बूढ़े चौकीदार और जवान बहुरानी 5
Budhe chokidar se jawan bahurani chud gyi:- इस कहानी का पिछला पार्ट बहुत मजेदार था, तो कहानी का पूरा मज़ा लेने के लिए, इस कहानी को शुरू से पढ़ना तभी मज़ा आएगा। तो अगर पिछले पार्ट पढ़ना चाहते है तो नीचे लिंक है वहाँ से पढ़ लें । अब आगे की कहानी शुरू होती है ।
Part 4 ==> बूढ़े चौकीदार और जवान बहुरानी 4
Budhe chokidar se jawan bahurani chud gyi
बिरजू थोड़ा लाउडली बोला—
बिरजू: बहुरानी अब का ये एहसान मैं कभी भी भूलूँगा नहीं… आह्ह… मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।
स्नेहा ये सुनके कुछ न कहा। अब बिरजू काका की हर बात उसे अच्छी लगने लगी। बहुत दिनों बाद किसी ने उसकी खूबसूरती का जिक्र किया। उसे शर्म भी आ रही थी और एक्साइटेड भी हो चुकी थी। लेकिन जो शर्त बिरजू को बोली थी, उसने देखा बिरजू इससे भी ज्यादा माँग रहा है।
उसे बिरजू की सब बातें अच्छी लगने लगीं। शर्म की वजह से वो मुड़कर देख न सकी। हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी कि एक बार देख लूँ बिरजू काका कैसे लंड को सहला रहे हैं और वो उससे आनंद लेकर उनके चेहरे का रूप कैसा दिख रहा है। ये चाहकर भी मुड़कर नहीं देखा। लेकिन थोड़ी देर बाद ही बिरजू ने रिक्वेस्ट की—
बिरजू: आह्ह्ह्ह… बहुरानी आपकी ये गाँड बहुत ही सुंदर है। ये तो मेरी बीवी की गाँड जैसी ही है। जब मेरी बीवी थी तब उसकी गाँड को मैं बहुत चूसता था और चाट भी ली थी।
स्नेहा लाज-शर्म से एकदम पानी-पानी हो गई ये सब बातें सुनके। बिरजू बहुत ही आगे बढ़ चुका था। स्नेहा ने अब यहाँ से चले जाना मुनासिब समझा। लेकिन अब बिरजू रोने का ढोंग करने लगा और बताया—
बिरजू: (रोते-रोते) बहुरानी अगर मेरी बीवी जिंदा होती तो मैं उसकी गाँड के साथ जो मन आता करता। क्योंकि मेरे ये जो गुप्त अंग हैं, इससे जो निकलना था वो अभी भी नहीं निकल रहा है। शायद जरा एक बार आपकी गाँड को छू सकूँ तो हो जाएगा मेरा। शायद हो जाता… मुझे मालूम है… देखिए ना अभी भी थोड़ा दर्द मेरे इस गुप्त अंग में हो रहा है। हाय मैं अब क्या करूँ…
आह्ह्ह्ह… लंड सहलाते हुए कहा। पहले तो धोती के ऊपर से ही सहला रहा था। अब धोती खोलके पैरों तक रख दी और वहाँ से अपनी दनौती कठोर गुप्त अंग यानी उसका अकड़ा हुआ लंड बाहर करके सहला रहा था।
स्नेहा बेहक गई थी। ऐसी सिचुएशन में मदहोशी छा जाती है तन-मन पर। उसके बदन में एक अद्भुत कंपन हो रही थी। वो मन ही मन कहने लगी—
स्नेहा: उफ्फ… कैसी मुसीबत है ये इस काका को। अब क्या करे… इतने से भी नहीं होता इनको…
ये सोचके स्नेहा बिरजू बुड्ढे को मुड़कर न देखते हुए उसके बहुत पास आकर खड़ी हो गई।
दृश्य कुछ ऐसा था कि स्नेहा की गाँड बिरजू के मुँह के बराबर आ गई थी। बिरजू के पैर तो बंधे थे लेकिन उसके हाथ तो खुले थे। जब स्नेहा पास आई और ऐसे खड़ी हुई, बिरजू बहुत एक्साइटेड हो गया और और भी बढ़ गया लंड की धार। उसने अपने आप को काबू में न रखते हुए एक पल भी देरी न की और अचानक ही अपनी दोनों हाथों से स्नेहा की गाँड को पकड़ लिया और गाँड की दो गोलाइयों को बड़े मजे से सहलाने लगा।
बिरजू: हाय्य्य… हाय्य्य… आह्ह्ह्ह… उम्मम्म… क्या गाँड है रे…
कहकर दो गोलाइयाँ फाड़ने की कोशिश करने लगा। स्नेहा ने बिरजू का इरादा समझ लिया। अब स्नेहा थोड़ा सा झुक गई जिसके वजह से उसकी गाँड की जो फूदी थी वो खुल गई और बिरजू बुड्ढे ने कुछ पल हैरान होकर देख रहा था कि एक गाँड ऐसा भी हो सकता है कि इसको सारा दिन भर चाटू, चूमू, सुंघाता रहूँ… शायद अब देख भी लिया… आह्ह्ह्ह… मन भर गया रे…
ये कहके बिरजू भी थोड़ा झुककर अपना सर गाँड की गुलाबी फूदी के सामने ले आया और अचानक ही अपनी जीभ उस गाँड की गुलाबी फूदी में डालकर चाटने लगा।
ऐसी अचानक गाँड की फूदी में हमले से स्नेहा का पूरा बदन एक अद्भुत गुदगुदी से हिल गया और उसके मुँह से—
स्नेहा: आह्ह्ह्ह…
शब्द पहली बार बिरजू बुड्ढे को सुनाई दिया। जो शब्द सुनके बिरजू और भी एक्साइटेड हो गया।
स्नेहा: आह्ह्ह्ह… काका मत करो… अब हो गया ना… मैं जाती हूँ…
स्नेहा वहाँ से ये बोलके चली गई और बिरजू बुड्ढे चौकीदार एक चैन की साँस लेते हुए लंड को अपने हाथों से पकड़कर स्नेहा के जाने की ओर देखता रह गया।
बिरजू: आह्ह्ह्ह… श्श्श्श… आज तो मजा आ गया रे… क्या माल है रे… अब तो ये मेरे काबू में आ गया… मैं कितना खुशनसीब हूँ कि इतना बड़ा घर की एक औरत को चोदने जा रहा हूँ। अब और देरी नहीं… इसी जल्दी ही अपनी घोड़ी बनाकर चुदूँगा… हाहाहा…
एक मुस्कान देते हुए बिरजू थरकी बुड्ढे, जो कि एक लो क्लास चौकीदार था और बदसूरत भी, लेकिन खुशनसीब जो कि स्नेहा जैसी एक भरा-भरा सेक्सी जिस्म की माल को चोदने का मौका पाया है।
स्नेहा कमरे से बाहर जाती है और दूसरे एक कमरे में जाके अपने कपड़े बदल लेती है। सारी रात कई सवाल मन में सोच रही थी स्नेहा—
स्नेहा: ये क्या किया मैंने आज… क्या मैंने ठीक किया… नहीं नहीं… मैंने भूल कुछ भी नहीं की… मैंने एक बीमार आदमी की मदद की… एक शरीफ बुजुर्ग आदमी की मदद की… एक लाचार आदमी की जिसकी बीवी नहीं है इस दुनिया में… आखिर ये भी तो एक इंसान है… इसकी भी तो चाहत हो सकती है… उनका कोई दोष नहीं… अगर वो खराब आदमी होता तो मेरे साथ जबरदस्ती कर सकता था… मुझे वहाँ से चले आना शायद ठीक नहीं हुआ… लेकिन क्या करूँ… मुझे बहुत ही शर्म और बहुत ही गुदगुदी हो रही थी…
ये ही सोचके सो जाती है।
और वहाँ बिरजू बुड्ढे ने भी अपने लंड से पानी न उतारते हुए सो जाता है एक चैन की साँस लेकर।
अगले दिन सुबह-सुबह जब तैयार होती है साड़ी पहनके तब अचानक ही बिना परमिशन के ही बिरजू काका स्नेहा के रूम में आकर बोलता है—
बिरजू: कैसे हो बहुरानी?
स्नेहा फौरन उनकी तरफ एक बार देखती है और फिर अपनी नजरें नीचे रखकर ही बात करने लगती है—
स्नेहा: जी ठीक हूँ काका… आप ठीक तो हैं ना?
बिरजू: (मन में) हाय मैं मर जाऊँ… कैसे ठीक रह सकता हूँ तेरे बिन… बस आज एक बार तू मेरी हो जा… फिर तो मैं जन्नत की सैर कर आऊँगा…
स्नेहा: क्या सोच रहे हैं काका?
बिरजू: जी हाँ हाँ… मैं भी ठीक ही हूँ… लेकिन एक समस्या हो गई है… हमारी गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया और टायर की दुकान आसपास नहीं है… गाड़ी ठीक करने में शायद बहुत देर हो जाएगा… इसलिए मैं चाहता हूँ कि अब आज भी यहाँ ठहर जाएँ हम… बाकी सब बंदोबस्त कर लूँगा… आप सिर्फ मान जाएँ…
स्नेहा ने एक बार बिरजू काका की तरफ देखा। उनकी आँखों में अभी भी हवस थी। उनकी आँखें स्नेहा के बूब्स के बराबर देख रही थीं। लेकिन स्नेहा ने कुछ नहीं कहा। कुछ पल के लिए चुप थी और कहा—
स्नेहा: ठीक है काका… अब करें भी तो क्या करें…
ये कहने का मतलब ये था कि बिरजू बुड्ढे को आज रात एक और चांस मिलने वाला था। इसलिए मन ही मन बिरजू बहुत खुश हुआ।
जब रात हुई स्नेहा कमरे में थी। साड़ी पहनती थी। खाना खाके सोने ही वाली थी कि जब अपने रूम का दरवाजा बंद करने का समय आता तब सोचा कि दरवाजा को अब लगाने की जरूरत नहीं है… ये खोलकर ही रख दूँ…
आज स्नेहा कल की रात की तरह बिरजू काका को नहीं बुलाया अंदर… लेकिन मन ही मन स्नेहा ने भी बिरजू काका की मौजूदगी का इंतजाम किया।
स्नेहा: उफ्फ… ये क्या हो गया मुझे… क्यों उनके बारे में सोच रही हूँ… मुझे अब सो जाना चाहिए…
लाइट ऑफ करके डिम लाइट ऑन करके अपने कमरे में सो जाती है स्नेहा। कुछ ही पल बाद स्नेहा ने महसूस किया कि उसके कमरे में कोई आया है। रूम उतना अँधेरा भी नहीं था। स्नेहा ने मुड़कर नहीं देखा कि कौन है… लेकिन मालूम था कि कौन आया है।
कोई कुछ नहीं कहा। बिरजू काका अब स्नेहा के घर घुसकर डिम लाइट में ही स्नेहा को अपनी आँखों से स्कैन कर लिया और अपनी धोती को खोल लंड पकड़कर स्नेहा के बेडरूम के सामने आकर खड़े हुए और बैठ जाते हैं।
स्नेहा: (अचानक मुड़कर) काका… आप…
बिरजू: श्श्श्श… चुप रहिए बहुरानी… मैं अपनी दर्द को आज पूरा का पूरा मिटाने आया हूँ… मुझे मदद कीजिए…
ये कहके लाइट ऑन कर देता है और स्नेहा को बिरजू काका की मूसल जैसा लंड दिखाई देता है। ये लंड गोपीलाल से भी ज्यादा मोटा लग रहा था स्नेहा को। अब स्नेहा इतनी बेहक चुकी थी कि क्या कहे… सारा दिन लंड के बारे में सोच लिया था… अब सामने ही एक काला मजबूत कठोर लंड दो कोस्तो जैसा बड़े-बड़े अंडकोष लेकर अकड़ा हुआ था।
बिरजू बुड्ढे बहुत ही एक्साइटेड था इसलिए लंड को थोड़ा सा सहलाया तो वो अपनी आकार ले चुका था। और वो दृश्य स्नेहा अपनी आँखों से कुछ पल के लिए सिर्फ देखती ही रह गई।
स्नेहा: काका ये ठीक नहीं है… आप जाएँ यहाँ से…
बिरजू: नहीं बहुरानी… आप कुछ गलत नहीं कर रही हैं… मैं तो आपके पास आया हूँ अपनी कर्ज पूरा करने…
स्नेहा: मतलब…?
स्नेहा ये दूसरी तरफ देखते हुए कहती है क्योंकि बिरजू का लंड जैसा लंड आज तक स्नेहा ने नहीं देखा था। इतना बड़ा और मोटा… गोपीलाल से भी ज्यादा था। लंड की तरफ जब उसने पहले देखा था तो उसे अपनी चूत पर हाथ डालने को मन किया और लंड को ही देखकर चूत को मसलने का मन कर रहा था… लेकिन काका के सामने नहीं किया… बहुत ही बेहक गई थी स्नेहा।
बिरजू काका ने एकदम सही जगह पर तीर मारा। अपना लंड देखकर अब स्नेहा काफी नरम हो गई थी। उसकी आँखों को देखकर बिरजू काका ने पढ़ लिया था कि ये जो स्नेहा कहती है कि ठीक नहीं है… दरअसल ये उसकी असली बात नहीं है… ये तो सिर्फ दिखावा है।
बिरजू: बहुरानी मैं जानता हूँ आपके अंदर क्या गुजर रहा है… आप भी तो एक इंसान हैं… ये समाज के नियमों को और कितना पालन करेंगी… एक बार अपनी खुशी से अपना जिंदगी जी लीजिए… और मुझे भी अपनी अधूरी कामना समाप्त करने दीजिए…
ये कहते ही स्नेहा के दोनों हाथ पहले पकड़ लेता है बुड्ढे बिरजू ने… लेकिन स्नेहा अचानक करने से थोड़ी शर्मा गई और बेडरूम से दौड़ती हुई विंडोज के बराबर चली जाती है। बिरजू काका अब साड़ी में उसकी बैक साइड को देख रहा था।
बिरजू: आह्ह्ह्ह… क्या मस्त बदन है रे… (मन ही मन) आजा मेरे पास… मैं तुझे अब बाहों में घेर लूँगा…
ये कहके स्नेहा के पास जाके खड़े होते हैं और पीछे से जकड़ लेते हैं। और स्नेहा की पीठ-गर्दन में बिना देरी लिए चूमना शुरू कर देते हैं।
बिरजू: आज कुछ भी न कहो बहुरानी… आप मेरी बीवी जैसी हैं… मैं आपको नहीं… मानो कि मैं अपनी बीवी के साथ हूँ और ये सब कर रहा हूँ… और ये भी समझ लेना कि मैं आपकी कर्ज पूरा कर रहा हूँ… आपने जो कल रात मेरी मदद की… मेरी बातें सुनीं… मैं भी आज आपको शांत करूँगा… आपकी अंदर की चाहत को पूरा करूँगा… बहुरानी आप फिक्र मत कीजिए… आप मुझ पर भरोसा रखिए… कोई कुछ नहीं जान पाएगा… हमारे बीच जो भी होगा हमारे बीच ही रहेगा…
स्नेहा ये सब बातें सुनके एक्साइटेड हो गई और मुड़कर दूसरी तरफ देखने लगी। तभी बिरजू बुड्ढे स्नेहा के कंधों को चूमना-चाटना शुरू किया।
स्नेहा: आह्ह्ह्ह… काका… उफ्फ्फ… उम्मम्म… मत कीजिए… मुझे कुछ हो रहा है… आह्ह्ह्ह…
स्नेहा के करीब आने से बदसूरत बिरजू बुड्ढे के शरीर की स्मेल स्नेहा की नाक में घुसने लगी। स्नेहा ने देखा कि बिरजू काका से बदबू आ रही है, लेकिन फिर भी स्नेहा ने कुछ नहीं किया। ये बदबू भी सहन कर ली।
बिरजू ने ध्यान दिया स्नेहा को अच्छी तरह से चूमने में। और स्नेहा इतनी बेहक गई थी कि लाचार थी। कुछ न कहके चुपचाप खड़ी रही और अपने आप को इस लो क्लास बदसूरत बुड्ढे चौकीदार को सौंप दिया।
उधर शारदा देवी गोपीलाल को कह रही थीं—
शारदा: अरे गोपीलाल तुम्हें अभी के अभी ही बीमार होना था?
गोपीलाल: क्यों रानी साहेबा?
शारदा: कल तुमको बीमार देखा था तो चौकीदार को रूपनगर भेज दिया स्नेहा बहुरानी के साथ जाने को जमींदारी काम करने। लेकिन आज नहीं आया। ना जाने क्या हुआ है।
गोपीलाल: (मन ही मन) अरे मेरा नसीब कितना बुरा है… बहुरानी के साथ मेरे जाने का एक बेहतरीन मौका था… मैं उसे भी गँवा दिया… हाय मेरी किस्मत… खोटे किस्मत… बीमार अभी ही होना था…
तब ये सोचके बताता है—
गोपीलाल: रानी माँ आप चिंता मत कीजिए। वो दोनों शायद किसी काम में फँसे हुए हैं इसलिए नहीं आ सका। कल आ जाएगा… देख लेना।
कौन जानता था कि उन दोनों ऐसी काम में व्यस्त हैं। कौन जानता था कि उन दोनों ने अब एक ऐसी काम में फँस गए हैं जिससे इन दोनों को जुदा करना बहुत ही मुश्किल हो चुकी है। यहाँ तक कि अगर स्नेहा और बिरजू काका भी अपनी मर्जी से उस फँसे हुए जाल से मुक्त नहीं हो पाएँगे। ऐसी सिचुएशन में थे उन दोनों।
जिस समय ये दोनों बातें कर रहे थे गोपी और शारदा, ठीक उसी समय बुड्ढे थरकी बिरजू ने बड़े मजे से स्नेहा को बेड में लिटाकर उसके गाल-गर्दन को चूमने में व्यस्त थे।
स्नेहा बहुत ही शर्मा रही थी। पहली रात तो सिर्फ अपनी चूत को बिरजू काका को चाटने दी थी और आज अपने आप को पूरी तरह देने वाली है। स्नेहा का तन-बदन एकदम गरम हो चुका है और और भी गरम होते जा रहा है।
ऐसे बदन पर खुशनसीब बुड्ढे बिरजू ने छुआ था जो कि कई दिनों से भूखा है और प्यासा है। कितने दिनों से ये बदन भरा पड़ा था और आज बिरजू के कठोर हाथों से सहलाने से पूरा बदन में मानो करंट दौड़ गया हो।
गाल और होठों को चूमते-चूमते बुड्ढा मदहोशी और पागल जैसा हो गया था।
बिरजू: आह्ह्ह्ह… बहुरानी आप क्या चीज हो… बहुरानी… आह्ह… मजा आ गया बहुत…
ये सब बात अब बिरजू स्नेहा को सुनाकर ही बोल रहा था। स्नेहा हैरान होकर सुन रही थी और बिरजू बुड्ढा जैसे उसके बदन को चूमना-चाटना शुरू किया था स्नेहा हैरान और ताज्जुब हो गई। लगता है एक भूखा आदमी उसे मन भरकर खा रहा है। कई दिनों से भूखा है… आज ऐसी चीज पाया है कि पागल हो गया है… क्या से क्या करेगा समझ नहीं आ रही है बुड्ढे को।
स्नेहा यही सोच ही रही थी कि अचानक बुड्ढे बिरजू काका उसकी साड़ी को हटा देते हैं और उसके बूब्स पर हमला करते हैं। ब्लाउज के ऊपर से ही बूब्स रगड़ रहे थे दोनों हाथों से। मुँह से चाटना भी शुरू कर दिया और कुछ ही पल में थोड़ा और नीचे झुककर स्नेहा के पेट को चूम लेता है।
स्नेहा: आह्ह्ह्ह…
स्नेहा का गोरा पेट बहुत ही कामुक था। पागलों की तरह बिरजू काका ने चूमना और चाटना जारी रखा। लेकिन बिरजू ने नोटिस किया कि स्नेहा साड़ी नाभि के नीचे पहनी है तो बिरजू काका उसकी पेटीकोट को साड़ी समेत थोड़ा नीचे खींच लिया और स्नेहा की पागल करने वाली गहरी नाभि बिरजू बुड्ढे को अपनी आँखों के सामने दिखाई दी।
बिरजू चौकीदार ने नाभि को देखकर बोला—
बिरजू: हाय मैं मर जाऊँ… आह्ह्ह्ह… बहुरानी आपका जवाब नहीं… कितनी खूबसूरत हैं आप और आपकी ये नाभि कितनी बड़ी है… आज तो मैं इसे बड़े ही मजे से चाटूँगा… हाँ… उम्मम्म…
बिरजू ने ये कहकर नाभि में अपने होठ डाल दिए। नाभि में अपनी जीभ डालकर नाभि का मजा लेने लगा और इधर स्नेहा ने आँखें बंद करके ही रखा था और नाभि को ऐसे चूमने से उसके मुँह से एक-दो बार सिसकारी आने लगी।
स्नेहा: आह्ह्ह्ह… काका… उम्म… बस कीजिए आप… अब तो हद कर दी…
दरअसल स्नेहा ने समझ लिया था कि इस बुड्ढे ने जैसे उसे सेड्यूस किया, चूमा… ऐसे अंदाज में उसके पति ने कभी भी उसके साथ नहीं किया था। और ऐसी इरोटिक तरीका भी उसके पति नहीं जानता था। वो तो सिर्फ कपड़े खोलके ही डायरेक्ट चूत में अपना लौड़ा डाल देता था। लेकिन आज जिस तरीके से स्नेहा को बिरजू बुड्ढे ने भोग रहा था, अपने आप को और कंट्रोल न कर पाई तो बेड से अचानक उठकर खड़ी हो जाती है स्नेहा।
स्नेहा जाने की नाकाम कोशिश करती है क्योंकि बिरजू ने उसे पकड़ लिया। उसके हाथ पकड़कर वो भी खड़े हो जाते हैं और पीछे से उसकी पेट को मसलते रहते हैं।
बड़े ही मजे से पेट और नाभि को सहलाने लगता है दोनों हाथों से बिरजू थरकी बुड्ढा।
स्नेहा: आह्ह्ह… काका छोड़िए ना… मुझे जाने दीजिए… मैं अब और नहीं रह सकती आपके पास…
बिरजू ने समझ गया था कि ये लड़की बिल्कुल बेहक गई है। ये जो बोल रही है उसमें कोई कठोरता नहीं… ये बोलती रहती है “जाने दीजिए” लेकिन अंदर ही अंदर ये बहुत गरम हो चुकी है। अभी तो मौका पूरा का पूरा फायदा लेने का।
बिरजू ने सुना नहीं… पेट और नाभि को मसलते रहना जारी रखा। पीछे खड़े हुए बुड्ढे बिरजू का अकड़ा हुआ लंड बार-बार स्नेहा की गाँड में टकरा रहा था। स्नेहा ने समझ लिया कि वो क्या चीज थी जो बार-बार गाँड में लग रही है।
स्नेहा (मन में): आह्ह्ह्ह… कितना कठोर है इनका वो चीज… मैंने सोचा भी नहीं था कि इतना सख्त और इतना बड़ा किसी का लंड हो सकता है… और वो भी इस उम्र में… हाय राम!
फिर अपनी ओर खींच लेता है और थोड़ा सा प्रेशर देके स्नेहा को बेड पर फिर लिटा देता है। स्नेहा की पेटीकोट के अंदर कोई पैंटी नहीं थी। स्नेहा को दोनों हाथों से अपनी धोती के ऊपर लाके बैठा देता है बिरजू काका और अपनी धोती खोलके लंड को बाहर कर देता है।
बाहर होते ही लंड साँप की तरह लग रहा था। एक काला साँप… उसकी मुँडीय और टोपा था गुलाबी। स्नेहा ने लंड को न देखते हुए ही जैसे-जैसे बुड्ढे बिरजू ने किया वैसे ही हिलने-डुलने लगी और मदहोशी में आकर बिरजू के लंड के बराबर बैठ जाती है।
बैठ जाने से पेटीकोट की वजह से लंड बराबर स्नेहा की चूत में आने नहीं पा रहा था तो बिरजू ने खुद अपने हाथों से पेटीकोट को हटाया और चूत के बराबर खड़े हुए लंड को ले आता है और स्नेहा को एक इशारा करते हैं लंड के बराबर बैठ जाने को।
स्नेहा ने अपनी आँखें बंद ही रखी थीं लेकिन इस समय बिरजू का इशारा समझने के लिए उसकी तरफ देखा और कुछ न कहा… सिर्फ देखती रह गई। बिरजू ने स्नेहा की हेल्प की। बिरजू ने खुद ही थोड़ा ऊपर कर ली अपनी लंड को। लंड एकदम खड़ा नहीं था… उन्होंने अपने हाथ को इस्तेमाल किया खड़े रखने में और स्नेहा को लंड के बराबर सेट करके दोनों हाथों से बैठा दिया।
और लंड इस बार बिल्कुल स्नेहा की चूत को छू लेता है। एक बार छूने से स्नेहा को गुदगुदी होती है और दो-तीन बार के बाद लंड और भी सख्त हो जाता है और इस बार चूत की परदे को छेदकर अंदर जाने की कोशिश करता है।
काला लंड गोरे-गुलाबी चूत के अंदर थोड़ा सा घुस जाता है और स्नेहा—
स्नेहा: आह्ह्ह्ह…
कहती है। इस बार थोड़ा जोर से स्नेहा ने “आह्ह्ह्ह” शब्द कहा था। एक-दो बार करने के बाद लंड और भी ज्यादा चूत के अंदर घुसा और स्नेहा की इस बार चीखें सुनाई दीं बिरजू को।
बिरजू: आआआह्ह्ह… बहुरानी… आखिरकार आपको चोद ही लिया मैंने… आह्ह्ह्ह… मजा आ गया… आह्ह्ह्ह… ये लीजिए…
कहके जोर से स्नेहा को ऊपर-नीचे करने लगे और लंड पूरा का पूरा चूत में घुस जाता है।
अब स्नेहा ने खुद ही आनंद में ऊपर-नीचे बुड्ढे बिरजू की गोद चुदाई खाने लगती है।
स्नेहा: आह्ह्ह्ह… उफ्फ्फ… आआआह्ह्ह… उम्मम्म…
बिरजू: आआआह्ह्ह… लीजिए बहुरानी… लीजिए जितना चाहिए… मन भरकर लीजिए… आआआआ!!!!!
स्नेहा: आह्ह्ह्ह… आआआह्ह्ह… उफ्फ… धीरे… आह्ह…
आगे क्या हुआ पढ़िए अगले पार्ट में। कहानी जारी रहेगी…
