हुमा एक हाउस वाइफ और मिश्रा पान वाला 16
Huma ki khet me chudai sex story:- पिछले पार्ट में आपने पढ़ा था कि मिशन पूरा करने के लिए मिश्रा ने नकली बीवी-बेटा और गाँव का प्लान बनाया था। अब आगे…
Part 15 ==> हुमा एक हाउस वाइफ और मिश्रा पान वाला – 15
औरत बोली—
औरत: दो हजार दिन का लगेगा। मेरा और बेटे का दो हजार हर दिन अलग।
मिश्रा: बहुत ज्यादा है। कुछ कम करो। सिर्फ एक्टिंग तो करनी है।
औरत: मगर साहब धोखा भी तो देना है। दो हजार से एक रुपया कम नहीं।
मिश्रा: ठीक है।
प्लान बन गया था। अब जगह।
Huma ki khet me chudai sex story
मिश्रा: शांता यार तुम ग्रेट हो। खैर अभी भाड़े की बीवी और बेटा तो मिल गए। अब खेत और गाँव का क्या?
शांता: अरे तुम भी ना मिश्रा बिल्कुल पागल हो। अरे तुम्हारा दोस्त जो दुबई में है तुम बार-बार कहते थे ना यार वो जाकर वहाँ बैठा है और तुमको हर महीने उसका खेत देखने जाना पड़ता है। हाँ ये बात और है तुमको कुछ पैसे भी देता है उसके।
मिश्रा: क्या दिमाग है तेरा। बहुत कामिनी है तू।
फाइनली प्लान बन गया।
मिश्रा सैफ के घर जाता है। सैफ घर पर था।
मिश्रा: सैफ भाई मैं गाँव जा रहा था। मैं सोच रहा था आप और भाभी जी चलो साथ में घूम आना। वैसे भी मैं शुक्रवार से रविवार तक जा रहा हूँ।
हुमा ने सुना तो बड़ी आँखें करके मिश्रा की तरफ देखती है। इशारों से कहती है कि सैफ को क्यों बोल रहे हो आने को।
सैफ: भाई मैं क्या करूँगा गाँव आकर। और गाँव में होता भी क्या है देखने को।
हुमा: नहीं जी चलते हैं ना। मैंने आज तक गाँव नहीं देखा है। तुम नहीं आते तो मैं और शांता चले जाते हैं।
शांता भी बाहर आती है किचन से।
शांता: हाँ हाँ क्यों नहीं। चलो।
शांता की हाँ सुनकर सैफ कहता है—
सैफ: हाँ अब तुम लोग जाना ही चाहते हो तो मैं भी आ जाता हूँ।
सैफ शांता को देख मुस्कुरा देता है। शांता भी सैफ को देख मुस्कुराती है।
मिश्रा और हुमा उनको देख लेते हैं और समझ जाते हैं सैफ क्यों तैयार हुआ आने को।
मगर हुमा का मूड खराब हो गया था। सैफ जो आ रहा था मगर आखिर कर भी क्या सकते थे।
और फिर वो दिन आ ही गया जब वो लोग मिश्रा के गाँव यानी उसके दोस्त का गाँव जो शहर से नब्बे किलोमीटर दूर था।
मिश्रा ने एक इनोवा कार किराए पर ले ली थी।
ड्राइवर के बगल मिश्रा बैठा था। पीछे एक विंडो में सैफ उसके बगल में हुमा और दूसरी विंडो में शांता बैठी थी।
डेढ़ घंटे के सफर के बाद वो लोग एक गाँव में दाखिल हुए। कच्चे रास्ते से होते हुए खेतों से होते हुए कार एक पुराने से घर के पास आकर रुकी जो खेतों के बीचों-बीच था।
जैसा सोचा था उससे भी अच्छा गाँव था। हुमा को बहुत अच्छा लग रहा था। दूर-दूर तक लहराते हुए खेत पहाड़ दूर-दूर तक ज्यादा आबादी नहीं कोई कार की चहल-पहल नहीं।
सब लोग कार से उतरकर अपना बैग लेकर घर में घुस गए।
अंदर एक लड़का बैठा था। ये वही नाटक मंडली का लड़का था। दरअसल एक दिन पहले ही मिश्रा उसको वहाँ छोड़ गया था।
लड़का: आ गए बाबूजी। जिंदा हो अब तक। मैं समझा चल बसे हो।
सब लोग हैरान थे। हुमा सबसे ज्यादा।
सैफ: भाई मिश्रा कौन है ये लड़का जो ऐसी बात कर रहा है?
मिश्रा उदास उतरा हुआ मुँह बनाकर—
मिश्रा: भाई मेरा बेटा है।
सब लोग चौंककर—
सब: क्याआआआ?
शांता एक्टिंग कर रही थी मगर हुमा और सैफ को बहुत ज्यादा बुरा लग रहा था।
अगले रूम में जाते ही एक औरत खाना बना रही थी।
औरत: आ गए आप अचानक और ये फौज कहाँ से ले आए?
मिश्रा उदास सा मुँह बनाकर—
मिश्रा: सैफ भाई ये मेरी धर्म पत्नी है राधा। और राधा ये सैफ भाई हैं ये उनकी बीवी और ये शांता है हमारे मोहल्ले में रहते हैं शहर में।
राधा: अच्छा तो पूरा मोहल्ला साथ ले आए। अरे पूरा शहर के लोगों को ही ले आते। और हाँ सुन लो जी अब ये जो फौज साथ लाए हो तो उनके खाने-पीने का आप ही देखो। मैं नहीं बना सकती इनके लिए।
इतना कहकर वो औरत बाहर चली जाती है।
हुमा को और सैफ को बहुत बुरा लगता है। खासकर हुमा को। उसकी तो आँखों में हल्के से आँसू आ जाते हैं। वो सोचती है जितना सुना था उससे भी ज्यादा खडूस है ये औरत।
और बेचारे मिश्रा जी जितने अच्छे हैं उतनी ही उनकी फैमिली बुरी।
मिश्रा उदास सा मुँह बनाकर—
मिश्रा: माफ करना आप लोगों की बेइज्जती कर दी राधा ने। मैं उसकी तरफ से माफी माँगता हूँ।
मिश्रा हाथ जोड़ने लगा तो सैफ ने उसे रोक लिया।
सैफ: भाई ये क्या कर रहे हो… कोई बात नहीं।
खैर कुछ देर बाद शांता और हुमा खुद उस छोटे से किचन में जाकर कुछ सब्जी-रोटी बनाने लगे।
तभी वहाँ मिश्रा आकर उदास मुँह बनाकर—
मिश्रा: माफ करना हुमा जी आप लोगों को क्या बोलकर लाया और क्या हो गया।
हुमा: आप दिल छोटा न करें। हम सब आपके साथ हैं। और हाँ आपका गाँव बहुत अच्छा है जितना सोचा था उससे भी अच्छा।
मिश्रा खुश होकर चला गया। अब तक प्लान के हिसाब से सब कुछ ठीक चल रहा था।
दोपहर का खाना खाकर सैफ और मिश्रा बाहर खाटिया डालकर पेड़ के नीचे बैठ गए। उनके करीब हुमा एक प्लास्टिक चेयर लेकर बैठ गई। पेड़ की छाँव का पूरा मजा ले रहे थे वो लोग।
हुमा: कितना सुकून है यहाँ। बहुत अच्छा गाँव है आपका मिश्रा जी।
मिश्रा: अरे कहाँ अच्छा। आप जैसे अच्छे लोगों के आने की वजह से अच्छा हुआ है ये।
मिश्रा की बात सुनकर सब मुस्कुराने लगे।
सैफ मौका ढूँढ रहा था कि कब शांता को खेतों में ले जाए।
वहीं मिश्रा भी यही फिराक में था। हुमा भी इस खूबसूरत मौसम में मिश्रा से मिलना चाह रही थी मगर वो मिश्रा के बीवी-बेटों से डरी हुई थी।
दिन में तो कोई मौका नहीं मिला मगर रात को सैफ ट्राई कर रहा था कि कुछ काम बन जाए। एक कमरे में राधा और उसका बेटा यानी कि मिश्रा का नकली परिवार एक कमरे में शांता और एक कमरे में सैफ और हुमा थे। वहीं मिश्रा बाहर खाटिया डाले सोया हुआ था।
रात को राधा के खर्राटे शुरू हो गए थे। वहीं शांता सैफ हुमा और मिश्रा सब जाग रहे थे। मिश्रा तो बाहर खुली हवा में खाट पर चादर में अपने लंड को सहला रहा था हुमा को याद करके।
वहीं सैफ भी सोच रहा था कि कब हुमा सो जाए और हुमा सैफ के सोने का इंतजार कर रही थी।
इंतजार करते हुए हुमा को नींद लग गई। सैफ ने देखा कि हुमा सो गई। वो दबे पाँव उठा और बाहर जाने लगा। बाहर जाकर उसने शांता को इशारा किया और दोनों दबे पाँव बाहर गए। बाहर उन्होंने चेक किया कि मिश्रा सोया है या नहीं मगर मिश्रा उनकी आहट सुनके सोने की एक्टिंग करने लगा। वो दोनों आँगन से होते हुए झाड़ियों की तरफ चले गए।
मिश्रा भी दबे पाँव उठा और अंदर आया। उसने धीरे से हुमा को जगाया। हुमा जाग गई। उसको चुप रहने को कहा इशारे से। हुमा भी कुछ नहीं बोली। दबे पाँव मिश्रा के पीछे चल पड़ी। दोनों बाहर आँगन से होते हुए चलने लगे।
हुमा फुसफुसाते हुए—
हुमा: हम कहाँ जा रहे हैं और सैफ और शांता कहाँ हैं?
मिश्रा श्श्श्श् करके अपनी उंगली जुबान पर रखकर चुप रहने का इशारा किया।
कुछ दूर आगे जाने के बाद उनको कुछ सुनाई दिया।
औरत की आवाज थी—
शांता: श्श्श्श्… आआह्ह्ह्ह… धीरे मालिक…
वो औरत साड़ी अपनी कमर पर लिए झुकी थी और उसके पीछे एक मर्द उसको चोद रहा था। वो कोई और नहीं शांता और सैफ थे।
वो नजारा देख हुमा को गुस्सा आया मगर तभी मिश्रा पीछे से आया और हुमा के बूब्स को धीरे-धीरे कमीज के ऊपर से दबाने लगा। मिश्रा के कठोर हाथ पड़ते ही हुमा जैसे पिघल गई।
हुमा बहुत धीरे से—
हुमा: श्श्श्श्श्श्…
करने लगी।
मिश्रा ने देर न करते हुए अपने हाथ नीचे ले जाकर कमीज ऊपर करके हुमा की लेग्गी को नीचे कर दिया और उसकी पैंटी को भी नीचे कर दिया। हुमा को उसकी गाँड पर ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। मिश्रा ने पीछे से जोर लगाया झुकने का इशारा किया तो हुमा झुक गई।
चाँद की रोशनी में हुमा की गोरी गाँड साफ चमक रही थी। मिश्रा ने धोती से अपना काला लंड निकाला और हुमा की चूत पर सेट करने लगा। सामने सैफ शांता को धनाधन चोद रहा था।
हुमा झुककर वो सब देख रही थी मगर फासला तो काफी था और झाड़ियाँ भी थीं इसलिए शांता और सैफ को शक होना मुश्किल था।
तभी हुमा की सिसकारी निकल जाती है—
हुमा: श्श्श्श्श्श्श्…
हुमा की चूत में मिश्रा का सुपाड़ा घुस गया था। तभी सैफ ने कमर हिलाना बंद किया और पीछे मुड़कर कहने लगा—
सैफ: शांता तुमने कुछ सुना? जैसे कोई औरत की आवाज हो।
शांता झुककर पीछे पलटकर देखती है और कहती है—
शांता: अरे कोई नहीं। मेरी ही आवाज सुनी होगी तुमने।
फिर सैफ फिर कमर हिलाने लगा।
हुमा की आँखें हल्की-हल्की बंद हो रही थीं। मिश्रा का काला लंड जो उसकी चूत में जा घुसा था।
कुछ दूर झाड़ियों में शांता चुद रही थी और यहाँ उसकी चूत में गरम लंड। उस वजह से हुमा की एक्साइटमेंट डबल हो गई थी।
सैफ शांता की जबरदस्त चुदाई किए जा रहा था। उसकी साँवली गाँड की गोलाइयाँ थरथरा रही थीं। चाँद की रोशनी में ये नजारा देख सैफ पागल हो रहा था। यही हाल मिश्रा का भी था।
मगर वो कंट्रोल कर रहा था क्योंकि उसको सैफ का डर था।
हुमा की गोरी मोटी गाँड की गोलाई चाँद की रोशनी में साफ चमक रही थी। मिश्रा उनको प्यार से सहला रहा था।
अब मिश्रा को भी लगा कि शुरू हो जाए। उसने देर न करते हुए पीछे से अपना लंड हुमा की चूत पर एडजस्ट करना शुरू कर दिया।
हुमा को यही चाहिए था। उसने भी इस सिचुएशन में मिश्रा का साथ दिया। थोड़ा और झुककर।
अगले ही पल—
हुमा: आउच्च्च्च…
की आवाज निकल गई हुमा की। मिश्रा का आधा लंड जो उसकी चूत में जा घुसा था।
वहाँ सैफ ने चुदाई रोकी।
सैफ: अरे शांता तुमने कुछ सुना? किसी औरत की आवाज नहीं?
शांता झुके हुए—
शांता: अरे नहीं साहब आपको वहम हुआ होगा। आप जल्दी कीजिए नहीं तो मालकिन या मिश्रा जी उठ जाएँगे।
सैफ को भी लगा शायद उसको वहम हुआ होगा।
यहाँ हुमा अपने मुँह पर हाथ रखे हुए सुन्न थी। मिश्रा भी आधा लंड डालकर रुक गया था। दोनों डर गए थे क्योंकि आवाज सैफ ने जो सुन ली थी। वहाँ सैफ ने फिर कमर हिलानी शुरू की। यहाँ भी मिश्रा ने अपनी कमर धीरे-धीरे हिलानी शुरू की।
हुमा झुके हुए मुँह पर हाथ रखे एक अलग तरह की एक्साइटिंग का मजा ले रही थी।
मिश्रा अपने आधे लंड से चुदाई का मजा ले रहा था। मौसम रात के वक्त कुछ ठंडा था। हल्की हवाएँ चल रही थीं जो हुमा की नंगी गाँड की गोलाइयों से टकरा रही थीं। ठंडी हवा का झोंका और दूसरी तरफ मिश्रा के गरम लंड अंदर-बाहर हो रहा था। हुमा का मजा दुगना कर रहा था।
जहाँ हुमा मजे ले रही थी वहीं मिश्रा भी अपनी आँखें बंद किए हुए स्वर्गीय आनंद ले रहा था। खुली हवा में मस्त चूत मारकर। मगर तभी सैफ की आवाज निकल गई।
सैफ: आआह्ह्ह्ह… मजा आ गया मेरी जान।
सैफ के लंड की पिचकारी शांता की साँवली गाँड की गोलाइयों पर थी।
शांता पीछे देखते हुए—
शांता: क्या साहब आप भी ना। मेरी साड़ी भी खराब कर दी।
सैफ: क्या करूँ मेरी जान। कंट्रोल नहीं कर पाया।
यहाँ हुमा और मिश्रा का मूड भी खराब हो गया था। वो समझ गए थे कि अब हमें भी भागना चाहिए क्योंकि सैफ और शांता का काम हो चुका है।
मिश्रा न चाहते हुए लंड बाहर खींचा जो हुमा की चूत के पानी से आधा गीला चमक रहा था। हुमा की गाँड अंधेरे में अब ऐसे चमक रही थी जैसे कोई हीरा कोयले की खान में हो।
हुमा भी जल्दी से खड़ी हुई और अपनी लेग्गी और पैंटी को खींच उसको सेट किया और घर की तरफ चलने लगी। उसके पीछे-पीछे मिश्रा भी अपना लंड सेट करते हुए चलने लगा।
दोनों का मूड भी खराब था और डर भी कि कहीं सैफ और शांता उनसे पहले न आ पहुँचे। मगर ऐसा नहीं हुआ। मिश्रा और हुमा उनसे पहले पहुँचकर अपनी-अपनी जगह पर जाकर ऐसे सोने की एक्टिंग करने लगे जैसे गहरी नींद में हों।
सैफ भी चुदाई के बाद डरा हुआ था कि कहीं हुमा जाग न गई हो। मगर घर पहुँचते ही उसकी जान में जान आई।
खैर ये रात तो निकल गई मगर हुमा और मिश्रा को प्यासा छोड़ गई। अब देखते हैं कल क्या होगा।
दूसरे दिन मॉर्निंग में
शांता और सैफ बाहर आँगन में थे। हुमा नहा रही थी। मिश्रा का मन हो रहा था कि बाथरूम में जाकर चोद डाले मगर ऐसा वो कर नहीं पाया।
यहाँ बाहर सैफ और शांता बातें कर रहे थे।
सैफ: क्या लहराते हुए खेत हैं।
शांता: हाँ साहब बहुत मस्त लग रहे हैं। चलो खेतों में जाकर मस्ती करते हैं।
शांता अपना काम कर रही थी जितना हो सके हुमा को सैफ से दूर रखने का।
सैफ: यार मन तो मेरा भी हो रहा है मगर हुमा और मिश्रा को क्या बताएँगे?
शांता: वो तुम मुझ पर छोड़ दो।
शांता ने कुछ देर बाद जाकर मिश्रा को ये बात बताई और एक प्लान बनाया।
कुछ देर बाद शांता—
शांता: अरे मिश्रा जी हुमा दीदी चलो ना आप मैं और हम सब गाँव देखने जाते हैं। यहाँ के खेत खलिहान।
मिश्रा ने हुमा को पहले बता दिया था कि शांता ऐसे बोले तो क्या बोलना है।
सैफ हुमा और मिश्रा के जवाब का इंतजार कर रहा था।
हुमा: अरे नहीं शांता। मेरे सिर में हल्का सा दर्द है।
इतना सुनते ही सैफ खुश हुआ।
मिश्रा ने भी जवाब दिया—
मिश्रा: अरे वो गाँव के मुखिया जी आ रहे हैं। मुझे काम है। आप लोग हो आओ।
शांता: क्या यार। मूड खराब कर दिया तुम लोगों ने।
मिश्रा: अरे शांता दिल छोटा न करो। सैफ भाई के साथ जाकर आ जाओ। क्यों सैफ भाई?
मिश्रा ने सैफ की तरफ देखते हुए कहा।
सैफ: अब… अब मैं क्या करूँगा। मुझे कुछ पता नहीं यहाँ का।
सैफ को खुशी तो बहुत हुई मगर नखरे की एक्टिंग करने लगा।
सैफ की झूठी एक्टिंग मिश्रा हुमा और शांता तीनों समझ गए थे क्योंकि तीनों को सच्चाई पता थी सैफ को छोड़कर।
जैसे-तैसे सैफ और शांता निकल गए खेतों की तरफ। सैफ बहुत खुश था। अभी सुबह के साढ़े ग्यारह हुए थे। वहीं हुमा और मिश्रा भी खुश हुए। मिश्रा ने हुमा को इशारा किया।
हुमा ने इशारे से कहा कि आपकी बीवी अंदर है क्या बोलेंगे।
मिश्रा ने उसको इशारे से कहा कि मैं संभाल लूँगा।
मिश्रा: अरी भगवान सुनती हो। मैं जरा मुखिया जी के घर हो आता हूँ और हुमा जी को भी गाँव दिखा लाता हूँ।
अंदर घर से आवाज आती है—
राधा: तो मैं क्या करूँ। जहाँ जाना है जाओ। मेरी बला से।
हुमा को बहुत बुरा लगता है मिश्रा की बीवी का जवाब सुनकर। मगर उस बेचारी हुमा को क्या पता था कि ये तो बीवी की एक्टिंग कर रही है वो भी खडूस बीवी की।
मिश्रा ने चप्पल पहनी और वो आगे निकला। हुमा ने भी उसकी सैंडल पहनी और वो भी मिश्रा के पीछे-पीछे चलने लगी। कुछ दूर से जहाँ से घर अब आँखों से ओझल हुआ और अब दूर-दूर तक सिर्फ लहराते खेत दिखने लगे तो हुमा ने मिश्रा को बोला—
हुमा: अरे सुनिए जरा धीरे चलिए।
मिश्रा पलटा और मुस्कुराने लगा। हुमा कुछ दूर पर थी। हुमा ने ब्लू सलवार और व्हाइट कमीज पहना था। सिर पर भी व्हाइट दुपट्टा था। मिश्रा की धोती हवा से लहरा रही थी।
मिश्रा ने यहाँ-वहाँ देखा और मुस्कुराते हुए करीब आती हुई हुमा को गले लगा लिया।
हुमा: अरे ये क्या कर रहे हो। छोड़ो कोई देख लेगा।
मिश्रा: मेरी जान इस वक्त कोई नहीं आता यहाँ।
हुमा: खेत में मजदूर होंगे ना।
मिश्रा: अरे नहीं। आज उनकी भी छुट्टी है।
मिश्रा हवस में जल रहा था। वही हाल हुमा का भी था। मिश्रा हुमा को खेतों के अंदर ले जाने लगा। जैसे-जैसे हुमा अंदर जा रही थी वैसे-वैसे उसकी एक्साइटमेंट बढ़ती जा रही थी।
हुमा ने पीछे पलटकर देखा तो पाया दूर-दूर तक अब उसको गन्ने के खेत ही दिखाई दे रहे थे। मिश्रा आगे-आगे और हुमा उसके पीछे। मिश्रा ने हुमा का हाथ पकड़ रखा था। मिश्रा हुमा को खेत के अंदर ले जाने के बाद एक ऐसी जगह लाया जहाँ शायद कुछ मजदूर खाना खाते होंगे क्योंकि खेत के बीचों-बीच फसल नहीं थी। छह या सात लोग बैठ सकेंगे इतनी खाली जगह थी।
हुमा की दिल की धड़कन बढ़ गई थी। उसने धड़कते दिल से मिश्रा को कहा—
हुमा: हम यहाँ क्यों आए हैं?
जबकि हुमा को पता था क्यों आए हैं।
मिश्रा: मेरी जान मैं तुझे यहाँ चोदने लाया हूँ।
हुमा भी खुल चुकी थी। उसने कह दिया—
हुमा: मगर यहाँ कैसे? यहाँ तो नीचे बिछाने को कुछ नहीं है।
मिश्रा: मेरी जान आज खड़े-खड़े ही चुदाई करेंगे।
मिश्रा भी बहुत बेसब्र हो गया था।
उसने बार करते-करते हुमा के कमीज में हाथ डालकर उसकी सलवार का नाड़ा ढूँढने लगा। जैसे ही नाड़ा हाथ में आया नाड़ा खींच लिया। सलवार हुमा के पैरों में गिर गई। हुमा ने भी ज्यादा नखरे न करते हुए सलवार को पैरों से बाहर निकाल लिया। अब भी हुमा के पैरों में सैंडल थी।
मिश्रा ने फिर कमीज में हाथ डालकर पैंटी नीचे खींच ली। पैंटी हुमा की मोटी जाँघों में आ फँसी। उसके आगे हुमा ने पैंटी को नीचे खींचकर पैरों से अलग कर दिया।
मिश्रा ने भी वक्त न गँवाया और अपनी धोती और अंडरवियर उतार दी।
और एक बार यहाँ-वहाँ देखा और हुमा को घुमाकर झुकने को कहा। हुमा ने भी एक बार यहाँ-वहाँ देखा कहीं कोई आ न जाए। ये डर और सेक्स का एक्साइटमेंट दोनों उसके दिल में थे।
हुमा झुक गई। उसकी गाँड पर अब भी कमीज था। मिश्रा ने कमीज उठाकर उसके कमर पर रख दिया। दिन के उजाले में हुमा की बड़ी गोरी गाँड जैसे चमक रही थी। मिश्रा का लंड पहले ही तना हुआ था। ये नजारा देख उसका लंड जैसे तनकर फटने की हालत में आ गया था।
मिश्रा ने वक्त न गँवाते हुए अपने काले मोटे हाथ हुमा की गाँड की गोलाइयों पर आकर सहलाने लगा। मिश्रा उसका काला नाग जैसा लंड आगे लाकर हुमा की गाँड की गोलाइयों में घुसाने लगा मगर उसको हुमा की चूत मिल नहीं रही थी।
खुले आसमान के नीचे हल्की सी ठंडी हवा में हुमा का मजा दुगना हो गया था। उस पर मिश्रा का काला गरम लंड उसकी चूत पर टकराकर वापस जा रहा था। हुमा से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अपना हाथ नीचे ले जाकर मिश्रा का लंड पकड़कर अपनी चूत पर सेट करने लगी।
हुमा के मुलायम हाथों में मिश्रा का लंड आते ही मिश्रा खुश हुआ।
जैसे ही मिश्रा को लगा कि हुमा ने उसका लंड उसकी चूत पर सेट कर दिया है उसने धक्का लगा दिया।
हुमा: औच्च्च्च…
मिश्रा का आधा लंड हुमा की चूत में जा घुसा। हुमा ने फौरन मिश्रा का लंड छोड़कर वो हाथ अपने मुँह पर लगा लिया क्योंकि उसकी सिसकारी जोर की निकल जाए। आखिर उसको पता था वो खेतों में है।
मिश्रा ने अपनी आँखें बंद कीं और एक और धक्का लगा दिया। मिश्रा का पूरा लंड हुमा की चूत में जा फँसा। हुमा ने अपनी आँखें जोर से बंद कीं और अपने लिप्स को दबाकर एक सिसकारी ली—
हुमा: श्श्श्श्श्श्श्…
मिश्रा जहाँ मजे के सागर में डूब गया था वहीं हुमा को हल्का सा दर्द और मजा हासिल हुआ।
मिश्रा ने अपने काले हाथ हुमा की गोरी गाँड पर रखकर धक्के लगाना शुरू किया।
हुमा को सामने पकड़ने के लिए कुछ था नहीं। वो हर धक्के के साथ आगे-आगे होने लगी। मिश्रा हुमा की गाँड की गोलाइयों को कसकर पकड़े हुए था फिर भी हुमा आगे हो रही थी।
हुमा: श्श्श्श्… आआह्ह्ह… धीरे। मैं गिर जाऊँगी।
मिश्रा ने भी सिचुएशन को समझा और हुमा की गाँड की गोलाइयों को छोड़कर उसके दोनों हाथों की कलाइयों को पकड़कर हाथ पीछे खींचकर चोदने लगा।
ऐसे लग रहा था जैसे मिश्रा कोई ताँगा या बैलगाड़ी चला रहा हो। हुमा झुकी हुई थी। उसके दोनों हाथ मिश्रा ने पीछे की तरफ पकड़ रखे थे।
और मिश्रा हुमा को चोदे जा रहा था। हाथ पीछे की तरफ होने की वजह से हुमा को थोड़ी तकलीफ हो रही थी मगर मिश्रा का बड़ा लंड उसको मजे भी दे रहा था।
चुदाई करते वक्त मिश्रा का कुर्ता बार-बार मिश्रा के लंड पर गिर रहा था। मिश्रा ने उस कुर्ते को अपने मुँह में फँसाकर चुदाई करने लगा।
मिश्रा के स्ट्रोक बढ़ने लगे। वैसे-वैसे हुमा की गोरी बड़ी गाँड थरथरा ने लगी जैसे किसी बैलून में पानी भरा हुआ हो।
मिश्रा वो नजारा देखते हुए धक्के लगाकर स्वर्गीय आनंद उठा रहा था।
हुमा की चूत भी मिश्रा के बड़े लंड को जकड़े जा रही थी।

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