मेरी पाकीज़ा ज़िंदगी की तबाही 1

Samreen ki paak life me chudai;-ज़िंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कभी-कभी अल्लाह हमारी आज़माइश के लिए हमारे रास्ते में थोड़े काँटे बिखेर देता है, ताकि हम सब्र और मेहनत का दामन थामें और उसके और करीब हो जाएँ।

मेरा नाम समरीन है। मेरी उम्र 34 साल है, और मैं एक निकाह-शुदा औरत हूँ। मेरा निकाह आसिफ से हुआ है, जो बेहद नेक, नरम-दिल और दीनदार इंसान हैं। हम दोनों की ज़िंदगी हमेशा से सादगी और सुकून के साथ गुज़री है। अल्लाह ने मुझे सूरत और सीरत दोनों से नवाज़ा है, और मैं हमेशा कोशिश करती हूँ कि अपने पर्दे और दीनी अकीदों की पूरी हिफ़ाज़त करूँ। मेरे लिए पाकीज़गी और हया ही एक औरत का सबसे बड़ा गहना हैं।

Samreen ki paak life me gair mard se chudai ki entry

लेकिन पिछले कुछ महीनों से हमारे घर के हालात थोड़े बदल गए हैं। आसिफ की एक छोटी सी दुकान है किताबों, इत्र और वील की। कुछ वक्त से बाज़ार की मंदी और दुकान के किराए में बढ़ोतरी की वजह से हमारा फाइनेंशियल स्ट्रगल शुरू हो गया। आसिफ के चेहरे पर वो फिक्र की रेखाएँ मुझे अंदर ही अंदर तकलीफ़ देती थीं, जो वो मुझसे छुपाने की कोशिश करते थे। एक दिन मैंने तय किया कि मैं उनका हाथ बटाऊँगी। मुझे बचपन से ही मेहंदी लगाने का बहुत शौक था, और पूरे मोहल्ले में लोग मेरे मेहंदी के डिजाइन्स की तारीफ़ करते थे। मैंने सोचा, क्यों न इस हुनर को अपनी ताक़त बनाऊँ?

उस सुबह, मैंने हमेशा से थोड़ा जल्दी उठकर दुआ माँगी कि अल्लाह मेरे इस नए क़दम में बरकत डाले और मेरी हया और इज़्ज़त की हिफ़ाज़त फ़रमाए। मैंने घर का सारा काम निपटाया। आसिफ दुकान के लिए निकलने वाले थे और हमारे घर के उस बक्से जैसे पुरानी टीवी पर न्यूज़ देख रहे थे।

बीबीसी न्यूज़ पाकिस्तान, “लाहौर की मशहूर कुरैशी जनरल स्टोर के मालिक की इकलौती बेटी माहिरा कुरैशी ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे पूरे मुल्क में सनसनी है”, आइए यहाँ के कुछ लोगों से पूछते हैं कि माहौल कैसा है, रिपोर्टर ने एक बंदे से पूछा “आप ज़रा बताएँ कि यहाँ असल में मसला क्या हुआ पाईजान”, “अरे ना करें जानब ना करें… देखें हम यहाँ अपने काम के सिलसिले में आए हैं… हमें कुछ मालूम नहीं है पाईजान… आप किसी और से पूछें…” उस आदमी ने कहा।

तभी मैंने टीवी बंद कर दिया क्योंकि दूसरे मुल्क के न्यूज़ से हमारा क्या लेना-देना। मैंने उन्हें चाय पेश की और बहुत ही नरम आवाज़ में अपने इस फ़ैसले के बारे में बताया।

समरीन: आसिफ, मैंने सोचा है कि मैं शादी-ब्याह और त्योहारों के इस सीज़न में मेहंदी लगाने का काम शुरू करूँ। मेरी एक सहेली ने एक बड़े पार्लर में बात की है, जहाँ सिर्फ़ ख़वातीन आती हैं।

आसिफ ने मुझे थोड़ी फ़िक्र से देखा, फिर उन्होंने मुस्कुराकर मेरा हाथ थामा।

आसिफ: समरीन, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। बस इस बात का ख़याल रखना कि जहाँ भी जाओ, तुम्हारा पर्दा और तुम्हारी पाकीज़गी बरक़रार रहे।

मैंने उन्हें पूरा यक़ीन दिलाया। उनके निकलने के बाद, मैंने आईने के सामने खड़े होकर ख़ुद को देखा। अल्लाह ने मुझे ख़ूबसूरती बख़्शी है, लेकिन उस ख़ूबसूरती का असली पर्दा मेरी हया है। मैंने अपनी काली आबाया निकाली, जिसे पहनकर मुझे हमेशा एक अजीब सा सुकून मिलता था। मैंने उसे पहना, और बहुत ही सलीक़े से अपने सर पर काला वील बाँधा, जिससे सिर्फ़ मेरा चेहरा नुमायाँ हो रहा था। मेरे चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था, बस एक पाकीज़ा चमक थी जो शायद सुबह की नमाज़ की वजह से थी। अपने हाथ में एक छोटा सा पर्स लिए, जिसमें मैंने मेहंदी के कोन्स, कुछ डिजाइन्स की फ़ोटोज़ और थोड़ा ज़रूरी सामान रखा था, मैं घर से निकल पड़ी।

मेरा रुख़ शहर के एक मशहूर लेडीज़ पार्लर एंड मेहंदी सेंटर की तरफ़ था। जब मैं वहाँ पहुँची, तो बाहर से ही हलचल साफ़ महसूस हो रही थी। ईद और शादियों का महीना होने की वजह से वहाँ काफ़ी भीड़ थी। मैंने अंदर क़दम रखा। पार्लर का माहौल पूरी तरह से ख़वातीन के लिए महफ़ूज़ था, इसलिए मैंने वहाँ जाकर अपना वील थोड़ा ढीला किया और आबाया को संभाला। वहाँ काफ़ी सारी औरतें पहले से ही बैठी हुई थीं। कुछ अपने बाल सेट करवा रही थीं, तो कुछ फ़ेशियल लगवा रही थीं, लेकिन सबसे ज़्यादा भीड़ मेहंदी के सेक्शन में थी। हवा में इत्र, मेहंदी और गुलाब जल की एक मिलती-जुलती, बहुत ही प्यारी ख़ुशबू बिखरी हुई थी।

वहाँ की मैनेजर, फ़रहा बाजी, मुझे देखते ही आगे बढ़ीं।

फ़रहा बाजी: अस्सलामुअलैकुम, समरीन! तुम्हारा ही इंतज़ार था। तुम्हारी सहेली ने तुम्हारे हुनर की बहुत तारीफ़ की थी। आज हमारे पास बहुत क्लाइंट्स हैं, चलो जल्दी से शुरू हो जाओ।

मैंने उन्हें सलाम किया।

समरीन: वालाikumसलाम फ़रहा बाजी, मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगी।

फ़रहा बाजी ने मुझे एक आरामदायक कुर्सी पर बिठाया। मेरे सामने एक बड़ी मेज़ थी और आस-पास काफ़ी सारी औरतें बैठी थीं, जो आपस में हँस-बोल रही थीं। उनमें से कुछ औरतें मुझे बड़े ग़ौर से देख रही थीं। शायद उन्हें मेरा इतना दीनी और पर्दा-नशीन होना, और साथ ही इस तरह के काम में आना थोड़ा अलग लग रहा था। मेरी पहली क्लाइंट एक नई-नई बेगम थीं, जिनका नाम शाज़िया था। वो थोड़ी परेशान थीं क्योंकि उन्हें बहुत ही बारीक़ी वाला अरबी डिज़ाइन चाहिए रखना था।

शाज़िया: बाजी, मुझे ऐसी मेहंदी चाहिए जो बहुत घनी हो और रंग भी बहुत गहरा आए।

मैंने मुस्कुराकर अपने पर्स से मेहंदी का कोन निकाला।

समरीन: आप बेफ़िक्र रहिए, अल्लाह ने चाहा तो डिज़ाइन भी अच्छा बनेगा और रंग भी चोखा चढ़ेगा।

मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। उनके नरम हाथ पर जैसे ही मैंने कोन चलाना शुरू किया, मेरी उँगलियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद एक जादुई रफ़्तार से चलने लगीं। मैंने बिना किसी झिझक के, बहुत ही ख़ूबसूरत फूल, पत्तियाँ और बारीक़ जाली का काम शुरू किया। मेरे हाथों की सफ़ाई देखकर आस-पास बैठी दूसरी औरतें भी पास आकर खड़ी हो गईं।

एक बुज़ुर्ग ख़ातून: माशाल्लाह, समरीन! तुम्हारे हाथों में तो सच में जादू है।

मैंने निगाहें नीचे रखते हुए कहा।

समरीन: सब अल्लाह का करम है, अम्मी जान।

पर आने वाली औरतों की संख्या बढ़ती जा रही थी। अब तक मैंने पाँच-छह औरतों को मेहंदी लगा दी थी। काम करते-करते, वहाँ बैठी औरतों से बातें भी हो रही थीं। वो सभी घरेलू और दीनी मिज़ाज की थीं, इसलिए मेरी उनसे काफ़ी अच्छी बनती चली गई। एक ख़ातून, जिनका नाम राज़िया था, उन्होंने मुझसे पूछा।

राज़िया: समरीन, तुम दिखने में इतनी हसीन हो, और तुम्हारा अंदाज़ भी इतना पाकीज़ा है। तुम्हारे शौहर क्या करते हैं?

मैंने बिना किसी झेप के सच्चाई बताई।

समरीन: जी उनकी एक छोटी सी दीनी चीज़ों की दुकान है। बस आजकल बाज़ार के हालात थोड़े ठीक नहीं हैं, तो मैंने सोचा उनका साथ दूँ।

मेरी बात सुनकर वहाँ बैठी कई औरतों के दिलों में मेरे लिए इज़्ज़त और बढ़ गई। राज़िया जी ने मेरे सर पर हाथ रखा।

राज़िया: अल्लाह तुम्हारे रिज़्क़ में बरकत दे और तुम्हारे निकाह को हमेशा सलामत रखे। आज के दौर में ऐसी समझदार और नेक बीवी मिलना नसीब की बात है।

उनकी बातों से मुझे अंदर से एक अजीब सा हौसला मिला। जो डर और हिचकिचाहट सुबह घर से निकलते वक़्त मेरे दिल में थी, वो अब पूरी तरह से ग़ायब हो चुकी थी। मुझ जैसी एक आम, दीनी और पर्दा-नशीन औरत के लिए, घर से बाहर निकलकर काम करना आसान नहीं था, लेकिन जब मक़सद साफ़ हो और नीयत में पाकीज़गी हो, तो रास्ते ख़ुद-ब-ख़ुद आसान हो जाते हैं।

दोपहर की अज़ान की आवाज़ जब क़रीब की मस्जिद से आई, तो मैंने थोड़ी देर के लिए काम रोक दिया। फ़रहा बाजी ने पार्लर के अंदर ही एक छोटा सा कोना नमाज़ के लिए बनाया हुआ था। मैंने वहाँ जाकर नमाज़ पढ़ी और बहुत ही सुकून से नमाज़ अदा की। नमाज़ के बाद मैंने अपने पर्स से थोड़ा सा खाना निकाला जो मैं घर से लाई थी।

अभी मैं खाना खा ही रही थी कि फ़रहा बाजी दौड़ती हुई आईं।

फ़रहा बाजी: समरीन, जल्दी करो! एक बहुत ही ख़ास क्लाइंट आई हैं। वो शहर के एक बड़े पक्की-साख वाले ख़ानदान से हैं। उन्हें किसी ख़ास फ़ंक्शन में जाना है और उन्हें सबसे बेहतरीन आर्टिस्ट चाहिए। मैंने उन्हें तुम्हारा नाम दिया है।

मैंने अपना हाथ धोया, अपनी आबाया और वील को दोबारा सही किया और अपनी जगह पर आकर बैठ गई। जो ख़ातून आई थीं, उनका नाम यास्मीन बेगम था। वो काफ़ी रौबदार और अमीर घराने की लग रही थीं, लेकिन उनके मिज़ाज में एक ठहराव था।

उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, शायद मेरे इस सादगी भरे पर्दे को देखकर वो थोड़ा हैरान थीं।

यास्मीन बेगम: तो तुम हो समरीन? मैंने सुना है तुम बहुत हसीन डिज़ाइन बनाती हो।

समरीन: जी, बेगम साहिबा। अल्लाह ने जो थोड़ा बहुत हुनर दिया है, वही पेश करती हूँ।

यास्मीन बेगम ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उनके हाथ पर मेहंदी लगाना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि उन्हें एकदम ट्रेडिशनल डिज़ाइन चाहिए था, जिसमें काफ़ी बारीक़ी और सब्र की ज़रूरत होती है। मैंने गहरी साँस ली, दिल में अल्लाह का नाम पढ़ा और कोन थाम लिया।

घंटों बीत गए, मेरी उँगलियाँ बिना रुके चलती रहीं। मैंने यास्मीन बेगम के हाथों पर एक ऐसी मेहंदी रचाई जो किसी शाहकार से कम नहीं थी। बीच-बीच में पार्लर की दूसरी लड़कियाँ और औरतें आकर देखतीं और दबी आवाज़ में तारीफ़ करतीं। मेरी काली आबाया के आस्तीन थोड़े ऊपर थे, जिससे मेरे अपने गोरे और साफ़ हाथ नुमायाँ हो रहे थे, जो ख़ुद मेहंदी की हल्की लाली से सजे हुए थे। जब मेहंदी पूरी हुई, तो यास्मीन बेगम ने अपने हाथों को देखा। उनके चेहरे पर एक मुनासिब मुस्कान आ गई।

यास्मीन बेगम: माशाल्लाह, समरीन! जैसा सुना था, तुम उससे कहीं बढ़कर हो। तुम्हारे हाथों में सफ़ाई तो है ही, पर तुम्हारे मिज़ाज की पाकीज़गी तुम्हारे काम में दिखती है।

उन्होंने ख़ुश होकर मुझे तय-शुदा पैसे से कहीं ज़्यादा इनाम दिया।

दिन ख़त्म होते-होते मेरा पर्स उन पैसों से भर चुका था, जिनकी हमें इस वक़्त सख़्त ज़रूरत थी। मैंने फ़रहा बाजी का शुक्रिया अदा किया, अपना वील सही से ढाँपा, और बाहर निकल आई। बाहर शाम की ठंडी हवा चल रही थी। मैं तेज़ी से अपने घर की तरफ़ बढ़ रही थी, जहाँ आसिफ मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। मेरे दिल में आज एक अलग ही सुकून और फ़ख्र का एहसास था। मैंने ये पहला दिन कामयाबी से पूरा कर लिया था, और मुझे यक़ीन था कि अल्लाह हमारी मुश्किलों को जल्द ही आसान कर देगा।

ज़िंदगी में हर नया दिन एक जैसी धूप लेकर नहीं आता। कुछ सुबह ऐसी होती हैं जो दिल में सुकून बिखेर देती हैं, और कुछ दिन ऐसी आज़माइश लेकर आते हैं जहाँ आपकी हया, आपका सब्र और आपके मिज़ाज का इम्तेहान होता है। उस दिन से अगले दिन, मैं बहुत उम्मीद और हौसले के साथ उठी थी। कल की कामयाबी ने मुझे एक नया भरोसा दिया था। मैंने हमेशा की तरह नमाज़ की अदा के बाद अल्लाह का शुक्र अदा किया कि उसने हमारे फाइनेंशियल स्ट्रगल के बीच एक आसान रास्ता दिखाया।

घर का काम निपटाकर, मैंने आईने के सामने खड़े होकर अपना काला आबाया पहना। अपने सर पर वील को इस तरह सलीक़े से बाँधा कि मेरी पाकीज़गी पर कोई आँच न आए। मेरी गोरी रंगत और निगाहों की हया, इस काली आबाया में हमेशा और नुमायाँ हो जाती थीं। लोग कहते हैं कि मैं सुंदर हूँ, लेकिन मेरे लिए मेरी सुंदरता सिर्फ़ मेरे शौहर आसिफ के लिए है। बाहर की दुनिया के लिए तो ये सिर्फ़ एक आज़माइश है, जिससे मुझे ख़ुद को हमेशा महफ़ूज़ रखना होता है। मैंने अपना वही छोटा सा पर्स उठाया और फ़रहा बाजी के पार्लर की तरफ़ निकल पड़ी।

जब मैं पार्लर पहुँची, तो दोपहर का वक़्त हो रहा था। कल की कामयाबी के बाद फ़रहा बाजी ने मुझे देखते ही गले से लगा लिया।

फ़रहा बाजी: आओ, समरीन! आज भी काफ़ी काम है। कल जो तुमने यास्मीन बेगम के हाथ पर मेहंदी लगाई थी, उसकी वजह से आज दो-तीन नए क्लाइंट्स सिर्फ़ तुम्हारा पूछते हुए आए हैं।

मैंने नरम-दिली से मुस्कुराकर कहा।

समरीन: अल्हम्दुलिल्लाह, बाजी। ये सब अल्लाह का करम है।

मैंने अपना आबाया थोड़ा संभाला, वील को सही किया और अपनी कुर्सी पर बैठ गई। शुरुआती दो-तीन घंटे बहुत तेज़ी से बीते। मैंने दो लड़कियों को उनके भाई की शादी के लिए बहुत ही प्यारे डिज़ाइन लगाए। वो दोनों मेरे मिज़ाज और मेरी दीनी बातों से इतनी मुतासिर थीं कि उन्होंने मेरे साथ काफ़ी देर तक दीन और पाकीज़गी पर बातें कीं। मुझे लग रहा था कि ये काम मेरे लिए सिर्फ़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं, बल्कि लोगों से जुड़ने और एक पाकीज़ा दायरा बनाने का सबब बन रहा है। लेकिन तभी, दोपहर के ढलते वक़्त, पार्लर का दरवाज़ा खुला और एक ऐसी तबदीली आई जिसने मेरे दिल के सुकून को हिलाकर रख दिया।

पार्लर के दरवाज़े पर लगी काँच की घंटी बजी। मैंने सर उठाकर देखा, तो एक बहुत ही अमीर साहब अंदर दाख़िल हुए। उनकी उम्र लगभग ४० से ४५ साल के बीच रही होगी। उन्होंने बहुत ही महँगे कपड़े पहने हुए थे, हाथ में एक क़ीमती घड़ी थी, और उनके मिज़ाज से साफ़ झलक रहा था कि वो एक बड़े ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं। उनके साथ उनकी वाइफ़ थीं, जो बेहद ख़ूबसूरत थीं और उन्होंने बहुत ही भाँपने वाला, महँगे रेशमी साड़ी का पहनावा पहना था।

फ़रहा बाजी उन्हें देखते ही अपनी कुर्सी से खड़ी हो गईं और बड़े ही गर्म-जोशी से उनका वेलकम किया।

फ़रहा बाजी: नमस्ते, पांडेय जी! नमस्ते मैडम, आइए, आइए। मैडम, आप तो बहुत दिनों बाद आईं। बिल्कुल भूल ही गई हैं, आप तो हमारी सबसे पुरानी और ख़ास कस्टमर्स में से हैं। बताइए, आज क्या सेवा करें आपकी?

पांडेय जी: मैडम को एक ख़ास फ़ंक्शन के लिए सबसे बेहतरीन मेहंदी लगवानी है फ़रहा जी। मैंने कहा कि आपके पार्लर से अच्छी मेहंदी पूरे शहर में कोई नहीं लगा सकता।

ये सुनकर फ़रहा बाजी हँसने लगीं।

फ़रहा बाजी ने तुरंत मेरी तरफ़ इशारा किया।

फ़रहा बाजी: आपने एकदम सही किया पांडेय जी। ये हैं समरीन। हमारी सबसे बेहतरीन और नए ज़माने की सबसे माहिर आर्टिस्ट। इनके हाथों में तो जैसे जादू है।

जैसे ही फ़रहा बाजी ने मेरा नाम लिया, पांडेय जी की निगाहें घूमकर मुझ पर आकर टिक गईं। उस लम्हे, जब उन्होंने मुझे देखा, तो वो जैसे पूरी तरह हक्का-बक्का रह गए। उनकी निगाहों में एक अजीब सा ठहराव और हैरानी थी। मैं अपनी काली आबाया और वील में बैठी हुई थी, लेकिन मेरी आँखों की चमक और मेरे चेहरे का पाकीज़ा नूर शायद उनके लिए बिल्कुल अनजान और हिला देने वाला था। वो कुछ पल के लिए बिल्कुल सुन्न खड़े रहे, जैसे उन्हें यक़ीन न हो रहा हो कि कोई औरत पर्दे में भी इतनी हसीन और पुरकशिश हो सकती है।

उनकी वो पहली नज़र ही मेरे दिल में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर गई। एक दीनी और पाकीज़ा ख़ातून होने के नाते, मुझे मर्दों की नज़रों की पहचान बहुत अच्छे से थी। जब कोई मर्द किसी औरत को इस तरह ग़ौर से देखता है, तो एक शरीफ़ औरत का दिल अंदर से काँप उठता है। मैंने तुरंत अपनी निगाहें नीचे कर लीं और दिल ही दिल में अल्लाह का नाम पढ़ने लगी।

मैडम मेरी मेज़ के सामने आकर बैठ गईं। पांडेय जी भी उनके ठीक पीछे, एक आरामदायक सोफ़े पर बैठ गए, जहाँ से मेरी मेज़ और मैं बिल्कुल साफ़ दिख रही थी।

मैडम: समरीन, ज़रा मेरे हाथों पर कुछ अलग और नया डिज़ाइन बनाओ।

समरीन: जी, बिल्कुल।

मैंने दबी आवाज़ में कहा, लेकिन मेरा ध्यान लगाने में थोड़ा वक़्त लग रहा था। मेरा पूरा जिस्म इस एहसास से थरथरा रहा था कि पांडेय जी की निगाहें मुझ पर ही टिकी हुई थीं।

मैंने मैडम का हाथ अपने हाथ में लिया और मेहंदी का कोन चलाना शुरू किया। लेकिन जैसे ही मैंने काम शुरू किया, मुझे महसूस हुआ कि पांडेय जी अपनी वाइफ़ को देखने के बजाय, लगातार सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझे ही घूर रहे थे। उनकी आँखें मेरे चेहरे, मेरे बाँधे हुए वील, और जब मैं कोन चलाने के लिए अपनी आबाया की आस्तीन को हल्का सा पीछे करती, तो मेरे गोरे हाथों और उँगलियों पर आकर रुक जाती थीं।

मेरा अंदरूनी जंग शुरू हो चुका था। मेरा दिल मुझसे कह रहा था, ‘समरीन, उठ जा यहाँ से! एक ग़ैर-मर्द इस तरह तुझे घूर रहा है, ये तेरी हया और तेरे पर्दे के ख़िलाफ़ है।’ लेकिन दूसरी तरफ़, मेरे दिमाग़ में मेरे शौहर का चेहरा घूम गया। उनकी दुकान की माली तंगी, घर के ख़र्चे, और वो उम्मीद जो कल उनकी आँखों में दिखी थी, उन्होंने मुझे इजाज़त दी थी इस शर्त पर कि मैं अपनी हिफ़ाज़त करूँ। अगर मैं इस तरह बीच में काम छोड़कर उठ जाती, तो फ़रहा बाजी का नुक़सान होता, उनके सबसे पुराने कस्टमर के सामने तमाशा बनता, और शायद मुझे इस पार्लर से निकाल दिया जाता।

मैंने अपनी निगाहों को पूरी तरह से मैडम के हाथों पर केंद्रित कर लिया। मैंने तय किया कि मैं ऊपर देखूँगी ही नहीं। लेकिन एक औरत की सिक्स्थ सेंस कभी झूठ नहीं बोलती। जब कोई आपको इतनी शिद्दत और ग़ौर से घूरता है, तो आपकी जिल्द पर उस नज़र की तपिश महसूस होती है। पांडेय जी सोफ़े पर बैठे कभी अपनी घड़ी देखते, तो कभी दुकान के बहाने मुझसे बात करने की कोशिश करते।

पांडेय जी: समरीन जी, आप काफ़ी तेज़ी से और सफ़ाई से काम करती हैं। वैसे आपने ये काम कहाँ से सीखा?

उनकी आवाज़ में एक अजीब सा झुकाव था। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैंने बिना उनकी तरफ़ देखे, बहुत ही छोटी और रुकी हुई आवाज़ में जवाब दिया।

समरीन: जी घर पर ही सीखा है।

मैडम ने भी उनका साथ दिया।

मैडम: हाँ, वैसे तुम्हारी मेहंदी की ख़ुशबू और डिज़ाइन दोनों ही बहुत अच्छे हैं। पांडेय जी, देखिए ना, कितना प्यारा फूल बनाया है इन्होंने।

पांडेय जी ने अपनी वाइफ़ की बात का जवाब तो दिया, लेकिन उनकी आँखें अब भी मेरे चेहरे पर थीं।

पांडेय जी: हाँ हाँ, मैं देख रहा हूँ। सच में, ऐसी ख़ूबसूरती और ऐसा हुनर रोज़-रोज़ देखने को नहीं मिलता।

उनके इस बयान में एक छिपा हुआ इशारा था, जो मेरी सुंदरता की तरफ़ था न कि सिर्फ़ मेहंदी की। ये सुनकर मेरे कान गरम हो गए और मुझे एक अजीब सी शर्म और गुस्से का एहसास हुआ। मुझे लग रहा था कि मेरी पाकीज़गी पर एक अनजान शख़्स अपनी नज़रों से डाका डाल रहा है। मैं एक दीनी औरत थी, मेरे लिए एक ग़ैर-मर्द की ऐसी निगाह किसी खंजर से कम नहीं थी। मेरा दिल चाह रहा था कि मैं अपना आबाया और वील और ज़ोर से समेट लूँ और वहाँ से भाग जाऊँ।

मैंने अपने दिल को संभालने के लिए अंदर ही अंदर अल्लाह का नाम लेना शुरू कर दिया। ‘या अल्लाह, मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा। मेरे इस पर्दे की, मेरी हया की हिफ़ाज़त फ़रमा। मैं यहाँ किसी ग़लत नीयत से नहीं आई हूँ, बस अपने शौहर का साथ देने और नेक काम करने आई हूँ। मुझे इस आज़माइश से सरख़रू कर।’

मैडम के हाथों पर मेहंदी का डिज़ाइन आगे बढ़ रहा था। पांडेय जी बीच-बीच में उठकर थोड़ा पास आते, जैसे वो मेहंदी का डिज़ाइन देख रहे हों, लेकिन उनका असली मक़सद मेरे क़रीब आना और मुझे और ग़ौर से देखना था। जब वो पास आते, तो उनके महँगे परफ़्यूम की ख़ुशबू मेरी साँसों तक पहुँचती, जो मुझे और परेशान कर देती। मेरे अपने हाथ थोड़े काँपने लगे थे, लेकिन मैंने अपने हुनर को बिखरने नहीं दिया। मैंने अपनी उँगलियों पर क़ाबू रखा और डिज़ाइन को बिल्कुल ख़राब नहीं होने दिया।

फ़रहा बाजी थोड़ी देर के लिए दूसरे सेक्शन में गई हुई थीं, इसलिए मुझे इस माहौल में ख़ुद को अकेले ही संभालना था। मैंने सोचा कि अगर मैं यहाँ थोड़ा सा भी गुस्सा दिखाऊँगी, तो हालात ख़राब हो सकते हैं, और अगर मैं कमज़ोर पड़ गई, तो पांडेय जी का हौसला और बढ़ सकता है। इसलिए मैंने एक पाकीज़ा ख़ामोशी का रास्ता चुना। एक ऐसी ख़ामोशी जो ख़ुद में एक पर्दा होती है।

लगभग दो घंटे तक वो आज़माइश चलती रही। पांडेय जी की लगातार घूरती हुई निगाहों ने मुझे अंदर से थका दिया था, जितना मैं दिन भर के काम से भी नहीं थकती थी। जब मैडम के दोनों हाथों और पैरों पर मेहंदी पूरी हो गई, तो उन्होंने आईने में देखा और ख़ुशी से उछल पड़ीं।

मैडम: ओह माय गॉड, समरीन! ये तो काफ़ी सुंदर है! इतनी सुंदर मेहंदी मैंने आज तक नहीं लगवाई।

मैडम ने तारीफ़ों के पुल बाँध दिए। पांडेय जी भी खड़े हो गए। उन्होंने अपने पर्स से पैसे निकाले और फ़रहा बाजी को दिए, और फिर एक बड़ा नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।

पांडेय जी: ये आपकी मेहनत और आपकी… ख़ूबसूरती का इनाम है, समरीन जी।

मैंने उनके हाथ की तरफ़ देखा भी नहीं। मैंने अपनी निगाहें ज़मीन पर टिकाए रखते हुए नरम मगर साफ़ आवाज़ में कहा।

समरीन: शुक्रिया पांडेय जी, लेकिन मुझे मेरी मेहनत के पैसे फ़रहा बाजी से मिल जाते हैं। मुझे अलग से इनाम की ज़रूरत नहीं है।

मेरी इस बात में जो ठहराव और पर्दा-नशीन मिज़ाज था, उसने शायद पांडेय जी को ये समझने पर मजबूर कर दिया कि मैं कोई ऐसी-वैसी औरत नहीं हूँ। उन्होंने थोड़ा झिझकते हुए अपना हाथ पीछे किया और अपनी वाइफ़ के साथ पार्लर से बाहर निकल गए।

उनके जाने के बाद, मैंने एक गहरी और ठंडी साँस ली। मेरा जिस्म अब भी थोड़ा काँप रहा था, लेकिन मेरे दिल में एक सुकून था कि मैंने अपनी हया और अपनी पाकीज़गी पर कोई आँच नहीं आने दी। मैंने इस नए दिन की आज़माइश को भी सब्र और पाकीज़गी के साथ झेल लिया था। मैंने अपना वील सही किया, अपना पर्स उठाया, और घर की तरफ़ चल पड़ी, जहाँ मेरे शौहर की सुकून भरी दुनिया मेरा इंतज़ार कर रही थी।

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