो रही है।

दीदी: हाँ मैं ठीक हूँ। मैं मोची अंकल की दुकान पर ही खड़ी हूँ।

मैं: अच्छा दीदी मैं भी उधर आ रहा हूँ।

दीदी: अरे तेरे पास सामान होगा। अगर तू आएगा तो बारिश में सामान खराब हो जाएगा। तू बारिश के रुकने का वेट कर और जल्दी आ जइयो।

मोची की दुकान और मार्केट की दूरी 10 मिनट की थी पैदल।

फिर मैंने कॉल काट दी और फोन में कुछ न कुछ करते रहा। बारिश रुकने का वेट कर रहा था।

उधर दीदी अपने कपड़े चेंज कर रही थीं।

दीदी ने झोपड़ी का दरवाजा लगा दिया लेकिन दरवाजा टूटा हुआ था। ठीक से नहीं लग रहा था।

फिर दीदी ने अपनी साड़ी उतारी और ब्लाउज और पेटिकोट में हो गईं। दीदी का ब्लाउज और पेटिकोट भी गीला था जो दीदी के शरीर से चिपक रखा था।

फिर दीदी ने धोती को अपने शरीर पर लपेट लिया। वो धोती दीदी के थाई से थोड़ा सा ही नीचे आ रहा था। दीदी ऐसी लग रही थीं जैसे दीदी ने कोई नाइट सूट पहन रखा हो।

दीदी ने उसको लपेटकर अपनी पेटिकोट भी उतार दी।

उसके बाद दीदी ने अंकल को बोला: अंकल जी मैंने कपड़े चेंज कर लिए हैं। आप आ सकते हैं।

अंकल के झोपड़ी में आते ही अंकल ने दीदी को देखा और आँखें फटी की फटी रह गईं। दीदी ने धोती इस तरह से लपेट रखा था कि दीदी के थाई पूरी दिख रही थीं।

दीदी की थाई एकदम गोरी दूध की तरह।

अंकल दीदी को देखते ही रहे। दीदी ने अपने आप को घूरता देखा। दीदी बोलीं।

दीदी: अंकल जी।

अकरम: हाँ बेटी।

दीदी: कर लिए मैंने चेंज।

अकरम: वो तो मैं देख रहा हूँ तुमने कपड़े चेंज कर लिया।

दीदी: हम्म।

अकरम: बेटा तुम खड़ी क्यों हो? चारपाई पर बैठ जाओ।

अकरम के झोपड़ी में ज्यादा सामान नहीं था।

दीदी चारपाई पर बैठ गईं।

और अकरम भी दीदी के बगल में बैठ गया।

अकरम: बेटा तुमको कुछ चाहिए?

दीदी: नहीं अंकल जी।

अकरम: बेटा तुम्हें अब तो ठंड नहीं लग रही ना?

दीदी: नहीं अंकल जी अब नहीं लग रही।

अकरम: वैसे बेटा मैं तो तुम्हारा नाम ही पूछना भूल गया। क्या नाम है तुम्हारा?

दीदी: नीतू नाम है मेरा।

अकरम: अच्छा। और तुम्हारे घर में कौन-कौन है?

दीदी: मेरे हस्बैंड चेन्नई में जॉब करते हैं। अभी मैं अपने मम्मी-पापा के घर रह रही हूँ। उधर मैं, मम्मी-पापा और मेरा भाई ही है।

अकरम: अच्छा।

दीदी: आपके परिवार में कौन-कौन है?

अकरम: बेटा मेरे परिवार वाले तो सारे गाँव में रह रहे हैं। मेरे बेटे ने भी मुझे छोड़ दिया और मेरी बेगम को गुजरे 10 साल हो गए हैं। (अंकल ये बातें रोते हुए शक्ल के साथ बोल रहे थे।)

दीदी: अरे आप रोइए मत अंकल जी।

अकरम रोते-रोते अपना सर दीदी के शोल्डर्स पर रख देता है। दीदी को एकदम से शॉक लगता है लेकिन दीदी कुछ बोल नहीं पातीं।

दीदी अंकल को चुप करवाती हैं और बोलती हैं।

दीदी: अंकल जी मत रोइए। मैं हूँ ना आपके परिवार की मेंबर। आज से मैं आपकी बेटी जैसी ही हूँ। आप मुझसे कोई भी काम बोल सकते हैं।

अंकल: सच बेटा तुम आओगी रोज़ मिलने मुझसे?

दीदी: ठीक है अंकल जी आ जाऊँगी रोज़ मिलने।

अकरम मन ही मन खुश होने लगा। उसका प्लान वर्क कर रहा था। दीदी उसके जाल में आ रही थीं।

ऐसे ही दोनों बातें कर रहे थे। बारिश भी रुकने वाली थी।

इधर मैं दुकान के नीचे खड़ा दीदी को कॉल लगाता हूँ।

मैं: हेलो दीदी बारिश रुक रही है। मैं आ रहा हूँ आपके पास।

दीदी: अच्छा ठीक है।

बोलकर दीदी ने कॉल काटना भूल गईं। दीदी की और अकरम की बातें मुझे सुनाई दे रही थीं।

दीदी: अंकल जी मेरा भाई इधर आ रहा है। मेरे को जल्दी कपड़े पहनने होंगे नहीं तो उसने मेरे को ऐसा देख लिया तो कुछ गलत सोच लेगा।

मैं उनकी सभी बातें सुन रहा था।

अकरम: अच्छा ठीक है बेटा बदल लो लेकिन तुम्हारे कपड़े तो सूखे नहीं हैं। तुम क्या पहनोगी?

दीदी: मैं वही पहन लेती हूँ।

अकरम: बेटा एक काम करो। तुम साड़ी पहन लो और बाकी का इधर छोड़ दो। कल जब तुम आओगी तो मैं तुम्हें दे दूँगा।

दीदी: अंकल जी मैं कैसे अपने कपड़े इधर छोड़कर जा सकती हूँ?

अकरम: बेटा अब तो हम दोस्त हैं। दोस्त में तो चलता है।

दीदी: अच्छा ठीक है अंकल। आप बाहर जाइए।

दीदी ने जल्दी से धोती को उतारी और बिना पेटिकोट में साड़ी पहन ली। और मैं दुकान के बाहर पहुँचने वाला था। मैंने कॉल काटकर दीदी को वापस से कॉल किया।

मैं: दीदी आप कहाँ हो?

दीदी: मैं मोची अंकल के दुकान के अंदर हूँ।

मैं: दीदी आप अंदर क्या कर रही हैं? बाहर आओ।

दीदी: आ रही हूँ।

दीदी ने जल्दी से कपड़े ठीक किए और बाहर आ गईं।

मैं: आप अंदर क्या कर रही थीं?

दीदी: बारिश से बचने के लिए अंदर गई थीं।

मैं: अच्छा।

दीदी और मैं जब जा रहे थे तो दीदी बोलीं एक मिनट।

दीदी: अंकल जी मेरी सेंडल ठीक कर देना। मैं कल आकर ले जाऊँगी।

अकरम: ठीक है बेटा।

फिर हम निकल गए। अंकल पीछे से दीदी की हिलती हुई गाँड देख रहे थे।

फिर हम घर पहुँच गए और रात हो गई।

उधर अकरम दीदी की पेटिकोट को सूँघके दीदी के नाम की मुठ मार रहा था। ओह नीतू मेरी रंडी। एक बार मिल जा। तेरे को रगड़-रगड़कर चोदूँगा मेरी रंडी। आह!!! और दीदी की पेटिकोट पर माल छोड़ दिया और सो गया।

नेक्स्ट डे

मॉर्निंग में दीदी ने मेरे को उठाया और बोला जल्दी आ रेडी होकर नाश्ता कर ले।

फिर मैं रेडी होकर नाश्ता करने चला गया। उधर पापा और दीदी बैठी थीं और मम्मी नाश्ता लगा रही थीं। फिर मम्मी भी आकर बैठ गईं।

पापा: अरे सुनो। मैं तुमको रात को बताना भूल गया। हमको आज 10:00 बजे गाँव के लिए निकलना है।

मम्मी: लेकिन क्यों? और आपने मेरे को रात को भी बताया नहीं।

पापा: अरे मेरे दिमाग से निकल गया था। वो जमीन को लेकर कुछ काम है और उधर मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए एक महीने के लिए जाना है।

मम्मी: एक महीने के लिए? और बच्चों का क्या? वो एक महीने के लिए उधर क्या करेंगे? राहुल की पढ़ाई का क्या?

पापा: अरे इनको इधर ही रहने देते हैं। वैसे नीतू है ही इधर।

दीदी: हाँ मम्मी मैं रख लूँगी इसका ख्याल। आप दोनों जाइए।

मम्मी: अरे तुम कैसे रख लोगी?

दीदी: मैं रख लूँगी।

पापा: अरे ये बोल रही है तो रहने दो इनको इधर।

मम्मी: ठीक है।

नाश्ता करने के बाद मम्मी ने अपना और पापा का सामान पैक किया।

और 10:00 बजे गाँव के लिए निकल गए।

इधर मैं और दीदी ही रह गए थे और दोपहर हो गई थी।

दीदी को याद आया: मेरे को तो सेंडल लेनी जानी है और कल के कपड़े भी।

मैं: दीदी मैं जा रहा हूँ अपने दोस्त के पास। अब सीधा शाम को आऊँगा।

दीदी: अच्छा ठीक है जा। लेकिन 5 बजे से पहले आ जइयो।

मैं: 5 नहीं 6 बजे तक आ जाऊँगा।

दीदी: ठीक है।

फिर मैं निकल गया।

मैं घर से निकलके अपने दोस्त राज के पास गया लेकिन वो घर पर था नहीं। फिर मैं अपने दोस्त हर्ष के पास जा रहा था तो मुझे याद आया वो तो अपने गाँव गया है। फिर मैं वापस घर की तरफ जा ही रहा था तो मैंने दीदी को देखा। वो मार्केट की तरफ जा रही थीं। मैंने सोचा दीदी मार्केट की तरफ क्या करने जा रही हैं। फिर मुझे कल की बात याद आई तो मैं दीदी का पीछा करने लगा। दीदी ने आज येलो कलर की साड़ी और बैकलेस ब्लाउज पहना था और हाई हील्स की सेंडल पहन रखा था। दीदी को ऐसे देखकर मेरे अंदर कुछ होने लगा। वैसे भी मैं गंदी-गंदी स्टोरी पढ़ता था जिसमें बहन किसी न किसी से चुद रही होती है।

पता नहीं क्यों मैं दीदी को देखकर उस लड़की की जगह रखकर इमेजिन करने लगा और मेरा खड़ा होने लगा। चलते टाइम दीदी की गाँड क्या ही लग रही थी।

फिर दीदी अकरम की दुकान पहुँचीं और मैं दूर से देख रहा था। अभी अंकल ने दुकान नहीं लगाई थी। वो अपने झोपड़ी में थे।

दीदी: अंकल जी! अंकल जी!

अकरम अंदर सो रहा था।

तो दीदी ने उसके घर के आगे जो प्लास्टिक की बड़ी सी पन्नी हटाई और अंदर चली गईं। मेरे को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था तो मैं उनके पास गया।

लेकिन मैं उनको देख नहीं सकता था। बस आवाज सुन पा रहा था।

दीदी: अंकल जी।

अकरम: (चिल्लाकर) कौन है जो दिमाग खराब कर रहा है?

दीदी: अंकल जी मैं।

अकरम: कौन मैं?

दीदी: अरे मैं नीतू।

अकरम फिर जल्दी से दरवाजे के पास गया और गेट खोला और बोला।

अकरम: अरे बेटा तुम इस टाइम?

दीदी: वो मैं कल के कपड़े और सेंडल लेने आई हूँ।

अकरम: अच्छा नीतू बेटा लेकिन सेंडल तो मैंने ठीक नहीं की। वो अभी धूप है ना इसलिए।

दीदी: अच्छा अंकल जी तो मेरे कपड़े दे दीजिए। मैं सेंडल शाम को लेकर चली जाऊँगी।

अकरम: अरे नीतू बेटा तुम अंदर तो आओ। धूप में अभी वापस जाओगी फिर वापस आओगी। इससे अच्छा तुम थोड़ी देर इधर वेट कर लो। जैसे ही धूप कम होगी मैं सेंडल ठीक कर दूँगा।

दीदी मन में: हाँ थोड़ी देर वेट कर लेती हूँ। अभी राहुल भी घर पर नहीं है। मेरा टाइम पास भी हो जाएगा।

दीदी: अच्छा ठीक है अंकल जी।

और दीदी और अंकल झोपड़ी में चले गए और दरवाजा लगा लिया।

अब मैं अंदर देखने के लिए कोई जगह देख रहा था लेकिन मेरे को कोई जगह नहीं मिली तो मैं प्लास्टिक हटाकर गेट के पास गया और गेट टूटा हुआ था तो उसमें से अंदर देखने लगा।

आगे क्या हुआ पढ़िए अगले पार्ट में।

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